घर का हर सामान खरीदने की ज़रूरत नहीं, ‘रेंटशेर’ से जुड़िए, मस्त रहिए...

रसेल बोट्समैन के अनुसार पीर-टू-पीर बाजार 26 बिलियन डाॅलर से कुछ अधिक का हैअपने बच्चों के लिये किफायती और पर्यावरण के अनुकूल वस्तुओं की तलाश ने दी इस काम की प्रेरणाघरेलू उपयोग में आने वाली लगभग हर वस्तु किराये के लिये उपलब्ध है इसके पासबैंगलोर के बाद जल्द ही पुणे, चंडीगढ़ और गुड़गांव में विस्तार करने की बना रहे हैं योजना

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पीर-टू-पीर कारोबार जिसे आज के समय में सामान्यतः साझा उपभोग या हिस्सेदारी वाली अर्थव्यवस्था के रूप में जाना जाता है विभिन्न उत्पादों और सेवाओं को जद में लाने के साथ-साथ लगातार अपने पांव पसारती जा रही है। एक तरफ जहां व्यापार का यह विचार धीरे-धीरे भारत में बढ़ रहा हैं वहीं वैश्विक स्तर पर नजर डालें तो बीते एक दशक के दौरान इसकी सहयोगी खपत एक ही स्थान पर टिकी हुई है। इस विषय पर कई लेख और किताबों के रचनाकर रसेल बोट्समैन के अनुसार पीर-टू-पीर बाजार 26 बिलियन डाॅलर से कुछ अधिक का है और यह कई लोगों को इसकी विघटनकारी शक्ति से रूबरू करवाने के लिये काफी है।

ऐसे में ‘रेन्टशेर’ इस बाजार में प्रवेश करना वाला एक नया खिलाड़ी है जो किराये पर स्थान लेने के लिये एक आॅनलाइन मंच उपलब्ध करवाने के अलावा होम-डिलीवरी और पिक-अप सर्विसेस की सुविधा भी उपलब्ध करवाता है। वर्ष 2014 में बड़े दिन से कुछ पहले सजावट के सामान और वेशभूषा को खरीदने के बजाय किराये पर लेने-देने के विचार को बढ़ावा देने के इरादे से इसकी शुरुआत की गई थी। ‘रेन्टशेर’ की टीम का दावा है कि वे पारदर्शी होने के अलावा उपयोग के लिये आसान ऐसी सेवाएं उपलब्ध करवाते हैं जो कुछ भी किराये पर आॅनलाइन पर दिलवाने के अलावा एक बाजार के रूप में मान्य हैं। आज जब भारत में बड़े पैमाने पर उपभोक्तावाद का दौर बड़ी तेजी से फैल रहा है ऐसे में इस टीम को भरोसा है कि यहां के लोगों के पास ऐसी फालतू वस्तुओं की कोई कमी नहीं है जिन्हें वे दूसरों के साथ साझा करने, किराये पर देने या बेचने के लिये तैयार बैठे हों।

कई वैश्विक कंपनियां इस बाजार में प्रवेश कर रही हैं और फैशन, कारों, किताबों के अलावा कई अन्य श्रेणियों में काम करने वाले स्टार्टअप की संख्या में दिनोंदिन बढ़ोतरी होती जा रही है। पीर-टू-पीर के क्षेत्र में कुछ अन्य जाने-माने नाम फायदा, रेंटोगो और आईरेंटशेयर हैं। हालांकि ‘रेन्टशेर’ के संस्थापकों में से एक अनुभा वर्मा का कहना है कि, ‘‘इस क्षेत्र में काम कर रहे अन्य प्रतिद्वंदी सामुदायिक और बी2बी क्षेत्र में अधिक सक्रिय है इसलिये वे उत्पाद आदेश, वितरण और अन्य मूल्य वर्धित सेवाओं को वास्तव में पूरा करने के मामले में कहीं नहीं टिकते हैं।’’

जीवन जीने के लिये एक स्थायी समाधान की तलाश इस टीम को प्रेरित करने वाले महत्वपूर्ण कारकों में से एक रही है। ‘रेन्टशेर’ के संस्थापकों में से एक केतकी का कहना है कि प्रति किलो प्रौद्योगिकी उत्पाद के निर्माण के साथ ही 3700 किलो अपशिष्ट पदार्थ पीछे छूट जाता है जो पर्यावरण की दृष्टि से बेहद नुकसानदेह और खतरनाक होता है। वे कहती हैं, ‘‘हमारे द्वारा उपयोग किये जाने वाले प्रत्येक उपकरण का अपशिष्ट उत्पादन का एक विषम अनुपात है और वे जमीन या समुद्र को भरने वाले मलबे और कचरे के सबसे बड़े उत्पादक हैं। मोबाइल फोन, लैपटाॅप और टीवी जैसे उत्पाद बड़े पैमाने पर बेहद विषैले और नष्ट न होने वाले नाॅन-बायोडिग्रेडेबल अपशिष्ट का बड़े पैमाने पर उत्पादन करते हैं।’’

केतकी और अभिजीत के मन में यह विचार तक आया जब वे दोनों नए-नए माता पिता बने। वे लोग अपने बेटे के लालन-पालन के लिये औरों से अलग एक किफायती और पर्यावरण के अनुकूल तरीके की तलाश में थे। ऐसे में इन्होंने किफायत के साथ इस्तेमाल होने वाली खिलौनों, अन्य वस्तुओं और उपकरणों को किराये पर लेने का फैसला किया। जल्द ही इन दोनों को अहसास हुआ कि इनका यह प्रयोग सिर्फ बच्चों के उतपादों के मामले ही सफल नहीं है बल्कि घरेलू उपकरणों, बिजली के उपकरणों, यात्रा से संबंधित सामानों और खेल के सामान सहित कई अन्य वस्तुओं के लिये भी इस तरह की सेवाओं की बहुत जरूरत है।

केतकी कहती हैं, ‘‘हम इस नतीजे पर पहुंचे कि सिर्फ वित्तीय कारणों के चलते ही नहीं लेकिन कई अन्य कारणों के चलते इन चीजों को खरीदने के मुकाबले किराये पर लेना अधिक फायदेमंद है।’’ जल्द ही अनुभा और हर्ष इस टीम में शामिल हुए और इस तरह ‘रेन्टशेर’ की स्थापना हुई। इस टीम ने 40 हजार अमरीकी डाॅलर के साथ अपने इस व्यवसाय की शुरुआत की और वर्तमान में इनकी वेबसाइट पर विभिन्न उत्पादों की एक व्यापक और आकर्षक सूचि उपलब्ध है।

अभिजीत
अभिजीत

इस टीम का कहना है कि प्रतिदिन 100 से अधिक लोग इनकी वेबसाइट को देखते हैं और अबतक ये लोग 300 से अधिक उत्पादों को किराये पर दे चुके हैं। फिलहाल ‘रेन्टशेर’ बैंगलोर में सफलतापूर्वक संचालित हो रही है और आने वाले दिनों में इनका इरादा पुणे, चंडीगढ़ और गुड़गांव में विस्तार करने का है।

पीर-टू-पीर माॅडल पर आधारित व्यवसाय करने वाले ‘रेन्टशेर’ फिलहाल अपने उपभोक्ताओं से लिस्टिंग के लिये कोई शुल्क नहीं लेते हैं लेकिन वितरण सेवाओं के अलावा इनका पेमेंट गेटवे की सुविधा उपलब्ध है। वे हर सफल लेन-देन की एवज में स्वामी या उत्पाद विक्रेता से किराये के मूल्य का 20 प्रतिशत भुगतान लेते हैं।

अनुभा कहती हैं, ‘‘हमने प्रारंभिक दिनों में इस बाजार के अपने स्वयं के उत्पादों से सींचा ताकि लोगों को इस बात की जानकारी मिल सके कि किराये पर घरेलू इस्तेमाल के सामान भी उपलब्ध है और हमारा यह विचार बहुत उपयोगी साबित हुआ। अब लोग खुद चलकर हमारे पास आते हैं और कहते हैं कि मेरे पास यह सामान फालतू पड़ा है और मुझे इसे किराये पर उठाना है। इसके अलावा हमारी आॅनलाइन सूची की सहायता से लोग किराये से संबंधित सवालों के जवाब भी आसानी से पा लाते हैं।’’

अनुभा और केतकी
अनुभा और केतकी

इस टीम द्वारा बैंगलोर में किये गए बाजार से सर्वेक्षण के अनुसार किराये पर लेनदेन करने के माॅडल को 20 से 30 प्रतिशत लोगों ने अपनी स्वीकृति प्रदान की है जो इस बाजार को करीब 120 मिलियन डाॅलर के बाजार का रूप देते हुए इसमें करीब 25 मिलियन के राजस्व की क्षमता को जन्म देती है। हर्ष बताते हैं, ‘‘हमारे अनुमान के अनुसार देश में मौजूद 7 से 10 मेट्रो शहरों ओर 12 द्वितीय टियर शहरों के साथ किराये पर सामान के लेन-देन करने का बाजार सालाना 400 से 500 मिलियन डाॅलर को पार सकता है। और यह अतिरिक्त उत्पादों में ई-कॉमर्स विकास के आधार पर ऊपर से नीचे बाजार का आकार के समान है।’’

इस टीम को यकीन है कि जिस तेजी के साथ देश में खुदरा उत्पादों की बिक्री बढ़ रही है आने वाले दो से तीन वर्षों के भीतर इस खरीदे गए सामान में से अधिकतर बाजार में किराये पर लेने-देने के लिये उपलब्ध होगा। वे आगे कहते हैं कि 500 बिलियन डालर के खुदरा भारतीय बाजार में से अगर इस्तेमाल के बाद 5 प्रतिशत भी अपनी कीमत के 10 प्रतिशत किराये मूल्य और 20 प्रतिशत कमीशन के साथ उपलब्ध हो तो आने वाले समय में यह बाजार 500 मिलियन अमरीकी डाॅलर से अधिक का होगा।

वर्ष 2015 के अंत तक ‘रेन्टशेर’ की योजना देश के 5 अन्य शहरों में विस्तार करने की है। इसके अलावा वे अपने उपभोक्ताओं की प्रतिक्रिया के आधार पर अपने मंच पर और भी नई और दूसरों से अलग सेवाओं को जोड़ने की तैयारी में हैं। अंत में अनुभा कहती हैं, ‘‘हो सकता है कि जल्द ही हम किराये पर लेने और उत्पादों को वेबसाइट पर अपलोड करने के लिये एक मोबाइल एप्लीकेशन को लेकर आयें। इसके अलावा हमें अपनी विस्तार की योजनाओं को अमली जामा पहनाने के लिये अपना निवेश भी बढ़ाने की आवश्यकता है।’’

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Worked with Media barons like TEHELKA, TIMES NOW & NDTV. Presently working as freelance writer, translator, voice over artist. Writing is my passion.

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