लाखों औरतों के लिए वे खुद के घर-परिवार भूल गईं

जागोरी कैंपेन: जेंडर ट्रेनर कमला भसीन...

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पुरुष प्रधान समाज में महिलाओं का सदियों से शोषण होता आ रहा है। भारत में महिला उत्पीड़न की घटनाओं में निरंतर वृद्धि हो रही है। आधी आबादी अपने अस्तित्व की लड़ाई लड़ रही है। ऐसे में समाजिक जागरूकता की अलख जगाने वाली महिलाओं की संस्था 'जागोरी' एक सशक्त प्रतिरोध के रूप में सामने आती है। वीणा शिवपुरी, शांति और जेंडर ट्रेनर कमला भसीन के प्रतिरोध के स्वर हमे उसी प्रतिरोधी सच से रू-ब-रू कराते हैं।

कमला भसीन
कमला भसीन
ये वही जमाना था, जब उनकी 18 महीने की बेटी मीतो अपने पिता के कंधे पर बैठ कर बलात्कार विरोधी आंदोलन में हिस्सा ले रही थी और उसके हाथों में एक प्ले कार्ड था जिस पर लिखा था बलात्कार मिटाओ, मेरा भविष्य बचाओ! हमारे यार-दोस्त ही हमारे बच्चों की मौसी और मामा हो जाते थे।

'जागोरी' से जुड़ीं जेंडर ट्रेनर कमला भसीन लगभग साढ़े तीन दशक से समाज वैज्ञानिक के रूप में आधी आबादी के विभिन्न मसलों को लेकर सक्रिय हैं। वह सबसे पहले राजस्थान में उन्नीस सौ सत्तर के दशक में सक्रिय हुईं थीं। उसके बाद यूनाइटेड नेशन्स फूड ऐण्ड एग्रीकल्चरल ऑर्गेनाइज़ेशन से जुड़ गईं और उसके साथ 27 साल तक सक्रिय रहीं। इस दौरान उन्होंने दक्षिण-पूर्व एशिया और दक्षिण एशिया में महिलाओं के विकास और सशक्तीकरण में पूरा समय दिया। अब वह जागोरी और संगत के साथ काम कर रही हैं। वह पीस वीमेन एक्रॉस द ग्लोब की सहअध्यक्षा और वन बिलियन राइजि़ंग की दक्षिण एशिया परिक्षेत्र की संयोजक भी हैं। उनके संघर्ष के मुद्दे हैं - जेंडर, विकास, शांति, सैन्यीकरण, मानवाधिकार और लोकतंत्र। उनकी ज़्यादातर किताबें इन्हीं मुद्दों को केंद्र में रखकर लिखी गई हैं। उन्होंने पोस्टर-बैनर, महिला आंदोलन के तमाम गीत, नारे, बच्चों की किताबें भी लिखी हैं। आंदोलनों, कार्यक्रमों के दौरान वह गीत गायन भी कर लेती हैं।

सिख विरोधी दंगों के दौरान वह नई दिल्ली के इंडिया गेट पर एक जुलूस में शामिल रहीं। उसमें उनकी मां और बेटी मीतो भी शरीक हुई थीं। उनकी मां आंदोलन के गीत के दौरान ढोलक बजातीं। आंदोलन के गीत गाया करतीं। उस जुलूस में तीन पीढ़ियां एक साथ शामिल हुई थीं। इसके बाद वह कई साल तक दिल्ली में सिखों के पुनर्वास के लिए काम करती रहीं। कमला भसीन बताती हैं कि 'मेरे पिता के गुज़रने के बाद मां भी मेरे पास साथ ही रहने लगीं। एक वक्त में संगठन चलाने के लिए उनके पास पैसे नहीं होते थे तो समर्थकों घर उनके ठिकाने हुआ करते थे। उन घरों में ही मीटिंग, नुक्कड़ नाटकों के रिहर्सल आदि हुआ करते। इससे सबसे बड़ा फायदा ये हुआ कि उन घरों के परिवार भी उनके साथ होते गए।

ये वही जमाना था, जब उनकी 18 महीने की बेटी मीतो अपने पिता के कंधे पर बैठ कर बलात्कार विरोधी आंदोलन में हिस्सा ले रही थी और उसके हाथों में एक प्ले कार्ड था जिस पर लिखा था बलात्कार मिटाओ, मेरा भविष्य बचाओ! हमारे यार-दोस्त ही हमारे बच्चों की मौसी और मामा हो जाते थे। हममें से कुछ के घरों पर दूसरे शहरों और देशों की नारीवादियों को भी ठहराया जाता था। उस ज़माने में हमारे लिए होटलों में ठहरना या आईआईसी या आईएचसी जैसे आलीशान होटलों अथवा सम्मेलन स्थलों पर मीटिंग बुलाना बड़ी बात थी। न तो हमारे पास अनुदान होते थे और न ही हमें महंगे होटलों में सम्मेलन या मीटिंगें करना सही लगता था।'

जागोरी से जुड़ी रहीं लेखिका वीणा शिवपुरी बताती हैं कि 'वर्ष 1993 में दिल्ली छूटने के साथ ही जागोरी का दफ़्तर भी छूट गया लेकिन 'सबला' कार्यकारिणी की समिति के नाते वह एक दशक से अधिक वक्त तक जागोरी से जुड़ी रहीं। अब वह 'हम सबला' के साथ हैं। लगभग तीन दशक तक उनका जागोरी से रिश्ता रहा है और उससे दिल का रिश्ता तो जीवन भर रहेगा। उन्नीस सौ अस्सी के दशक में वह महिला संगठनों के लिए विविध प्रकार की सामग्री का अनुवाद अंग्रेज़ी से हिंदी में करने लगी थीं। सबसे पहले वर्ष 1989 में उन्होंने कोटला मुबारकपुर की एक तिमंजि़ली इमारत में स्थित दफ़्तर में कदम रखा था। उस वक्त जागोरी में आभा, जुही, विका, सरोजिनी, सरोज, तुलसी आदि सक्रिय होती थीं।

वहां महिलाओं के मुद्दों पर अभियानों, धरनों और मोर्चों की योजनाएं बनतीं, गंभीर मुददों पर बहसें होती थीं। जागोरी के माहौल में गजब का अपनापन होता था। आपस में गले मिलने का चलन आम था। किसी अजनबी के आते ही कोर्इ न कोर्इ अपना काम छोड़कर उसका स्वागत करती, पानी का गिलास देती और फिर सुकून से उसकी बातें सुनती। वह एक ऐसी जगह थी, जहां हर कोर्इ अपने मन की बात कह सकती थी, बग़ैर इस डर के कि कोर्इ क्या सोचेगा। यहां हंसने, रोने, गुस्सा होने या चुपचाप बैठ जाने के लिए जगह थी, संभालने के लिए हमदर्द थे। पहली बार मैंने जाना कि कहीं बाहर से थक कर लौटने पर जब बिन कहे किसी के हाथ आपके कंधे सहलाने लगें तो क्या एहसास होता है।

जागोरी की नियमित बैठकों में हम सभी नए-पुराने, युवा और अनुभवी अपनी बात खुलकर करते थे। एक बार वर्ष 1992 में 8 मार्च की रात सरोजिनी नगर में नुक्कड़ नाटक करने के बाद मोमबत्तियां और मशालें लेकर निकला शांतिपूर्ण मार्च एम्स के चौराहे पर घेराव में बदल गया। घंटे भर यातायात थमा रहा। हमने अपनी एकता की ताक़त का एहसास तो कराया लेकिन बाद में हमे खुद ये नागवार गुजरा कि उस रात के वक्त घर लौटने वालों को बेवजह परेशानी उठानी पड़ी। शायद अस्पताल के मरीज़ों को भी तक़लीफ़ पहुंची हो। बाद में हमने उसका सामूहिक आत्मालोचन किया। अब तो कर्इ पीढि़यां बदल चुकी हैं।

आज भी जागोरी हमारी जीवन-संस्कृति का हिस्सा है। जागोरी ने मुझे जि़ंदगी भर के क़रीबी रिश्ते दिए, आत्मविश्वास दिया, कामकाजी जीवन को दिशा दी और यह एहसास कराया कि संसार में लाखों औरतें मेरी तरह सोचती हैं। मैं लेखिका थी। मित्रों और नारीवादी सोच ने मुझे यहां पहुंचा दिया। आंदोलनों के दौरान घरों की छतों पर कठिनाइयों में रात गुज़ारना जागोरी की मेरी याद में आज भी जि़ंदा है। औरतों के साथ हिंसक घटनाओं का प्रतिरोध हमारा मुख्य स्वर रहा है। भंवरी देवी कांड में जागोरी सर्वाधिक सक्रिय समूहों में से एक थी।'

'जागोरी' की हमसफर शांति का आंदोलनकारी जीवन भी कमल भसीन और वीणा शिवपुरी से कुछ अलग नहीं है। महिलाओं के मसलों पर वही संघर्ष का जुनून और वैसी ही गंभीर ललकार। शांति बताती हैं कि 'जागोरी का आफिस उन दिनो दिल्ली के साउथ एक्स्टेंशन पार्ट सेकंड में हुआ करता था। जागोरी के साथ रहते हुए मैंने बड़े शानदार दिन गुज़ारे। मैं प्रशिक्षण के सिलसिले में राजस्थान, उत्तर प्रदेश, हिमाचल प्रदेश जाया करती। जागोरी के बाद मैंने स्वतंत्र रूप से ट्रेनिंग करना शुरू कर दिया। काफी कुछ सीखा भी। मलिन और मजदूर बस्तियों, गरीब समुदायों में रही। मध्यम वर्ग की कार्यकर्ताओं से मदद मिली। नारीवाद ने न केवल महिलाओं के मुद्दों के बारे में मेरी समझ विकसित की बल्कि एक नई दुनिया से मुझे मिलाया।

सामाजिक और राजनैतिक संघर्षों से जोड़ा। हमारी कोशिशों ने राजनैतिक दलों का ध्यान आम इंसानों के मसलों की ओर खींचा। कई नागरिक संस्थाओं और आंदोलनों ने एक नारीवादी कार्यकता के रूप में मुझे आमंत्रित किया। लंबे समय तक दिल्ली के विभिन्न इलाकों नन्दनगरी, सीमापुरी, जहांगीरपुरी आदि में सक्रिय रही। उस समय हम हर मंगलवार को किराए के एक कमरे में सार्वजनिक जनसुविधाओं, पानी-बिजली की किल्लतों, औरतों के हक़, हिंसा आदि पर हम चर्चा करते, आंदोलनों की रूपरेखाएं बनाते। हमने सवाल उठाए कि हम सभी महिलाएं भी साइकिल चला सकती हैं। जमीन पर हम दरी-चटाई बिछाकर साथ खाते, रिपोर्ट लिखते, गाने गाते, नाचते भी। सावन में तो हम ऊँचे पेड़ों पर झूले लगाकर खूब झूलते। शाम को घर लौटते वक्त जंगल से घर के चूल्हे के लिए लकड़ियां भी चुन लाते। खूब मजा आता था, सच में।

जागोरी को लोग अपना घर कहा करते। बस्ती में महिलाओं के बीच चर्चा करने के लिए हम प्रशिक्षक फड़ का इस्तेमाल करते। हमने कई बार जलनिगम के दफ्तर के बाहर धरने, प्रदर्शन भी किए। उसी दौरान हमने खुद जमीन खोदी, पाइप लाए, जोड़े, बिछाए। दूसरी महिलाओं को भी ये काम सिखाया। हम सफल हुए। पानी मिलने लगा। हमने पुलिस वालों की जबरन उगाही के खिलाफ मुहिम चलाई। उस समय हर झुग्गी से हर हफ्ते दस रुपए वसूले जाते थे। हमने चार महिलाओं और चार पुरुषों को लेकर एक कमेटी बनाई, जो इन पुलिसवालों पर नजर रखने लगी। इसी तरह असम से लड़कियों के तस्करी पर महिला समूह की मीटिंग बुलाई। दक्षिणपुरी पहुंचीं। मिलकर रणनीति बनाई। लगभग बीस महिलाएं चुपके से उस झुग्गी में जा घुसीं, जहां असम से लाई गई एक लड़की को दुल्हन के रूप में रखा गया था। उस रात बिजली गुल थी। घुप्प अँधेरा था। झुग्गी के बाहर एक झाड़ू दिखी। हमने उसे सुलगा दिया। उसे लेकर कुछ महिलाएं झुग्गी के अंदर घुस गईं और कुछ बाहर पहरा देने लगीं। हमने एजेंट (दलाल) के साथ उस लड़की को भी बाहर खींच लिया। इस तरह के संघर्षों ने हमे पुरुष अत्याचारों से जूझने, सामना करने का साहस दिया। लेकिन जब मैं पलटकर अपनी ज़िन्दगी को देखती हूँ, अहसास होता है, मेरे बच्चे अनाथों की तरह पले, बढ़े। समय देती तो शायद वे भी पढ़-लिख जाते।'

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पत्रकार/ लेखक/ साहित्यकार/ कवि/ विचारक/ स्वतंत्र पत्रकार हैं। हिन्दी पत्रकारिता में 35 सालों से सक्रीय हैं। हिन्दी के लीडिंग न्यूज़ पेपर 'अमर उजाला', 'दैनिक जागरण' और 'आज' में 35 वर्षों तक कार्यरत रहे हैं। अब तक हिन्दी की दस किताबें प्रकाशित हो चुकी हैं, जिनमें 6 मीडिया पर और 4 कविता संग्रह हैं।

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