शबाना आजमी के जिंदगी से जुड़े हैं कई रोमांचक वाकये

पद्मश्री शबाना की पहली पसंद थे शेखर कपूर

0

मशहूर शायर कैफी आजमी एवं थिएटर आर्टिस्ट शौकत आजमी के घर पैदा हुईं हिंदी फिल्मों की मशहूर अदाकारा पद्मश्री शबाना आजमी का आज (18 सितम्बर) जन्मदिन है। लगभग 120 फिल्मों में काम कर चुकीं शबाना की खुद की जिंदगी का एक हिस्सा फिल्मी रोमांच जैसा है। उनके मौजूदा शौहर जावेद अख्तर उनकी दूसरी पसंद हैं।

शबाना शेखर कपूर को छोड़ कर जब जावेद अख्तर की जिंदगी में आईं, उन्हें मकबूलियत हासिल करने में अपने शौहर से इफरात मदद मिलती गई। घर में सियासी सोच के माहौल ने उन्हें सामाजिक मंचों तक पहुंचा दिया।

मशहूर शायर पिता कैफी आजमी एवं थिएटर आर्टिस्ट मां शौकत आजमी के घर 18 सितम्बर 1950 को पैदा हुईं हिंदी फिल्मों की मशहूर अदाकारा पद्मश्री शबाना आजमी की जिंदगी के साथ कई रोचक-रोमांचक वाकये जुड़े हुए हैं, जिनमें सबसे दिलचस्प है उनका दांपत्य जीवन। वह वर्तमान में प्रसिद्ध गीतकार जावेद अख्तर की धर्मपत्नी हैं। जावेद सबसे उनकी जिंदगी का पहला प्यार नहीं थे। उससे पहले शबाना का शेखर कपूर से याराना था। वह रिश्ता ज्यादा दिन सलामत नहीं रह सका। बाद में उन्होंने जावेद अख्तर से निकाह रचा लिया। शबाना आजमी के भाई बाबा आजमी सिनेमेटोग्राफर हैं। उनका बचपन क्रिएटिव नेचर में गुजरा।

पिता देश के मशहूर शायर और मां रंगमंच की कुशल अदाकारा, इससे अभिनय का टैलेंट शबाना को विरासत में हासिल हो चुका था। उन्होंने 1973 में अपने फिल्मी करियर की शुरुआत की थी। उनकी पहली ही फिल्म श्याम बेनेगल की 'अंकुर' की सफलता ने उनको एक झटके में बुलंदियों की ओर रवां कर दिया। इस पर उन्हें सर्वश्रेष्ठ अभिनेत्री का राष्ट्रीय पुरस्कार भी मिल गया। इसके बाद 1983 से 1985 तक लगातार तीन वर्षों तक उन्हें 'अर्थ', 'खंडहर' और 'पार' जैसी फिल्मों के लिए सर्वश्रेष्ठ अभिनेत्री के राष्ट्रीय पुरस्कार मिलते रहे। शबाना शेखर कपूर को छोड़ कर जब जावेद अख्तर की जिंदगी में आईं, उन्हें मकबूलियत हासिल करने में अपने शौहर से इफरात मदद मिलती गई। घर में सियासी सोच के माहौल ने उन्हें सामाजिक मंचों तक पहुंचा दिया। पूरे फिल्मी करियर में उनको चार बार फिल्मफेयर अवॉर्ड से सम्मानित किया गया। सन् 1978 में 'स्वामी', 1983 में 'अर्थ', 1985 में 'भावना' और 1999 में फिल्म 'गॉडमदर' के लिए यह पुरस्कार दिया गया। इसके बाद 1988 में उनको पद्मश्री से भी सम्मानित किया गया।

शबाना कहती हैं - 'अपना पैगाम है मोहब्बत, जहां तक पहुंचे।' वह अपनी जिंदगी के बीते दिन बयान करती हुई कहती हैं कि 'जानकी कुटीर में जब हम रहते थे, तब वहां जगह काफी कम थी, लेकिन हमारे घर बड़े-बड़े लोगों का आना-जाना लगा रहता था। फैज साहब (मशहूर शायर फैज़ अहमद फैज़) भी हमारे घर आते थे। फ़िराक गोरखपुरी, बेगम अख्तर, जोश मलीहाबादी जैसी शख्सियतों की घर में महफिलें जमती थीं। फैज साहब से भी घर जैसे रिश्ते थे। जब मैं मास्को में थी, तब वह मुझे वहां मिले थे, तो मुझे बड़ी खुशी हुई। उन्होंने मुझसे कहा - एक नई नज्म लिखी है...पढ़ो तो जरा। उस समय वह झेंप गईं, क्योंकि उन्हें उर्दू पढ़नी नहीं आती थी। जब उन्होंने ये बात फैज साहब से कही तो उन पर फैज साहब की डांट पड़ गई। फैज़ साहब ने कहा- कैसे नामाकूल मां-बाप हैं तुम्हारे, उर्दू पढ़नी नहीं सिखाई! यद्यपि उन्होंने फैज़ साहब को बताया कि वह उर्दू समझती हैं, केवल उसकी लिपि उन्हें नहीं आती है, लेकिन उनकी इन बातों का फैज साहब पर कोई असर नहीं पड़ा।'

120 से ज्यादा हिंदी और बंगाली फिल्मों में काम कर चुकीं शबाना बताती हैं कि 'यह सब चल ही रहा था, उसी बीच में उन्होंने फैज़ साहब को खुश करने के लिए कह दिया कि वह उनकी फैन हैं, उनके हजारों शेर उन्होंने पढ़े हैं। इसके बाद जो हुआ, सो क्या कहने। फैज साहब ने कहा कि जरा अपना पसंदीदा शेर सुनाना। तो उन्होंने सुना दिया - 'दिल से उठता है कि जां से उठता है, ये धुआं सा कहां से उठता है।' शेर तो मीर साहब का था, सुनकर फैज़ साहब और भी हक्के-बक्के। शबाना फिर भी कहां मानीं। उन्होंने पलट कर उससे भी बड़ी गलती करते हुए फैज़ साहब का शेर कहकर बहादुर शाह जफर का शेर सुना दिया - 'बात करनी मुझे मुश्किल कभी ऐसी तो ना थी।' इसके बाद तो उस दिन फैज़ साहब की नाराज़गी का कोई पारावार नहीं था।'

यह भी पढ़ें: अपने बारे में उल्टी-सीधी बातों को खुद हवा देते थे फ़िराक़ 

यदि आपके पास है कोई दिलचस्प कहानी या फिर कोई ऐसी कहानी जिसे दूसरों तक पहुंचना चाहिए, तो आप हमें लिख भेजें editor_hindi@yourstory.com पर। साथ ही सकारात्मक, दिलचस्प और प्रेरणात्मक कहानियों के लिए हमसे फेसबुक और ट्विटर पर भी जुड़ें...

पत्रकार/ लेखक/ साहित्यकार/ कवि/ विचारक/ स्वतंत्र पत्रकार हैं। हिन्दी पत्रकारिता में 35 सालों से सक्रीय हैं। हिन्दी के लीडिंग न्यूज़ पेपर 'अमर उजाला', 'दैनिक जागरण' और 'आज' में 35 वर्षों तक कार्यरत रहे हैं। अब तक हिन्दी की दस किताबें प्रकाशित हो चुकी हैं, जिनमें 6 मीडिया पर और 4 कविता संग्रह हैं।

Related Stories

Stories by जय प्रकाश जय