मिलिए रियल लाइफ में बचपन में देखे सपने पूरे करने वाले 'थ्री इडियट्स' से

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‘थ्री इडियट्स’ फिल्म से मिलती जुलती कहानी कुछ साल पहले यूपी के मेरठ शहर में आकार ले रही थी। जहां तीन दोस्त अलग-अलग क्षेत्रों में कुछ बड़ा करने का सपना देख रहे थे। दिलचस्प बात ये है कि उन तीनों दोस्तों का सपना आज पूरा हो चुका है।

निशांत जैन, वतन और सुमित अरोड़ा
निशांत जैन, वतन और सुमित अरोड़ा
इन तीनों दोस्तों की मुलाकात मेरठ के हिंदी मीडियम स्कूल की चौथी कक्षा में हुई थी। तीनों की रुचियां अलग थीं, लेकिन एक बात सबमें कॉमन थी और वह थी घर की हालत। तीनों दोस्त ऐसे परिवार से आते थे, जहां आर्थिक संपन्नता न के बराबर थी।

आपने आमिर खान की बहुचर्चित फिल्म ‘थ्री इडियट्स’ तो देखी ही होगी। फिल्म में तीन ऐसे दोस्तों की कहानी थी, जो अपने सपनों को पूरा करने के लिए कॉलेज से विदा लेते हैं और फिर दस साल बाद मिलने का वादा करते हैं। उनके भीतर कुछ कर गुजरने का जुनून और कुछ हासिल करने की तड़प होती है। खैर ये तो फिल्म की कहानी थी, लेकिन फिल्में भी तो हकीकत से ही बनती हैं। ‘थ्री इडियट्स’ फिल्म से मिलती जुलती कहानी कुछ साल पहले यूपी के मेरठ शहर में आकार ले रही थी। जहां तीन दोस्त अलग-अलग क्षेत्रों में कुछ बड़ा करने का सपना देख रहे थे। दिलचस्प बात ये है कि उन तीनों दोस्तों का सपना आज पूरा हो चुका है।

मेरठ शहर के उन थ्री इडियट्स के नाम हैं निशांत जैन, सुमित अरोड़ा और वतन सिंह। इससे पहले कि हम आपको इन तीनों मित्रों का जीवन परिचय दें, बता देते हैं कि ये कहानी मेरठ जैसे छोटे शहर की उन गलियों में घटित हुई जहां के बच्चे हिंदी मीडियम स्कूल में पढ़ते हैं।यह उन स्कूलों के लिए भी गौरव की बात है जिनके बच्चे आज किसी मुकाम पर पहुंच चुके हैं।

तो अब बात करते हैं उन तीनों दोस्तों की, जो उम्र के 30वें पड़ाव के आसपास हैं। पहले निशांत जैन जो कि हिंदी माध्यम से आईएएस टॉपर रहे हैं, दूसरे सुमित अरोड़ा, जो हाल ही में सौ करोड़ की कमाई का आंकड़ा पार करने वाली हिंदी फिल्म 'स्त्री' के डायलॉग लेखक हैं और तीसरे वतन सिंह जिनका मन कार्टून और स्केचिंग में लगता था, आज देश के सबसे बड़े चैनलों में से एक न्यूज18 में बतौर कार्टूनिस्ट काम कर रहे हैं।

इन तीनों दोस्तों की मुलाकात मेरठ के हिंदी मीडियम स्कूल की चौथी कक्षा में हुई थी। तीनों की रुचियां अलग थीं, लेकिन एक बात सबमें कॉमन थी और वह थी घर की हालत। तीनों दोस्त ऐसे परिवार से आते थे, जहां आर्थिक संपन्नता न के बराबर थी। लेकिन ये इतने मनमौजी और पढ़ाकू थे कि घर की माली हालत का इन पर कोई असर नहीं पड़ता। छठवीं या सातवीं की बात होगी जब इन दोस्तों की प्रतिभाएं सामने निकलकर आने लगीं। वतन ने उस उम्र में ड्रॉइंग शीट पर कार्टून कैरेक्टर गढ़ने शुरू कर दिए थे और सुमित व निशान्त का मन लेखन की तरफ झुकने लगा था। सुमित को जहाँ गद्य और व्यंग्य विधाएँ ज़्यादा आकर्षित करती थीं, वहीं निशान्त को कविताएँ और ग़ज़लें।

ये दोस्त अपनी पढ़ाई में इतने अव्वल थे कि दसवीं की कक्षा में उन्होंने फर्स्ट डिविजन हासिल किया। ये वो वक्त होता है जब आजकल के बच्चे अपने भविष्य के बारे में सोचने लगते हैं और उन्हें पता हो जाता है कि आगे चलकर क्या बनना है। पर इनके घर की हालत ऐसी थी कि ये डॉक्टर, इंजीनियर, सीए बनने के बारे में सोच भी नहीं सकते थे। इन सब पढ़ाई के लिए महंगी फीस की जरूरत पड़ती और दूसरी बात ये भी थी कि इनका मन डॉक्टर, इंजीनियर बनने का था भी नहीं। तीनों लीक ले हटकर कुछ बड़ा करना चाहते थे।

तीनों ने अपने-अपने नैचुरल टैलेंट के मुताबिक़ क़िस्मत आज़माने का निर्णय लिया और चल पड़े अपनी मंज़िल को सच करने। पढ़ाई और छोटे-मोटे ख़र्चों के लिए दसवीं के बाद से ही पार्ट टाइम नौकरी करना और अख़बार-पत्रिकाओं में क्रिएटिव राइटिंग या प्रूफ़रीडिंग करके कामचलाऊ कमाई हो ही जाती थी। चौथी क्लास से चला स्कूल का ये सफर अब संघर्षों की राह पर बढ़ चला था। तीनों ने अच्छे नंबर से बारहवीं की कक्षा भी पास की लेकिन अभी भी उनके करियर की दिशा किसी को मालूम नहीं थी। वैसे पढ़ाई-लिखाई में तीनों ही तेज़ थे, पर सर्वाधिक ‘पढ़ाकू’ दोस्त निशान्त के मन में आई.ए.एस. अधिकारी बनने का ख़्वाब घर करने लगा था। उधर वतन के कार्टून 18 साल की उम्र में लोकल अख़बारों में छपने लगे थे। सुमित के आर्टिकल भी अख़बार-पत्रिकाओं में जगह बनाने लगे थे।

बस इसी के बाद तीनों अपने-अपने सपनों की मंज़िल की ओर राह पकड़ने लगे। सुमित 18 की उम्र में बड़ा रिस्क लेकर फ़िल्म राइटिंग में हाथ आज़माने मुंबई निकल पड़े। वहां उन्होंने छोटे परदे की दुनिया के लिए काम शुरू किया। टीवी पर सास-बहू सीरियल से लेकर थ्रिलर तक जमकर डायलोग लिखे और अपनी पहचान बनाई। लेकिन सुमित का सपना बड़ा था और वे फिल्मों के लिए लिखना चाहते थे। उन्होंने ‘ऑल इज़ वेल’ मूवी भी लिखी और ‘वाइटशर्ट’ शॉर्ट फ़िल्म भी बनायी। 18 साल की उम्र से हुए इस फ़िल्म राइटिंग के सफ़र का मील का पत्थर बनी ‘स्त्री’ फ़िल्म, जिसके व्यंग्यात्मक और दिलचस्प संवाद आजकल चर्चाओं के केंद्र में हैं, और देशभर के बॉलीवुड पत्र-पत्रिकाओं में 30 साल के सुमित के डायलॉग़्स की धूम है। सुमित बताते हैं कि उनके बचपन के साथी, वतन और निशान्त उनकी सतत प्रेरणा हैं और उनसे नियमित होने वाली दिलचस्प बातें और गप्पेबाज़ी उन्हें बेहतर डायलोग लिखने में मदद करते रहे।

वतन को मेरठ में एक बड़े अख़बार में काफ़ी वक़्त कार्टून और स्केच बनाने के बाद, दिल्ली स्थित एक बड़े न्यूज़ चैनल से बुलावा मिला और आज 30 साल के वतन इलेक्ट्रोनिक मीडिया के बड़े कार्टूनिस्ट में से एक हैं।

उधर निशान्त का संघर्षों भरा सफ़र जारी रहा। IAS बनने की उनकी ज़िद उनका इम्तिहान ले रही थी। निशान्त ने कुछ वक़्त पोस्टल विभाग में भी काम किया पर लगातार अपनी पढ़ाई जारी रखी। हिंदी में एम.ए. किया और नेट-जेआरएफ की परीक्षा भी उत्तीर्ण की। दिल्ली यूनिवर्सिटी में एम.फ़िल. में प्रवेश हुआ और निशान्त अपने सपनों को पंख लगाने दिल्ली चले आए।

यूपीएससी का पहला प्रयास दिया और प्रारम्भिक परीक्षा पास न कर सके। निराशा हुई, पर इस बीच संसद में ट्रान्सलेटर बन गए। दोबारा हिम्मत जुटाकर आई.ए.एस. की परीक्षा दी, वह भी हिंदी मीडियम में। प्री, मेन और इंटरव्यू सब उत्तीर्ण करते गए और 13वीं रैंक हासिल कर कीर्तिमान रच डाला। आज 30 साल के निशान्त एक युवा आई.ए.एस. अधिकारी हैं और हिंदी माध्यम के लाखों परीक्षार्थियों के प्रेरणास्त्रोत भी।

तीनों दोस्त आज भी एक दूसरे से जुड़े हुए हैं और ख़ूब बतियाते हैं। क़िस्से-कहानियाँ साझा करने में इनका कोई सानी नहीं। तीनों दोस्तों की यह सच्ची और दिलचस्प कहानी न केवल छोटे शहरों के टैलेंट को साबित करने की एक जादुई सी कहानी है, बल्कि आम पृष्ठभूमि के तीन दोस्तों की अटूट दोस्ती की दास्तान भी।

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