बेटी की मौत के बाद चतुर्थ श्रेणी कर्मचारी ने लिया 45 गरीब बेटियों की पढ़ाई का जिम्मा

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आज जबकि पूरी दुनिया में छह से सत्रह आयुवर्ग की लगभग 13 करोड़ लड़कियां गरीबी के कारण स्कूल नहीं जा पा रही हैं, कर्नाटक के एक स्कूल के चतुर्थ श्रेणी कर्मचारी बासवराज ने अपनी जेब से 45 गरीब छात्राओं की फीस चुकाई है। उन्होंने आगे भी उनकी पढ़ाई का जिम्मा उठाने का संकल्प लिया है।

वर्ल्ड बैंक की एक रिपोर्ट में बताया गया है कि बेटियों को शिक्षा नहीं देने की कीमत दुनिया को हजारों अरब डॉलर के रूप में चुकानी पड़ रही है। रोजी-रोजगार में उनकी भागीदारी न होने के कारण ऐसा हो रहा है। 

पेशे से चतुर्थ श्रेणी कर्मचारी (चपरासी) कर्नाटक के बासवराज ने वह कर दिखाया है, जिसकी आज के जमाने में सिर्फ कल्पना ही की जा सकती है। वह दुनिया छोड़ चुकी अपनी बेटी की यादों को अपने एक प्रेरणादायक कदम से साझा करते हुए गरीब परिवारों की पैंतालीस लड़कियों की स्कूल फीस अपनी जेब से चुकाई। इसी तरह 'बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ', 'बेटी है तो कल है' जैसे स्लोगन से प्रेरित रिटायर्ड डीएसपी की बेटी रचना सिंह गाजियाबाद में 'बिजनेस वुमन' ग्रुप के साथ मिलकर बेटियों को आगे बढ़ाने में जुटी हुई हैं। वह चार गरीब लड़कियों की पढ़ाई-लिखाई का जिम्मा स्वयं उठा रही हैं। मध्य प्रदेश के अंबाह में आचार्य आनंद क्लब और रोटरी ई क्लब ने तीन दर्जन से अधिक बेटियों को पूरी शिक्षा दिलाने का संकल्प लिया है। बेटियों की पढ़ाई को लेकर इधर कुछ वर्षों में पूरे भारतीय समाज में उत्साहजनक जागरूकता आई है।

वर्ल्ड बैंक की एक रिपोर्ट में बताया गया है कि बेटियों को शिक्षा नहीं देने की कीमत दुनिया को हजारों अरब डॉलर के रूप में चुकानी पड़ रही है। रोजी-रोजगार में उनकी भागीदारी न होने के कारण ऐसा हो रहा है। दुनिया भर में छह से सत्रह आयुवर्ग की लगभग 13 करोड़ लड़कियों को स्कूल नहीं भेजा जा रहा है। गरीब देशों में दो तिहाई बच्चियां प्राइमरी स्कूल की पढ़ाई भी पूरी नहीं कर पा रही हैं। यदि हर लड़की को 12 साल तक स्तरीय स्कूली शिक्षा मिले तो महिलाओं की कमाई सालाना 15000 से 30,000 अरब डॉलर हो सकती है। इससे लड़कियों के बाल विवाह, बाल मृत्यु-दर, कुपोषण, घरेलू हिंसा और जनसंख्या वृद्धि-दर में कमी आ सकती है। लैंगिक असमानता आज वैश्विक विकास की राह में सबसे बड़ी बाधा बनी हुई है। हर लड़की की कम से कम प्राइमरी एजुकेशन तो हो ही जानी चाहिए।

रिपोर्ट में कहा गया है कि शिक्षा से वंचित होने के कारण एक-दो नहीं बल्कि करोड़ों लड़कियां इंजीनियर, पत्रकार, सीईओ, शिक्षक बनने से रह जाती हैं। बाल अधिकारों के लिए काम करने वाली एक संस्था 'सेव द चिल्ड्रन' की एक रिपोर्ट बताती है कि दुनिया भर में हर साल 75 लाख लड़कियां बाल विवाह का शिकार हो जाती हैं। बाल विवाह लड़कियों को न सिर्फ शिक्षा के अवसरों से वंचित करता है बल्कि उनकी सेहत पर भी बुरा असर डालता है। इन लड़कियों पर घरेलू हिंसा और यौन प्रताड़ना का खतरा भी बना रहता है। इसकी बुनियादी वजह गरीबी मानी गई है। अपनी जिम्मेदारियों से बचने के लिए भी तमाम मां-बाप अपनी बेटियों की जल्दी से शादी करा देते हैं। रिपोर्ट के मुताबिक दुनिया की लगभग 10 करोड़ लड़कियों के लिए बाल-विवाहों से बचाने का कानून ही नहीं बना है।

कालाबुर्गी (कर्नाटक) के बासवराज की बेटी की बीमारी से मौत हो गई थी। लंबे समय तक बेटी की यादें बासवराज को तड़पाती रहीं। तभी उन्होंने एक दिन कुछ बेटियों के जीवन में उजाला भरने का अपने मन में एक प्रेरक दृढ़ संकल्प लिया। इसके बाद उन्होंने एमपीएचएस गवर्नमेंट हाईस्कूल में पढ़ रही 45 गरीब लड़कियों की स्कूल फीस अपनी तरफ से चुकाई। बासवराज उसी स्कूल में चपरासी हैं। आज बासवराज को पूरी दुनिया से शाबासियां मिल रही हैं। लोग कह रहे हैं कि सिर्फ गरीब आदमी ही लोगों की दिक्कतों को समझ सकता है। क्या कोई अमीर आदमी ऐसा कर सकता है? अमीर तो सिर्फ अपने घर की शादियों, पार्टियों आदि में पैसे की बरबादी करते हैं। कुछ लोग चैरिटी करके लोगों की मदद करते हैं और उनके लिए भगवान का रूप बन जाते हैं लेकिन बासवराज ने जो किया है, वाकई काब़िलेतारीफ़ है। बासवराज का कहना है कि वह आगे भी इन 45 बेटियों की फीस अपनी जेब से जमा करते रहेंगे। इससे वे सभी गरीब लड़कियां अपनी आगे की पढ़ाई को लेकर काफी उत्साहित हैं। वह कहती हैं कि हम गरीब परिवार से हैं। हम स्कूल फीस देने में असमर्थ हैं। बासवराज सर ने ये नेक काम किया है। भगवान उनकी बेटी की आत्मा को शांति दे।

हमारे देश में बासवराज की तरह अन्यत्र भी समाज का जागरूक तबका बेटियों की पढ़ाई को लेकर अब काफी गंभीर नजर आने लगा है। गाजियाबाद (उ.प्र.) में सक्रिय एक संस्था 'बिजनेस वुमन' ने भी इस दिशा में प्रेरक पहलकदमी की है। इस संस्था से जुड़ीं रचना सिंह बेटियों को आगे बढ़ाने के लिए समय और पैसा दोनों खर्च कर रही हैं। वह लड़कियों को योग और व्यापार के गुर सिखा रहीं हैं। चार गरीब लड़कियों की पढ़ाई की जिम्मेदारी उठा रही हैं। रचना सिंह के पिता रिटायर्ड डीएसपी और पति ज्युडिशियल अफसर हैं।

रचना सिंह का खुद का बिजनेस है। बेटियों को आगे बढ़ाने की प्रेरणा उन्हें अपने पिता से मिली है। वह लड़कियों के लिए जगह-जगह शिविर लगाती रहती हैं। इसके लिए उन्होंने अलग से अपना 'दिव्य क्रम योग फाउंडेशन' बनाया हुआ है। वह गाजियाबाद, मेरठ और गौतमबुद्धनगर के जेलों में बंद महिला बंदियों के लिए भी शिविर लगा चुकी हैं। लड़कियों को योग सिखाने के पीछे उनको आत्मरक्षात्मक दृष्टि से उन्हे स्वावलंबी बनाना है। वह गरीब लड़कियों को आत्मनिर्भर बनाने के लिए फैशन डिजानर्स उन्हें प्रशिक्षण भी दिलाती हैं। अब तक वह लगभग पचास महिलाओं को डिजाइनिंग और सिलाई का प्रशिक्षण दिला चुकी हैं। वह चार गरीब लड़कियों के कॉपी-किताब, फीस आदि की खुद जिम्मेदारी उठा रही हैं।

इसी तरह मध्य प्रदेश के अंबाह (मुरैना) में गरीब परिवारों की तीन दर्जन से अधिक बेटियों की शिक्षा का संपूर्ण भार आचार्य आनंद क्लब और रोटरी ई क्लब अंबाह ने निभाने का संकल्प लिया है। प्रथम चरण में तेजपालपुरा की एक दर्जन से अधिक बेटियों को चिन्हित किया गया। दूसरे चरण में बाल्मीकि और अयोध्या बस्ती से बेटियों को चिन्हित कर उनकी शिक्षा की जिम्मेदारी ली गई। दोनो क्लब राज्य महिला आयोग की पहल पर बेटी पढ़ाओ-बेटी बढ़ाओ के उपक्रम में अंबाह अंचल की आर्थिक रूप से कमजोर बेटियों की शिक्षा में आ रही रुकावटें दूर कर रहे हैं। अब तक तीन दर्जन बेटियों को स्कूल ड्रेस, पुस्तकें, कॉपी, स्कूल बैग, पेन, ड्राइंग बाक्स, लंच बॉक्स, कलर्स, स्वेटर, जूते-मौजे सहित अन्य पठन-पाठन सामग्री दी गई है।

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पत्रकार/ लेखक/ साहित्यकार/ कवि/ विचारक/ स्वतंत्र पत्रकार हैं। हिन्दी पत्रकारिता में 35 सालों से सक्रीय हैं। हिन्दी के लीडिंग न्यूज़ पेपर 'अमर उजाला', 'दैनिक जागरण' और 'आज' में 35 वर्षों तक कार्यरत रहे हैं। अब तक हिन्दी की दस किताबें प्रकाशित हो चुकी हैं, जिनमें 6 मीडिया पर और 4 कविता संग्रह हैं।

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