एक जीत, जिसने बदल दिया हिंदुस्तान

1911 में मोहन बागान फुटबॉल टीम की ऐतिहासिक जीतब्रिटेन की सबसे बड़ी, अच्छी और अभिजात टीम को दी मातजब नंगे पांव बंगाली लड़के खेले अंग्रेजों के खिलाफ मैच "मोहन बागान कोई फुटबॉल टीम नहीं है। यह तो धूल-धूसरित उत्पीडि़त देश है जिसने बस सिर उठाना शुरू किया है।"

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क्रिकेट का गुणगान भारत के राष्ट्रीय मनोरंजन और हमारे मुख्य खेल के रूप में किया जाता है। इसी संवेदना को आशुतोष गोवारिकर और आमिर खान ने भुनाया था जब उनलोगों ने फिल्म लगान बनाई थी - एक ऐसी फिल्म जिसमें अपने ऊपर लादे जाने वाले प्रतिशोधमूलक करों से मुक्ति के लिए गांव के लडकों ने अभिजात ब्रितानी टीम को हराया था। फिल्म में जीत दो रूपों में खास थी - महज इसलिए नहीं कि यह औपनिवेशिक शासन के विरुद्ध जीत थी बल्कि इसलिए भी कि यह जीत खेल का आविष्कार करने वालों के खिलाफ भी थी। हमलोगों को इतिहास का पता है कि लगान ने वैश्विक सिनेमा में अपनी जगह बनाई लेकिन हमलोगों को ठीक इसी प्रकार के एक खेल का पता नहीं है जिसने इतिहास के पन्नों में जगह बनाई थी।

वर्ष 1911 के भारत की कल्पना कीजिए। हिंदु-मुसलमान आबादी के आधार पर देश में पूर्वी बंगाल और पश्चिमी बंगाल के बीच विभाजन हुआ था। ब्रितानियों की 'बांटो और राज्य करो' की नीति से देशभर के लोग गुस्से में थे, हालांकि भारत के वायसराय लॉर्ड कर्जन इस बात पर जोर देते रहे थे कि यह प्रशासन को अधिक कुशल बनाने के लिए किया गया था। यह दलील असफल हो गई थी और 1911 में ही बंगाल फिर से एक हो गया था। हालांकि उससे भड़के सांप्रदायिक द्वेष की परिणति 1947 में स्थायी विभाजन में हुई और अभी भी यह गंभीर मुद्दा बना हुआ है जिसका सामना देश कर रहा है।

उस समय के भारत में रहने का अर्थ था सिर से लेकर पांव तक अंग्रेजों का गुलाम। आजादी और सम्मान छिनते समय भी उनके छीनने वालों के साथ नम्र और दासवत रहना पड़ता हो, देश को टुकड़ों में बंटते देखना पड़ता हो और फिर उसे जोड़ दिया जाता हो, लेकिन उसमें आपकी कोई भूमिका न हो; अन्याय होने पर आप गुस्से में खौल रहे हों, तब भी इस मामले में कुछ करने की शक्ति आपके पास नहीं हो। सत्ता पर ब्रितानियों का एकाधिकार था जो शिक्षा में, सरकार चलाने में या दैनंदिन जीवन में उसका क्रूरतापूर्वक उपयोग किया करते थे। लेकिन खेल के क्षेत्र में झुकाव एकतरफा नहीं होता है। खेल नहीं पहचानता है कि कौन मालिक है और कौन नौकर। इसमें मानव की ताकत और जोश की पूछ होती है और इसी कारण हमारे नायक जीत गए थे।

इस संदर्भ में भारत में फुटबॉल के इतिहास के अन्वेषक विवेक मेनेजेस लिखते हैं, "वर्ष 1911 में (मोहन) बागान के नंगे पांव बंगालियों ने ब्रितानी सेना के यॉर्कशायर रेजिमेंट को मैच के अंतिम पांच मिनट में दो गोल दागकर हरा दिया था और इंडियन फुटबॉल ऐसोसिएशन का शील्ड जीत लिया था। 'लगान' का वह वास्तविक क्षण खुशी से झूमते 60,000 प्रशंसकों के समक्ष दृश्यमान हुआ था। समाचारपत्रों ने आह्लादित होकर लिखा था, ‘मोहन बगान महज फुटबॉल टीम नहीं है। यह तो धूल-धूसरित उत्पीडि़त देश है जिसने सिर उठाना शुरू किया है।"

खेल इतिहासकार बोरिया मजूमदार ने लिखा है, "भारतीयों के अंदर स्वाग्रह (सेल्फ-एसर्सन) के लिए संघर्ष में विेजेता बनने की दबी चाहत वर्ष 1911 में थोड़े समय के लिए मूर्त सच्चाई बन गई। राष्ट्रीय फुटबॉल टीम के तौर पर मोहन बगान की स्थिति ने उन्हें साम्राज्यवादियों के खिलाफ भारत के संघर्ष में एक संघर्षरत इकाई बना दिया। मोहन बगान राष्ट्रीय संघर्ष में वंदे मातरम के उद्घोष का पर्यायवाची बन गया था। यूरोपीय टीमों के साथ उनके मैचों को राज के खिलाफ संघर्ष के बतौर देखा जाता था और मोहन बगान और कलकत्ता फुटबॉल टीम के बीच मैच को भी इसी आलोक में देखा गया था।"

इस प्रसिद्ध मैच के पहले मोहन बगान ने ट्रेड्स कप जैसे छोटे-मोटे मैच जीतने के लिए कुछ यूरोपीय टीमों को हराया था। लेकिन उन प्रतियोगिताओं में कोई प्रमुख ब्रितानी टीम नहीं थी। 29 जुलाई 1911 को मोहन बगान को ब्रितानी सेना की इलीट शाखा ईस्ट यॉर्कशायर रेजीमेंट के खिलाफ खेलना था। तनाव चरम पर पहुंच गया था क्योंकि देश भर से भारतीय इस संघर्ष का परिणाम देखने के लिए कलकत्ता में इकट्ठा हो गए थे। पड़ोसी राज्यों से लोगों के आने के चलते विशेष स्टीमरों की व्यवस्था करनी पड़ी थी। ट्राम ठसाठस भरे थे और सड़कों पर भीड़ उमड़ रही थी। यह संभवतः पहला मौका था जब बंगाल में टिकट ब्लैक में बेचे जा रहे थे - दो रुपए के टिकट पंद्रह रुपए में जो उस समय के लिए बहुत बड़ी रकम थी। स्टेडियम में एक ओर संपन्न कलकतिया बाबू लोग बैठे थे। दूसरा हिस्सा अंग्रेज दर्शकों के लिए आरक्षित था। अन्य लोग पेड़ों और छतों पर जमे हुए थे और अपनी गरदनें लंबी किए खेल देख रहे थे। वातावरण भावुकता से भरा था।

भीड़ इतनी अधिक थी कि उद्घोषक स्कोर की घोषणा नहीं कर सके। अतः उनलोगों ने आकाश में पतंगें उड़ाकर इसकी घोषणा कीं। दर्शकों ने अपनी-अपनी टीमों का जोर-शोर से समर्थन किया। अंग्रेज महिलाओं ने तो मोहन बगान के खिलाडि़यों के पुतले भी जलाए। यह बहुत तनावपूर्ण मैच था जिसमें दोनो टीमें अधिकांश समय में बिल्कुल बराबरी का प्रदर्शन कर रही थीं। एक समाचारपत्र की खबर एक घटना के बारे में बताती है जिसमें देशी ईसाई और अंग्रेज एक ही पक्ष में थे और पहले पक्ष के किसी ने दूसरे पक्ष से ताजा स्कोर के बारे में पूछने की गुस्ताखी की थी और जवाब में उसे जोरदार थप्पड़ मिला था।

खेल के सत्तासीवें मिनट में, जब विजय की उम्मीद क्षीण दिख रही थी, अभिलाष घोष को कप्तान से एक पास मिला और उनके ताकतवार शॉट ने उसे गोल में बदल डाला। मोहन बगान क्लब इसका वर्णन इस रूप में करता है, "कुछ सेकेंड के अंदर ही पूरा कलकत्ता जैसे पटाखों की तरह गरज उठा। मैदान में कमीजों, छडि़यों और जूतों की तो जैसे बारिश होने लगी। अंग्रेज तेजी से बाहर निकल गए। 'वंदे मातरम' और 'मोहन बगान की जय' की आवाज हर तरफ गूंजने लगी।" समाचारपत्र मुसलमान ने खबर छापी, "मुस्लिम स्पोर्टिंग क्लब के सदस्य तो लगभग पगला गए थे और अपने हिंदू भाइयों की जीत पर खुशी से मैदान में लोटपोट हो रहे थे।"

इस ऐतिहासिक जीत ने आजादी के संघर्ष को चिरवांछित उत्साह से भर दिया। समाचारपत्र इंग्लिशमैन (अब स्टेट्समैन) ने इस जीत के प्रभाव का संक्षिप्त सारांश प्रस्तुत किया, "इस मिथक को तोड़कर, कि ब्रितानी जीवन के हर क्षेत्र में अजेय हैं, मोहन बगान ने वह कर दिखाया है जो कांग्रेसी और स्वदेशी वाले कभी भी नहीं कर सके।" राष्ट्रवाद की उत्साहपूर्ण भावना यूरोपीय लोगों की उदासी के समानांतर चल रही थी। मजूमदार लिखते हैं, "देशी भाषा की एक पत्रिका में खबर छपी कि मैच के तत्काल बाद शहर का यूरोपीय भाग अंधेरा और उदास दिख रहा था जो दर्शा रहा था कि कुछ दुखद घटना घटी है। इंग्लिशमैन ने खबर प्रकाशित की कि कलकत्ता के 'साहब' इलाके हार के बाद अंधेरे में लिपटे थे। कुछ यूरोपीय लोगों ने अपनी कड़वाहट जाहिर भी की।"

मोहन बगान आइएफए शील्ड जीतने वाली पहली एशियाई टीम थी। विडंबना की बात है कि अगली बार उनलोगों ने यह शील्ड 1947 में ईस्ट बंगाल क्लब को 1-0 से हराकर जीती। मजूमदार इसका सर्वोत्तम निष्कर्ष निकालते हैं जब वह कहते हैं कि, "भारतीय राष्ट्रवाद की व्यापक गाथा में अपेक्षाकृत उपेक्षा के बावजूद, 1911 को भारतीय खेल के सामाजिक इतिहास में एक ऐतिहासिक घटना के बतौर हमेशा याद किया जाएगा।" इस कहानी का स्मरण महज खेल के क्षेत्र में नहीं, जीवन के क्षेत्र में करें और खिलाडि़यों का सम्मान शानदार फुटबॉल खिलाडि़यों के बतौर ही नहीं, स्वतंत्रता संग्राम के सेनानियों के तौर पर करें जिसके वे सचमुच हकदार हैं।