जानिए कैसे ये युवा वैज्ञानिक मातृ एवं शिशु स्वास्थ्य सुधार के लिए कर रहे हैं बॉयोटेक्नोलॉजी का उपयोग

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आज टेक्नोलॉजी के ज़रिए कई जीवन रक्षक प्रणालियों का इस्तेमाल किया जा सकता है। इसी के मद्देनज़र केआईआईटी प्रौद्योगिकी बिजनेस इनक्यूबेटर ने बीआईआरएसी के साथ मिलकर एसआईआईपी नामक एक प्रोग्राम की शुरुआत करी है। इस प्रोग्राम का उद्देश्य मातृ एवं शिशु स्वास्थ्य जैसे क्षेत्र की समस्याओं को सामने लाना और उन्हें बेहतर बनाना है।

18 महीने पुराने इस प्रोग्राम एसआईआईपी के ज़रिए आये दिन नए - नए शोध किये जा रहे हैं, जिनकी बदौलत मातृ एवं शिशु स्वास्थ्य के क्षेत्र को विकसित कर उन्हें इस योग्य बनाया जा रहा है कि एक साधारण आदमी की पहुँच वहाँ तक हो सके। इस प्रोग्राम का डिज़ाइन कुछ ऐसा है कि इसने आज कई पुराने मिथकों और प्रोटोटाइप को दरकिनार कर दिया है। आपको बता दें कि बीआईआरएसी ने स्पर्श नाम की एक स्कीम निकाली है, जिसकी बदौलत मातृ एवं शिशु स्वास्थ्य के क्षेत्र में 4 बड़े अविष्कार किये जा रहे हैं जो पूर्णतः बायो टेक्नोलॉजी पर काम करते हैं और यहाँ बीआईआरएसी प्रत्येक शोध के लिए 5 लाख रुपए की ग्रांट देगा।

केआईआईटी - टीबीआई का साझा प्रयास

भुवनेश्वर, स्थित केआईआईटी के इस प्रयास केआईआईटी – टीबीआई को 2009 में स्थापित हुए एनएसटीईडीबी का समर्थन प्राप्त है, जिसके अंतर्गत बेहतर सुविधाओं के माध्यम से उद्यमशीलता को अलग – अलग चरणों में तैयार किया जाता है। ज्ञात हो कि ओड़िशा में मौजूद टीबीआई को वर्ष 2004 में यूबीआई इंडेक्स द्वारा सबसे अच्छे विश्वविद्यालय आधारित व्यापार इन्क्यूबेटरों में से एक के रूप में सूचीबद्ध किया गया है।

केआईआईटी प्रौद्योगिकी बिज़नेस इनक्यूबेटर ने अब तक जैव प्रौद्योगिकी, सूचना और संचार प्रौद्योगिकी, आईटी, जैव चिकित्सा प्रौद्योगिकी के क्षेत्रों में काम करने वाली तकरीबन 37 कंपनियों को अपने से जोड़ा है, जिसमें हेल्लोडॉक्टर24x7, इन्नोवाडोर्स लैब, इन्क्यूबाटीस रोबोटिकवारेस, अजातुस सॉफ्टवेयर जैसी नामी गिरामी कम्पनियाँ शामिल हैं। वर्तमान में इनके पास 19 इन हाउस इन्क्यूबाटीस हैं। साथ ही केआईआईटी – टीबीआई एशिया प्रशांत इनक्यूबेटर नेटवर्क (एपीआईएन) का भी एक सदस्य है।

केआईआईटी – टीबीआई के सीईओ मृत्युंजय के अनुसार “ यदि विचार सही है तो उसे कहीं भी जगह मिल सकती है और यदि इसे ठीक से विकसित किया जाये तो इसे कई क्षेत्रों जैसे शिक्षा, स्वास्थ्य, कृषि, समाचार और मीडिया, उपयोगिताओं, उत्पादों, ई-कॉमर्स इस्तेमाल कर बड़ी कामयाबी हासिल करी जा सकती है”।

ओड़िशा पर बात करते हुए मृत्युंजय कहते हैं किक्षेत्र फल के हिसाब से ओड़िशा भारत का पांचवा और जनसँख्या की दृष्टि से ग्यारहवां सबसे बड़ा राज्य है। राजधानी भुवनेश्वर आज स्मार्ट सिटी की लिस्ट में है साथ ही अगले पांच सालों में भारत सरकार इसे और बेहतर बनाने के लिए 50,000 करोड़ का निवेश भी कर रही है।

आंकड़ों की माने तो आज ओड़िशा का शुमार उन सबसे बड़े राज्यों में है जहाँ सबसे उच्चतम मातृ मृत्यु दर (एमएमआर) है जो कि असम के बाद है 2015 की जनगणना के अनुसार असम में ये दर 140 प्रति एक लाख जीवित जन्म है।

मातृ एवं शिशु स्वास्थ्य के क्षेत्र में अहम योगदान देने वाले लोग

एन वी वी किरन वुप्पाला - किरन एक बायो टेक्नोलॉजिस्ट है, जो एक छोटे से गाँव से ताअल्लुक रखते हैं, जहाँ लोगों की जीविका का एक मात्र साधन कृषि है। ये एक ऐसा स्थान है जहाँ आज भी हेल्थकेयर किसी लुभावने सपने की तरह है। ये आरडीआई, आईसीएमआर, एफ़एओ के साथ मिलकर एक टॉपिकल एप्लीकेशन बना रहे हैं जो एक गर्भवती महिला के लिए फ़ायदेमंद होगी। इसकी मदद से महिला और बच्चे की अकाल मृत्यु, बीमारी, बिगड़े शारीरिक और मानसिक क्षमताओं और जैव-उपलब्धता के क्षेत्र में सुधार देखने को मिलेगा।

सुमोना करजी मिश्रा - ये एक ऐसी किट का निर्माण कर रही हैं जिससे गर्भावस्था के दौरान उच्च रक्तचाप से ग्रस्त डिसआर्डर के निदान और प्रीक्लेम्पसिया का पता लगाया जा सकता है। इस किट की मदद से गर्भवती महिला और उसके भ्रूण के प्राण त्यागने की सम्भावना कम रहेगी। पेशे से एक डॉक्टर होने के अलावा सुमोना एक माँ भी हैं और वो उन सभी तकलीफ़ का सामना कर चुकी हैं जो गर्भावस्था के दौरान होती हैं। आपको बता दें कि प्रीक्लेम्पसिया की किट के निर्माण के लिए सुमोना को हार्वर्ड-आईआईटीडी और टाटा से 5 लाख रुपए की ग्रांट मिली है।

अशफ़ाक अशरफ - ये एक ऑनलाइन प्लेट फॉर्म पर काम कर रहे हैं जो प्रसवोत्तर रक्तस्राव पर फोकस है। इसके ज़रिए मरीज को मिलने वाले खून की उपलब्धता में विशेष बल दिया गया है। अगर इसमें कोई कमी पाई गयी तो सुधार की सम्भावना को भी इनके द्वारा विकसित किया जा रहा है। ये प्लेटफॉर्म सभी ब्लड बैंकों का डाटा अपने पास रखेगा साथ ही उचित समय पर मातृ एवं शिशु ट्रैकिंग प्रणाली (एमसीटीएस) के ज़रिए उन्हें रक्त भी उपलब्ध कराएगा। अशरफ एक इंजीनियर हैं, जिन्होंने आईआईटी मद्रास से पढाई करी थी। इससे पहले अशफ़ाक एनएचएसआरसी के साथ भी बतौर कंसल्टेंट काम कर चुके हैं।

अनुराग कुमार क्याल - ये एक हाइड्रो जेल बेस आयरन जेली कैंडी को विकसित कर रहे हैं। जो मुख्य खाने का एक विकल्प होगा, जिसमें आयरन/ फोलिक एसिड और विटामिन सी होंगे। ये गर्भवती महिला में लौह तत्वों की कमी को पूरा करेगा, जिससे खून की कमी जैसी बिमारियों में भारी कमी देखने को मिलेगी। अनुराग बायो टेक्नोलॉजी से एमटेक हैं, जिन्हें अपनी सेवाओं के चलते गोल्ड मैडल मिल चुका है। आपको बताते चलें कि इन्हें कई क्षेत्रों में महारत हासिल है साथ ही इन्हें इनके प्रयासों के लिए एमएसएमई से ग्रांट भी मिल चुकी है।\

केआईआईटी - टीबीआई के मूल्यांकन मापदंड

1- जुनून, उद्देश्य और प्रतिबद्धता के साथ सामाजिक प्रभाव पैदा करने के लिए कौशल और ज्ञान लिए हुए एक स्व-प्रेरित टीम।

2- प्रदर्शन के अनुभव से पता चलता है कि वे लचीला कर रहे हैं और इस प्रक्रिया में उनके नेतृत्व क्षमताओं का प्रदर्शन कर कुछ बेहतर और अलग करने वाली टीम जहाँ सारी प्राथमिकता केवल और केवल अनुभव हो।

3- जहाँ काम करने वालों का एक मात्र उद्देश विचारों की स्पष्टता, ज्ञान और निरंतर खोज के लिए लगन हो।

मृत्युंजय के अनुसार हमारा एक मात्र उद्देश मातृ एवं शिशु स्वास्थ्य का उत्थान, शिशु और प्रसूता की मृत्यु दर में कमी है और हम ऐसा करने का प्रयास कर रहे हैं कि हमने इस क्षेत्र में जो भी रिसर्च करी है वो देश विदेश के जर्नल में प्रकाशित हो ताकि लोग उसका फायदा उठा सकें। साथ ही उन्होंने ये भी कहा कि जो लोग या संस्थाएं हमसे जुड़ना चाहती हैं वो यदि टीबीआई के पैमानों पर खरी उतरी तो अवश्य ही हम उन्हें अपने साथ जोड़ने में ख़ुशी महसूस करेंगे।

केआईआईटी – टीबीआई इस सुविधा को और भी बेहतर बनाने के लिए जल्द ही सरकारी स्रोतों से भी मदद लेगा जिसका उद्देश्य इस क्षेत्र में बेहतर रिसर्च होगा ताकि भविष्य में एक मरीज़ किसी भी परेशानी का सामना नहीं करे। साथ ही केआईआईटी टीडीबी और विलग्रो से सहायता प्राप्त डीएफ़आईडी के साथ एक साझा प्रयास के ज़रिए एक ऐसे वर्टिकल का भी निर्माण करेगा जो सोशल इन्नोवेशन को आगे ले जा सके।

मूल- अपराजिता चौधरी

अनुवादक - बिलाल एम जाफ़री

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