बाल मजदूरी को खत्म करना इतना भी मुश्किल नहीं: कैलाश सत्यार्थी

नोबल पुरस्कार विजेता पर बनी फिल्म 

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कैलाश सत्यार्थी ने कहा कि लोगों को लगता है कि दासता का अंत हो चुका है, लेकिन हकीकत में ऐसा नहीं है और यह किसी न किसी रूप में आज भी मौजूद है। उन्होंने कहा कि अगर उपभोक्ता चाह लें तो तमाम बच्चों की जिंदगी बर्बाद होने से बच सकती है।

बाल मजदूरी (फाइल फोटो)
बाल मजदूरी (फाइल फोटो)
 अब तक उन्होंने 85,000 से ज्यादा बच्चों को दासता से मुक्त कराया है। वे कहते हैं कि पूरी दुनिया के बच्चों का बचपन बचाना उनकी जिंदगी का एकमात्र मकसद है।

बच्चों को दासता की जंजीरों से मुक्त कराने वाले नोबल पुरस्कार विजेता कैलाश सत्यार्थी के जीवन पर बनी फिल्म 'द प्राइस ऑफ फ्री' आगामी मंगलवार को रिलीज होने वाली है। इस फिल्म में कैलाश सत्यार्थी के जीवन संघर्ष को फिल्माने की कोशिश की गई है। फिल्म के प्रमोशन और के सिलसिले में न्यू यॉर्क पहुंचे सत्यार्थी ने कहा कि लोगों को लगता है कि दासता का अंत हो चुका है, लेकिन हकीकत में ऐसा नहीं है और यह किसी न किसी रूप में आज भी मौजूद है। उन्होंने कहा कि अगर उपभोक्ता चाह लें तो तमाम बच्चों की जिंदगी बर्बाद होने से बच सकती है।

सत्यार्थी का एक ही मिशन है, बच्चों को दासता और मजदूरी से मुक्त कराना। इसके लिए उन्होंने 'बचपन बचाओ आंदोलन' नाम के संगठन की स्थापना की थी। सत्यार्थी ने कहा, 'अमेरिका में बिकने वाले कई उत्पाद भारत की फैक्ट्रियों में बने होते हैं और इनमें से कई फैक्ट्रियों में बच्चों से काम कराया जाता है। उपभोक्ता अगर उस ब्रैंड से पूछना चाहिए कि इस उत्पाद को बनाने में किसी बच्चे को शामिल नहीं किया गया है।' उन्होंने कहा कि जब ग्राहक सवाल करेंगे तो कंपनियों को जवाब देना होगा।

सत्यार्थी ने कहा, 'किसी भी ग्राहक के लिए कंपनी से पूछना मुश्किल नहीं है। यह हर एक ग्राहक का उत्तरदायित्व है कि वह जो भी प्रॉडक्ट खरीद रहा है उसे किसी बच्चे द्वारा जबरन नहीं बनवाया गया हो।' कैलाश सत्यार्थी ने भारत में 1981 में बचपन बचाओ आंदोलन की नींव रखी थी। उनके दावे के मुताबिक अब तक उन्होंने 85,000 से ज्यादा बच्चों को दासता से मुक्त कराया है। वे कहते हैं कि पूरी दुनिया के बच्चों का बचपन बचाना उनकी जिंदगी का एकमात्र मकसद है।

उनका मानना है कि बंधुआ मजदूरी और बाल श्रम उन्मूलन संभव है और इसके लिए उन्होंने लोगों, विशेष रूप से दुनिया के युवाओं को गुलामी में जीने को मजबूर और यौन दुर्व्यवहार का सामना कर रहे बच्चों के जीवन में सकारात्मक बदलाव लाने में "सहयोगी" बनने का आह्वान किया। उन्होंने कहा, 'बाल मजदूरी एक गंभीर समस्या है और दुनिया में अभी भी दासता अपने सबसे क्रूर रूपों में मौजूद है, लेकिन दासता और बाल श्रम उन्मूलन संभव है, यह हमारी पहुंच में है, इसलिए एक उम्मीद है।'

कैलाश सत्यार्थी
कैलाश सत्यार्थी

बाल श्रम, बाल यौन शोषण और तस्करी से लड़ने के उनके लंबे प्रयासों पर केंद्रित यूट्यूब की डॉक्यूमेंट्री फिल्म 'द प्राइस ऑफ फ्री' 27 नवंबर को वैश्विक स्तर पर मीडिया प्लेटफॉर्म पर प्रसारित होने जा रही है। इस फिल्म में नोबेल शांति पुरस्कार विजेता और उनकी टीम के बारे में दिखाया जाएगा कि कैसे वे दासता और उत्पीड़न झेल रहे मजबूर बच्चों को बचाने के लिए गुप्त और जोखिमभरे छापे मारते हैं, साथ ही लापता बच्चों को खोजने के लिए कैसे साहसपूर्ण कदम उठाते हैं।

90 मिनट लंबी इस फिल्म को 2018 सनडांस फिल्म फेस्टिवल में दिखाया गया था, फिल्म ने ‘यूएस डॉक्यूमेंट्री ग्रैंड ज्यूरी प्राइज’ जीता था। सत्यार्थी ने कहा कि पिछले 17 वर्षों में वैश्विक प्रयासों से बाल मजदूरों की संख्या 26 करोड़ से कम होकर 15.2 करोड़ पर पहुंच गई है। उन्होंने कहा, 'इसे पूरा करना संभव है। हम सही रास्ते पर हैं।' उन्होंने कहा कि यह फिल्म बाल दासता को तेज गति से खत्म करने के प्रयासों में मदद करेगी।

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