सम-विषम निर्भीक होने के साथ खुबसूरत भी है

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टीम वाईएस हिंदी

लेखकः आशुतोष

अनुवादकः निशांत गोयल


मैं यह माना करता था कि जलवायु और पर्यावरण जैसे मुद्दे सिर्फ अंग्रेजी बोलने वाले अभिजात वर्ग के लिये बौद्धिक कुतर्क के मामले थे। मुझे हमेशा से ऐसा लगता था कि आम आदमी पहले से ही इससे भी अधिक महत्वपूर्ण कई अन्य चीजों और मुद्दों में व्यस्त है। लेकिन आज मैं यह स्वीकार करता हूं कि मैं गलत था। कुछ दिन पूर्व दिल्ली हाई कोर्ट ने यह टिप्पणी कि कि राष्ट्रीय राजधानी एक ‘‘गैस चैंबर’’ में परिवर्तित हो गई है। इसके बाद दिल्ली की आम आमदी पार्टी (आआपा) सरकार ने इस ‘‘पर्यावरण आपातकाल’’ से निबटने के लिये एक सम-विषम सूत्र की घोषणा की जिसे रोड स्पेस राशनिंग के नाम से भी पुकारा जा रहा है और बीते कुछ दिनों में इस सूत्र ने जितने सार्वजनिक क्षेत्र पर राज किया है उतना शायद ही किसी मुद्दे ने किया हो। अचानक ही हर कोई इस बारे में बात कर रहा है। यहां तक कि सांसद भी मास्क पहले देखे जा सकते हैं।

इस तथ्य से इंकार नहीं किया जा सकता कि दिल्ली में प्रदूषण खतरनाक स्तर को पार कर गया है और इसके साथ तात्कालिक स्तर पर निबटने की आवश्यकता है। विश्व स्वास्थ्य संगठन ने दिल्ली को वर्ष 2014 की 160 वैश्विक शहरों की सूची में सबसे अधिक प्रदूषित शहर घोषित किया है। राष्ट्रीय राजधानी के क्षितिज पर एक कड़वी जहरीली धुंध को कभी भी देखा और महसूस किया जा सकता है और जैसे-जैसे सर्दियों का मौसम आ रहा है यह और अधिक घनी होती जा रही है। और इसी संदर्भ में दिल्ली सरकार ने कदम बढ़ाते हुए घोषणा की है कि मोटर से चलने वाले वाहनों के अंतिम अंकों को सम और विषम के आधार पर वैकल्पिक दिनों में बाहर निकलने दिया जाएगा। इसका सीधा सा मतलब है कि किसी भी दिन सड़क पर उतरने वाले वाहनों की संख्या को कम करके आधा कर दिया जाएगा। यह भारत के लिये एक बिल्कुल नया प्रयोग है जिसके चलते इसने अनुचित ध्यान और कई गुणा चिंताओं के अपनी ओर आकर्षित किया है। एक बहुत बड़ी संख्या में लोग उत्सुक हैं। इस उत्सुकता और चिंता को चार श्रृेणियों में विभाजित किया जा सकता है।

चिकित्सा के लिहाज से आपातकालीन स्थिति में अगर कार का नंबर प्रतिबंधित किये गए अंकों से मेल खाता है तो क्या होगा?

अपना वाहन रखने वाले विकलांग और निःशक्त लोगों का क्या होगा? अगर उनके वाहन का नंबर प्रतिबंधित श्रेणी में होगा तो वे कैसे सफर करेंगे? यह एक ऐसा वर्ग है जो सार्वजनिक परिवहन का उपयोग करना बहुत कठिन पाता है क्योंकि हमारे शहर में उन्हें विकसित देशों के मुकाबले न के बराबर सुविधाएं मिलती हैं।

उन कामकाजी महिलाओं का क्या होगा जो अपना वाहन चलाती हैं और देर रात तक काम करती हैं? वे उन दिनों का प्रबंधन कैसे करेंगी जिस दिन वे अपनी कार इत्यादि से सफर नहीं कर पाएंगी? क्या उनकी सुरक्षा के साथ कोई समझौता नहीं होगा और कहीं यह उन्हें देर रात तक काम करने से तो हतोत्साहित नहीं करेगा?

उन माता-पिताओं के सामने एक बहुत ही गंभीर संकर खड़ा हो गया है जो अपने बच्चों को स्कूल बसों और स्थानीय सवारियों से स्कूल भेजने के बजाय अपने वाहन से बच्चों को स्कूल छोड़ते हैं।

ये सभी बिल्कुल वाजिब समस्याएं हैं और इनको समुचित रूप से संबोधित भी किया जाना चाहिये। इसके अलावा मैं यह भी स्वीकार करता हूं कि इसके लेकर विपक्षी दलों के द्वारा लगातार बयान देकर भ्रम की स्थिति भी पैदा कर दी गई है। ‘आप’ के एक प्रतिनिधि के रूप में मैं आप सबको आश्वस्त करना चाहूगा कि सबसे पहले तो अभी तक तौर-तरीकों को लेकर कोई अंतिम निर्णय नहीं लिया गया है और मंशा और वास्तविक क्रियान्वयन की तारीख को लेकर केवल नीतिगत निर्णय की घोषणा की गई है। दूसरा, इस परियोजना को अमली जामा पहनाने के लिये प्रधान सचिव-ट्रेफिक, सचिव-पर्यावरण और सचिव-राजस्व सहित एक तीन सदस्यीय समिति का गठन किया गया है। यह समिति सभी हितधारकों से वार्ता करेगी, उनके विचारों, सुझावों और सिफारिशों को इकट्ठा करेगी और फिर उसके बाद इस फार्मूले को लागू करने के लिये अंतिम तौर-तरीकों को अंतिम रूप देने का काम करेगी। ऐसे में सबको राय दूंगा कि घबराने की कोई जरूरत नहीं है। अभी अंतिम योजना का इंतजार करें और फिर उसके बाद ही तद्नुसार प्रतिक्रिया दें। यहां तक कि प्रस्ताव के बाद भी अगर कुछ कमियां सामने आती हैं तो उन्हें भी संबोधित किया जाएगा। दो सप्ताह के बाद इसकी समीक्षा की जाएगी और उसके बाद तद्नुसार परिवर्तन करके चिंताओं को समायोजित किया जाएगा।

मैं एक बार फिर यह दोहराना चाहूंगा कि हालांकि यह भारत के लिये एक बिल्कुल ही नया प्रस्ताव हो सकता है लेकिन इसे दुनिया के कई कोनों में सफलतापूर्वक लागू किया जा चुका है। अभी हाल ही में बीजिंग और पेरिस में भी ऐसा ही प्रयोग किया गया है। इसके अलावा मेक्सिको सिटी, बगोटा, सेंटियागो, साओ पोलो, लंदन, एथेंस, सिंगापुर, तेहरान, सेन जोस, होडारूस, ला पाज़ इत्यादि शहर भी इस सूत्र को लागू कर चुके हैं। सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि ऐसा नहीं सोचा जाना चाहिये कि यह योजना 365 दिनों तक अस्तित्व में रहेगी। इसका प्रयोग आपातकालीन प्रावधान के रूप में किया जा रहा है बढ़ते हुए प्रदूषण पर नियंत्रण पाने की कवायद में आवश्यकतानुसार समय के साथ सार्वजनिक परिवहन सेवा में सुधार करने, प्रदूषण फैलाने वाले उद्योगों को बंद करने, प्रदूषण फैलो वाले वाहनों को निबटाने और नागरिकों को निजी कारों के प्रयोग के लिये होत्साहित करने जैसी योजनाएं भी क्रियान्वित करने का प्रयास करेंगे। जैसे बोगाटा में यह व्यवस्था सप्ताह में दो दिन लागू होती है। साओ पोलो में यह व्यवस्था वर्ष 1997 से अस्तित्व में है और बीजिंग में भी यह सप्ताह में एक दिन लागू होती है। वर्ष 2008 में सिर्फ ओलंपिक खेलों के समय चीन की सरकार ने इस योजना को दो महीने के लिये बढ़ाया जिसके बदले में उन्होंने अपने नागरिकों को तीन महीनों के लिये वाहन कर से छूट प्रदान कर क्षतिपूर्ति की।

हर शहर का एक अलग माॅडल होता है। एथेंस ने अपने क्षेत्र को भीतरी और बाहरी दो भागों में विभाजित किया है और प्रदूषण की दृष्टि से पूरे शहर पर चैबीसों घंटे कड़ी नजर रखी जाती है। प्रदूषण के खतरे के स्तर तक पहुंचते ही आपातकाल की घोणषा कर दी जाती है जिसकी सूचना रेडियो, टीवी और सार्वजनिक प्रसारण प्रणाली के माध्यम से करते हुए भीतरी क्षेत्र में निजी वाहनों का संचालन बंद कर दिया जाता है बौर सिर्फ सम और विषम सूत्र के आधार पर टैक्सियों का संचालन किया जाता है। बाहरी क्षेत्र में टैक्सिया तो सामान्य तौर पर ही चलती हैं लेकिन निजी वाहन सम और विषम के आधार पर ही चलते हैं। कुछ शहरों में यह योजना पूरे दिन के लिये लागू की जाती है और कुछ में यातायात के उच्च दबाव वाले समय जैसे सुबह 8:30 से 10:30 तक और शाम को 5:30 से 7:30 तक। कुछ प्रचारकों ने इस बात का झूठा हौव्वा खडत्रा कर दिया है कि सम-विषम संख्या चैबीसों घंटों के लिये लागम की जाएगी जो बिल्कुल सफेद झूठ है। पेरिस, जहां इसका पालन सबसे कड़ाई से किया जाता है वहां भह यह व्यवस्था सुबह के 5:30 बजे से रात के 11:30 बजे तक लागू रही। इसके अलावा कई अन्य शहरों में समान नियम लागू हैं।

लंदन और स्टाॅकहोम जैसे शहरों ने प्रदूषण पर अुकुश पाने के लिये एक बिल्कुल अलग राह अपनाई और उन्होंने अपनी जन परिवाहन प्रणाली को सशक्त किया। इसे एलईज़ेड (कम उत्सर्जन क्षेत्र) माॅडल कहा जाता है। ऐसे शहर अपने मुख्य केंद्रों को जोन में बदल देते हैं जहां एक मानक से अधिक प्रदूषण फैलाने वाले वाहनों पर प्रतिबंध लगाया जाता है और दोषी पाये जाने वालों पर भारी जुर्माना लगाया जाता है। इसके अलावा लोगों को प्रदूषण क नजरिये से अपने वाहन को लगातार उच्च गुणवत्ता का बनाये जाने के लिये प्रोत्साहित भी किया जाता है। इसके अलावा पार्किंग को बेहद महंगा बना दिया जाता है। लंदन में ऐसे क्षेत्रों में बहुत भारी पार्किंग शुल्क वसूला जाता है। पहले के 10 पौंड प्रति घंटे के शुल्क को बढ़ाकर 10 पौंड कर दिया गया है। इस प्रकार लंदन ने 2 बिलियन पौंड से भी अधिक अर्जित किये जिनका निवेश उन्होंने अपनी परिवहन से संबंधित सेवाओं के सुधार में किया।

ऐसे ही सिंगापुर ने भी एक कार लाइसेंस और स्पेस लाइसेंस प्रणाली तैयार की है। सिंगापुर में एक कार खरीदने से पहले किसी भी व्यक्ति को एक लाइसेंस लेना होता है ताकि वह कार खरीद सके और यह कार की कीमत से भी अधिक का होता है। इसके बाद किसी विशेष क्षेत्र में प्रवेश करने के लिये उसे एक भारी-भरकम रकम का भी भुगतान करना होता है। बीजिंग में एक अलग कार खरीद पंजीकरण प्रणाली है जो एक लाॅटरी आधारित प्रणाली है जो यह सुनिश्चित करती है कि सड़कों पर सिर्फ एक निश्चित संख्या में गाडि़यां ही चलें।

इस प्रकार से सड़कों पर मोटर चलित वाहनों को चलने से हतोत्साहित करने के ये कुछ प्रचलित तीहके हैं। सम-विषम संख्या का सूत्र भी इनमें से ही एक है जो विशेषकर आपात स्थितियों में काफी कारगर रहा है। दिल्ली भी ऐसी ही स्थितियों में पहुंचता जा रहा है लेकिन इसे अधिक पर्यावरण प्रेमी बनाने के लिये इसे वैश्विक स्तर पर प्रचलित कुछ अन्य माॅडलों से कुछ सीख लेने की आवश्यकता है। मुझे उम्मीद है कि एक नई शुरुआत की जाएगी जो सामग्री में निर्भीक होने के साथ परिकल्पना में सुंदर होगी। तो हम इस साहसी और खुबसूरत पहल को सफल बनाएं और ऐसा तभी संभव है जब दिल्ली के निवासी अपने भविष्य को बेहतर बनाने के लिये अपने जीवन में कुछ समायोजन करने ही होंगे। आईये हम सब मिलकर यह करते हैं!!!!

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Worked with Media barons like TEHELKA, TIMES NOW & NDTV. Presently working as freelance writer, translator, voice over artist. Writing is my passion.

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