26 साल के फिल्ममेकर ने बनाई 42 फिल्में जीते सौ से ज्यादा राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय पुरस्कार

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अंशुल सिन्हा बनना तो क्रिकेटर चाहते थे लेकिन हालात कुछ ऐसे बने कि वो बन गये फिल्म मेकर। उन्होने जिला स्तर पर मुंबई के लिए अंडर 16 और हैदराबाद के लिए अंडर 19 क्रिकेट खेला है। इसके अलावा एक साल के लिए उन्होने मुंबई के एक क्लब के लिए भी खेला है। लेकिन जब उनको लगा कि क्रिकेट में उनका करियर ज्यादा बेहतर नहीं बन सकता है तो साल 2010 में उन्होने क्रिकेट को अलविदा कह दिया और बन गये फिल्ममेकर। आप यकीन करें या ना करें लेकिन इन छह सालों के दौरान अंशुल ने 42 फिल्मों का निर्माण किया और सौ से भी ज्यादा राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर इन फिल्मों के लिए पुरस्कार हासिल किये।


अंशुल सिन्हा की स्कूली पढ़ाई मुंबई में हुई। उसके बाद उनके पिता का हैदराबाद तबादला हो गया। वहीं से उन्होने इंटर और ग्रेजुऐशन की पढ़ाई पूरी की। इसके बाद उन्होने एमबीए और मास कम्यूनिकेशन की पढ़ाई साथ साथ की। शुरूआत में अंशुल क्रिकेट में अपना करियर बनाना चाहते थे। लेकिन जब उन्होने क्रिकेट से नाता तोड़ा तो उन्होने अपनी उर्जा को ऐसी जगह लगाने के बारे में सोचा जहां वो समाज में लोगों की आंख खोल सकें। ताकि आम लोग उन मुद्दों को करीब से जान सकें जिनसे वो अंजान हैं। अंशुल जब एमबीए कर रहे थे तो उस दौरान उन्होने अपने दोस्तो के साथ मिलकर ब्लाइंड स्कूल की मदद के लिए हर छात्र से रोज 1 रुपया लिया और उस पैसे को को दान कर दिया। काम में पारदर्शिता लाने के लिए उन्होने अपने मोबाइल से एक 5 मिनट की डाक्यूमेंट्री बनाई। इस डाक्यूमेंट्री में उस स्कूल की प्रिंसिपल ने बताया था कि कैसे उनके स्कूल की ब्लाइंड लड़कियों को कम्प्यूटर न हो के कारण पिछले 3 सालों से कितनी परेशानी हो रही है। इस डॉक्यूमेंट्री को उन्होने नेशनल फिल्म फेस्टिवल में प्रदर्शित किया। वहां पर इस डॉक्यूमेंट्री को देख लॉयन्स क्लब ने उस स्कूल को 12 कम्प्यूटर डोनेट कर दिये।


अपने इस काम से अंशुल बहुत उत्साहित हुए कि कैसे एक 5 मिनट की फिल्म से लोगों को प्रभावित किया जा सकता है। इसके बाद उन्होने फैसला किया कि वो समाज के ऐसे दूसरे सामाजिक समस्याओं पर फिल्म बनाएंगे। जिससे कि उन लोगों की समस्याओं पर लोगों का ध्यान जाये। इस दौरान उन्होने वृद्धाश्रम, बालआश्रम और मूक बधिरों पर डॉक्यूमेंट्री बनाई। मूक बधिरों पर बनाई उनकी डॉक्यूमेंट्री का ये असर हुआ कि जिस स्कूल में साल 1955 से लाइट नहीं थी वहां पर स्टेट बैंक ऑफ इंडिया ने लाइट की व्यवस्था कर दी।


अंशुल ने साल भर में जो ये डॉक्यूमेंट्री बनाई थी उन सबको जोड़कर 15 मिनट की एक डाक्यूमेंट्री फिल्म “रिमूव पावरटी फ्रॉम इंडिया” बनाई। लेकिन ये डॉक्यूमेंट्री फिल्म फेस्टिवल में कोई स्थान नहीं बना सकी, क्योंकि उन फिल्मों को ही ज्यादा अवार्ड मिल रहे थे जो फिक्सन पर बनी थी। तब उन्होने पहली बार एक छोटी फिल्म “माई चॉकेलेट कवर” बनाई। इस शार्ट फिल्म को उन्होने अपनी “रिमूव पावरटी फ्रॉम इंडिया” के साथ फिल्म फेस्टिवल में दिखाया। पूरे साल 75 फिल्म फेस्टिवल में इनकी डाक्यूमेंट्री को 14 और फिल्म को 21 अवार्ड मिले। इसके बाद उन्होने 6 मिनट की एक शार्ट फिल्म ‘लपेट’ बनाई। इसे दिसम्बर 2012 में लॉस एंजिलस में आयोजित “माई हीरो इंटरनेशनल फिल्म फेस्टिवल” में इंटरनेशनल अवार्ड मिला।


अंशुल को इतने अवार्ड जीतने के बाद आत्मविश्वास आ गया था। जिसके बाद वो सोचने लगे कि अगर उनको कोई प्रोड्यूसर मिल जाये तो वो एक बड़ी फिल्म बना सकते हैं। तब उन्होने एक कहानी लिखी और कई प्रोड्यूसर से मिले लेकिन किसी भी प्रोड्यूसर को उनकी कहानी पसंद नहीं आई। उसी दौरान उनको विजय रेड्डी के बारे में पता चला जो कि तेलगू भाषी छात्रों को मुफ्त में अंग्रेजी सीखाते थे। तब अंशुल ने अपनी कहानी को छोड़कर उनकी जीवनी पर फिल्म बनाने का फैसला किया। अंशुल ने विजय रेड्डी की रजामंदी से उनकी जीवनी पर 1 घंटे की फिल्म बनाई। इस फिल्म को 4 इंटरनेशनल नोमिनेशन मिले। लेकिन ये फिल्म डिस्ट्रीब्यूटर ना मिलने के कारण सिनेमाघरों में प्रदर्शित नहीं हो पाई। तब उन्होने रोड शो कर करीब 28 बार हैदराबाद के विभिन्न इलाकों में इस फिल्म को खुद के प्रोजेक्टर से लोगों को दिखाया। समाज पर इस फिल्म का सबसे अच्छा असर ये पड़ा की इस फिल्म के देखने के बाद तेलंगाना सरकार ने लोगों के बीच अपने स्किल प्रोगाम को पहुंचाने के लिए विजय रेड्डी की सेवाएं लेने का फैसला किया।


इस फिल्म के बाद अंशुल किसी और कहानी पर काम करने की सोच रहे थे तभी उन्हें राजेश्वर राव के बारे में पता चला। जो कि अब तक 12 हजार लावारिस लाशों का अंतिम संस्कार कर चुके थे। अंशुल को उनके जीवन की कहानी बहुत ही प्रेरणादायक लगी। अंशुल ने “गेटवे टू हैवन” नाम से उन पर फिल्म बनानी शुरू कर दी। इस दौरान जब वो इस पर रिसर्च कर रहे थे तो उनको अस्पतालों मे अवैध रूप से लोगों के अंगों को बेचने के बारे में पता चला। उन्होने अपनी जान जोखिम में डालकर 16 स्टिंग ऑपरेशन कर इसका खुलासा किया जिसका परिणाम ये हुआ कि उस्मानिया हॉस्पिटल के सुपरिटेंडेंट को अपना पद छोड़ना पड़ा और हैदराबाद के गांधी अस्पताल में 65 सीसीटीवी कैमरे लगाये गये।


इस फिल्म को बनाने के लिए भी उनकी किसी ने मदद नहीं की।फिल्म बनाने के लिये वो कहानी लेकर हैदराबाद और मुंबई के कई प्रोड्यूसर से मिले। लेकिन कोई भी उनकी इस कहानी पर फिल्म बनाने के लिए तैयार नहीं हुआ। सबका कहना था कि लाशों को देखने के लिए कौन सिनेमाघरों में आयेगा, लेकिन अंशुल को अपनी कहानी और स्क्रिप्ट पर पूरा भरोसा था, इसलिए उन्होने खुद ही इस फिल्म को बनाने का फैसला किया। लेकिन उनके पास इतने पैसे नहीं थे कि वो इसका निर्माण कर सकें। इसके लिए उन्होने तय किया कि वो नौकरी करेंगी। जिसके बाद वो एक मल्टीनेशनल कंपनी में रात की नौकरी करते थे और दिन में वो अपनी फिल्म पर काम करते थे। इस फिल्म को बनाते हुए वो इतना डूब गये थे कि वो दिन रात इसी फिल्म के बारे में सोचते। उन्हें हर समय अपने आस पास लाशों के होने का अहसास होता। इससे उनका ऑफिश का काम भी बाधित होने लगा। जिसके कारण उन्हें अपनी नौकरी गंवानी पड़ी। लेकिन उन्होने फिल्म बनाना नहीं छोड़ा और अपनी जैब से 4 लाख रूपये लगाकर इस फिल्म को तैयार किया। पुरानी फिल्मों की तरह ‘गेटवे टू हैवन’ फिल्म को प्रदर्शित करने के लिए भी जब कोई डिस्ट्रीब्यूटर तैयार नहीं हुआ तो उन्होने इस फिल्म को भी देश विदेश में आयोजित होने वाले अलग अलग फिल्म फेस्टिवल में भेजने का फैसला किया। जिसके बाद जयपुर फिल्म फेस्टिवल में 3 हजार फिल्मों में इनकी फिल्म को 10वां स्थान मिला। साथ ही ये विश्व की 20 सर्वश्रेष्ट फिल्मों में से एक थी। उनकी ये फिल्म दक्षिण अमेरिकी देश वेनेजुएला में दो दिन के लिए सिनेमाघरों में भी प्रदर्शित हुई। साथ ही इस फिल्म को ‘सेवन इंटरनेशनल फिल्म फेस्टिवल’ में 4 अवार्ड मिले। अपनी भविष्य की योजना के बारे में 26 साल के अंशुल का कहना है कि वो किसानों की आत्महत्या से जुड़ी फिल्म बनाना चाहते हैं जिसके लिए वो प्रोड्यूसर की तलाश में हैं। 

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