अपने अधिकारों के लिए दुनिया का सबसे लंबा अनशन करने वाली इरोम शर्मिला

इरोम चानू शर्मिला को नफरत है आजी की सियासत से...

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विश्व में सबसे लंबा अनशन करने वाली मणिपुर की आयरन लेडी इरोम चानू शर्मिला कहती हैं कि आज की राजनीति एक दलदल जैसी है। वह उस दलदल में नहीं धंसना चाहती हैं। उन्हें आज भी चुनावी राजनीति में मिली अपनी असफलता पर अफ़सोस है।

तस्वीर साभार- फोकस इंडिया
तस्वीर साभार- फोकस इंडिया
मानवाधिकार के लिए आज भी उनका संघर्ष जारी है लेकिन अब वह आजकल की 'चालू' किस्म की राजनीति से दूर रहना चाहती हैं। वह कहती हैं कि शादी के बाद सिर्फ उनके घर का पता बदला है। 

'अब मेरी जिंदगी शांत नदी जैसी है। इसमें अब किसी तरह का उफान नहीं'। ऐसा कहती हैं आयरन लेडी के रूप में पूरी दुनिया में मशहूर मणिपुर की मानवाधिकार कार्यकर्ता इरोम चानू शर्मिला। मणिपुर में लागू सशस्त्र बल विशेषाधिकार अधिनियम के खिलाफ दुनिया में सबसे लंबी भूख हड़ताल का रिकॉर्ड बनाने वाली इरोम ने अक्तूबर 2016 में अपनी राजनीतिक पार्टी के गठन का एलान कर राजनीति में नई पारी की शुरुआत की थी। इरोम शर्मिला ने अपनी भूख हड़ताल खत्म करने के समय ही राजनीति में उतरने के लिए इंफाल में पीपल्स रिसर्जेंस जस्टिस एलायंस (प्रजा) नामक पार्टी की घोषणा करते हुए मणिपुर के पिछले विधानसभा चुनाव में हिस्सा लेने का एलान कर दिया था।

उस वक्त उन्होंने कहा था कि वह मणिपुर के मुख्यमंत्री की कुर्सी पर बैठना चाहती हैं ताकि राज्य से विशेषाधिकार अधिनियम को खत्म किया जा सके। उससे पहले उन्होंने दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल से मुलाकात कर उनसे राज्य की प्रमुख राजनीतिक पार्टियों को पराजित करने का फॉर्मूला पूछा था। उन्होंने कहा था कि हम मणिपुर में एक नया राजनीतिक बदलाव लाना चाहते हैं, जहां सशस्त्र बल विशेषाधिकार अधिनियम जैसे काले कानूनों से आम लोगों को परेशान नहीं किया जा सकेगा। उससे पूर्व 5 नवंबर 2000 से वह उक्त कानून के खिलाफ सोलह साल तक आमरण अनशन पर रहीं। आज भी उनका नाम दुनिया में सबसे लंबी भूख हड़ताल करने वाली आयरन लेडी के रूप में दर्ज है। सन् 2000 में जब मणिपुर के मालोम में सुरक्षाबलों ने बस स्टॉप पर खड़े 10 लोगों को गोली मार दी थी, उसके बाद उस समय अठाईस वर्षीय इरोम ने अफस्पा एक्ट नहीं हटने तक कुछ नहीं खाने, पीने और बालों में कंघी तक नहीं करने का प्रण लिया था।

अब इरोम शर्मिला का नया ठिकाना बेंगलुरु है। वहां वे अपने पति देसमोंद कौटिंहो के साथ रह रही हैं। वह कहती हैं कि उनकी जिंदगी अब शांत नदी जैसी है, जिसमें उफान की कोई संभावना नहीं है। अब वह खुश हैं। शादी के बाद से उनकी जिंदगी सुंदर और सुखद हो उठी है। मानवाधिकार के लिए आज भी उनका संघर्ष जारी है लेकिन अब वह आजकल की 'चालू' किस्म की राजनीति से दूर रहना चाहती हैं। वह कहती हैं कि शादी के बाद सिर्फ उनके घर का पता बदला है। वह आज भी अन्याय के खिलाफ खड़ी हैं। इरोम बताती हैं कि वह राजनीति में नहीं आना चाहती थीं। वह तो सिर्फ एक प्रयोग करना चाहती थीं। इसीलिए उन्होंने मणिपुर का पिछला विधानसभा चुनाव लड़ा था। लोगों को उनका हक दिलाने के उद्देश्य से उन्होंने राजनीति में कदम रखा था। उस वक्त कुछ लोगों ने उनका साथ दिया, कुछ ने नहीं। उन्हें बड़ा अफसोस है कि वह चुनाव में हार गईं। अब वह कभी राजनीति में वापस नहीं जाएंगी।

अनशन खत्म होने के बाद तो उन्हें उम्मीद थी कि लोग उनका जरूर साथ देंगे लेकिन उनका ऐसा सोचना उनकी खुशमहमी भर रही। मणिपुर की जनता ने संघर्ष की राजनीति की जगह उस यथास्थितिवादी राजनीति का चुनाव किया, जिसके ख़िलाफ़ वह 16 वर्षों तक लड़ती रही थीं। वह थउबल सीट से मुख्यमंत्री ओकराम ईबोबी सिंह के ख़िलाफ़ चुनाव लड़ीं, लेकिन उन्हें मात्र 90 वोट ही मिल सके। इस पर उस वक्त समाजशास्त्री नंदिनी सुंदर ने ट्वीट किया था कि ‘कम से कम 90 लोगों में कुछ नैतिकता और कुछ आशा बची थी।’

इरोम कहती हैं कि उन्होंने अनशन तोड़ने का सिर्फ इसलिए निर्णय था कि लोगों ने सोलह वर्षों तक उनका साथ दिया। राजनीति में कदम रखने के उनके निर्णय से उनके समर्थक असंतुष्ट हो गए थे। वे लोग आज भी उनसे काफी नाराज हैं। अब तो वे उनसे नफरत भी करने लगे हैं। वे तो ये भी नहीं चाहते थे कि वह अपना अनशन बीच में खत्म कर राजनीति करने लगें। अब वह मणिपुर के लोगों को किसी भी रूप में स्वीकार्य नहीं लगती हैं। अब उनका त्याग वहां लोगों के लिए कोई मायने नहीं रखता है। वह कहती हैं कि अनशन के दौरान वहां के काफी लोग तरह-तरह की चीजें सहज ही पाने लगे थे। वह एक तरह से उन पर आश्रित हो गए थे। इसलिए भी वे चाहते थे कि उनके अनशन का सिलसिला कभी न टूटे। अनशन खत्म करते ही उनकी निजी जरूरतें पूरा होने का सिलसिला भी थम गया। चुनाव में साथ न खड़े होने की शायद यह भी एक खास वजह रही होगी।

इरोम आज की राजनीति को एक दलदल मानती हैं। वह उस दलदल में दोबारा नहीं धंसना चाहती हैं। वह बताती हैं कि एक बार साइकिल से वह इम्फाल के हालात देखने निकलीं तो उनको पेट्रोल पंपों पर कई-कई किलो मीटर तक लोगों की लाइनें लगी दिखीं। लोग सुबह से ही पेट्रोल पंपों पर पहुंच जाते हैं और देर शाम तक यही हाल रहता है। उन्होंने देखे हैं कि राजनीतिक जनसभाओं के वक्त स्कूल कॉलेज खामख्वाह बंद कर दिए जाते हैं। क्या जनता के सेवक ऐसे ही होते हैं कि हमारे यहां उनके आने पर बच्चों की पढ़ाई रोक दी जाए। ये वही लोग हैं, जिनके अनशन करने पर लाखों लोग उनके साथ लामबंद हो जाते हैं लेकिन पेट्रोल पंप पर लाइन में लगा कोई आदमी, पुलिस के अत्याचार से पीड़ित कोई आम नागरिक अपनी मांगों को लेकर अनशन करे तो उसे आम आदमियों का समर्थन नहीं मिल पाता है।

यह सब लोगों ने आज की सियासत से सीखा है। मैंने अनशन पॉलिटिकल ब्लैकमेलिंग के लिए नहीं किया था। गांधी जी भी तो अनशन पर बैठे थे। क्या किया जा सकता है। मनुष्य स्वभाव से ही स्वार्थी होता है। मेरा संघर्ष कत्तई अहिंसक रहा। लोकतंत्र में विश्वास रखती हुई वह अहिंसक तरीके से जनता के लिए आज भी लड़ने की इच्छा रखती हैं लेकिन फिलहाल नहीं। मुझे आज भी अपने अनशन और राजनीतिक जीवन की असफलताओं पर अफसोस है।

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पत्रकार/ लेखक/ साहित्यकार/ कवि/ विचारक/ स्वतंत्र पत्रकार हैं। हिन्दी पत्रकारिता में 35 सालों से सक्रीय हैं। हिन्दी के लीडिंग न्यूज़ पेपर 'अमर उजाला', 'दैनिक जागरण' और 'आज' में 35 वर्षों तक कार्यरत रहे हैं। अब तक हिन्दी की दस किताबें प्रकाशित हो चुकी हैं, जिनमें 6 मीडिया पर और 4 कविता संग्रह हैं।

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