भारत के इन दो गांवों में क्यों पैदा होते हैं सबसे ज्यादा जुड़वा बच्चे?

आठवां अजूबा बने जुड़वां बच्चों के दो गांव, घर-घर में 'राम-श्याम, सीता-गीता'

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उत्तर प्रदेश और केरल के दो गांवों ने देश-दुनिया के चिकित्सा विज्ञानियों को हैरत में डाल रखा है। दुनिया भर के वैज्ञानिक और पत्रकार इन दोनों गांवों दौरा कर चुके हैं लेकिन आज तक रहस्योद्घाटन नहीं हो सका है कि यहां इतना ज्यादा जुड़वां बच्चों की पैदाइश क्यों हो रही है। यूपी के गांव उमरी में तो जानवर भी जुड़वां संतानें पैदा कर रहे हैं। इन दोनों गांवों की 'सीता-गीता, राम-श्याम' की ये दास्तान तो किसी आठवें अजूबे से कम नहीं।

केरल के जुड़वां बच्चे
केरल के जुड़वां बच्चे
स्कूलों में इन जुड़वा बच्चों को लेकर कई बार टीचर असमंजस में पड़ जाते हैं। उन्हें खुद समझ में नहीं आता कि वह सम्बंधित छात्र या छात्रा से ही तो बात नहीं कर रहे हैं! कक्षा में वे बुलाते हैं किसी और छात्र को और आ जाता है उसका जुड़वा कोई और। 

इलाहाबाद (उ.प्र.) के गांव उमरी और मलप्पुरम (केरल) के गाँव कोडिन्ही में जुड़वा बच्चों की पैदाइश ने देश-दुनिया के चिकित्सा विज्ञानियों को हैरत में डाल दिया है। अब तक इन दोनों गांवों में अब तक न जाने कितने 'सीता-गीता, राम-श्याम' जन्म ले चुके हैं। चिकित्सा विज्ञानी इतने जुड़वा बच्चे एक ही गांव में पैदा होने की वजह जेनेटिक बताते हैं। इसे जानने के लिए रक्त, लार आदि के सैम्पल भी जांचे जा चुके हैं लेकिन आज भी रहस्य बरकरार है, क्योंकि गंभीरता से मेडिकल छानबीन पर ध्यान नहीं दिया गया। मसलन, ये पता नहीं किया गया कि क्या यहां की कन्याओं से भी शादी के बाद जुड़वा बच्चे पैदा हुए हैं अथवा इन गांवों की जलवायु, खान-पान, मिट्टी आदि में तो ऐसी कोई बात नहीं?

पूरी दुनिया में और कहीं इतने जुड़वा बच्चे पैदा नहीं हुए जितने कि केरल और उत्तर प्रदेश के इन दोनो गांवों में। एक सर्वे रिपोर्ट के मुताबिक केरल के गांव कोडिन्ही में प्रति एक हजार बच्चों में से लगभग बयालीस जुड़वां पैदा हो रहे हैं, जबकि अब तक पूरी दुनिया में यह औसत प्रति एक हजार में मात्र छह का है अर्थात कोडिन्ही में जुड़वा बच्चों की पैदाइश का औसत बाकी दुनिया से सात गुना ज्यादा है। चिकित्सा विज्ञानियों की हैरानी की पहली सबसे बड़ी वजह यही है। इस रहस्य को जानने के लिए भारत, जर्मनी और ब्रिटेन के रिसर्चर एक साथ मिलकर थूक के सैंपल, उनकी कद-काठी, त्वचा आदि पर शोध कर चुके हैं लेकिन वैज्ञानिक दृष्टि से कुछ भी स्पष्ट नहीं हो सका है।

स्कूलों में इन जुड़वा बच्चों को लेकर कई बार टीचर असमंजस में पड़ जाते हैं। उन्हें खुद समझ में नहीं आता कि वह सम्बंधित छात्र या छात्रा से ही तो बात नहीं कर रहे हैं! कक्षा में वे बुलाते हैं किसी और छात्र को और आ जाता है उसका जुड़वा कोई और। कई बार तो इस तरह की स्थितियां गांव-घर के लोगों के सामने भी आ जाती हैं। इसी आड़ में बच्चों को खिलंदड़ी अथवा शरारत दिखाने का भी मौका मिल जाता है। कोडिन्ही में एक जुड़वा भाई फुटबाल खेलते हैं। जब दोनों अरशद और आसिफ एक साथ मैदान पर होते हैं, टीम वाले गफलत में पड़ जाते हैं।

कोडिन्ही में पचास प्रतिशत से ज्यादा मुस्लिम रहते हैं बाकी हिंदू आबादी। दोनो ही समुदायों में ऐसी संताने जन्म ले रही हैं। इससे आनुवांशिक अंदेशे भी फेल हो जाते हैं। एक और मिथक की दलील दी जाती है कि महिलाएं तो दूसरे अलग-अलग गांवों से ब्याह कर आती हैं फिर उनसे यहां जुड़वा बच्चे कैसे पैदा हो जाते हैं। ऐसे में गांव वालों का अंधविश्वासी होना स्वाभाविक है। चिकित्सा विज्ञान इसकी वजह का पता लगाने में तो फेल हो ही चुका है। और तो और, एक हैरत ऐसी भी कि जुड़वा ही नहीं, कई बार तीन और चार बच्चे भी एक साथ पैदा हो चुके हैं।

इसी तरह इलाहाबाद के गांव उमरी में जुड़वा बच्चे पैदा होने के चिकित्सीय परीक्षण हैदराबाद, दिल्ली, कोलकाता, चेन्नई, मुंबई आदि के विशेषज्ञ कर चुके हैं लेकिन वे भी आज तक किसी निष्कर्ष पर नहीं पहुंचे हैं। इस गांव की आबादी लगभग ढाई सौ परिवारों की है। इस गांव में बीते लगभग पांच दशक में सौ से ज्यादा जुड़वा बच्चे जन्म ले चुके हैं। एक और हैरानी की बात सामने आई है कि यहां के जानवर भी जुड़वा संतानों को जन्म दे रहे हैं। उनके भी हर तरह के नमूनों का परिक्षण बेनतीजा रहा है। उमरी के गुड्डू का कहना है कि उसके बाबा ने बताया था, आठ दशक पहले इस गांव के हर परिवार में जुड़वा संतानें थीं।

इस समय गांव में लगभग डेढ़ दर्जन जुड़वां संताने हैं। बीस ऐसे जुड़वां बच्चों ने जन्म लिया, जिनमें से एक-एक की मौतें हो गईं। जुड़वा बच्चों की संख्या को देखते हुए अब तो उमरी का नाम गीनिज़ बुक में रिकार्ड कराने की चर्चाएं हैं। इलाहाबाद के एयरपोर्ट से सटे उमरी में एक साथ 126 जुड़वा बच्चों का पैदा होना कुदरत का करिश्मा नहीं तो और क्या कहा जाए। कोडिन्ही को छोड़कर दुनिया में दूसरा और कोई भी तो ऐसा गांव नहीं। एक ही तरह की शक्लें प्रायः गांव वालों को भी आपस में हैरत में डाल देती हैं। पता चलता है कि एक ही तरह के चेहरे-मोहरे वाले दो भाई अलग-अलग तरह के कपड़ों में अपनी समान शिनाख्त से संशय में डाल देते हैं।

बाहर से आने वाला कोई व्यक्ति जिस बच्चे को मस्जिद या मंदिर के पास देखता है, वही जब स्कूल या अन्य घर-गांव में दिख जाता है, दिमाग भुतहा सा हो जाता है। अक्ल चकराने लगती है। हर गली, हर दूसरे-तीसरे घर में जुड़वा भाई-बहन, गजब दृश्य होता है, जैसे कोई गांव नहीं, म्यूजियम हो। बताते हैं कि इस गांव की बसावट सैकड़ों साल पुरानी है। सन् 1947 में जब देश का बंटवारा हुआ था, उमरी गांव को खाली करा लिया गया था। जुड़वा शक्लों की वजह से उस समय फोर्स के लोग भी असमंजस से गुजरे थे। ईरान, अमरीका, जर्मनी आदि के पत्रकार भी उमरी का दौरा कर चुके हैं। उमरी के पप्पू अपने भाई गुड्डू से दस मिनट छोटे हैं। वह मीडिया को बताते हैं कि कई बार उनकी पत्नियां पहचानने में धोखा खा जाती हैं। ऐसे वह भाभी से चुहल भी कर लिया करते हैं। जुड़वा होने के कारण ही अपने शरारती भाई की गलती पर आसिफ अपने पिता के हाथों पिट चुके हैं। ऐसे मौकों पर मां से वास्तविकता का पता चलता है तो उनके पिता भी पछताने लगते हैं।

इस रहस्य को जानने में जुटे चिकित्सा विज्ञानियों के सामने ब्लड सैंपल का भी बेनतीजा हो जाना बड़े-बड़ों को चौकाता है लेकिन जानकारों का मानना है कि इसे कुदरत का करिश्मा कहा जाए अथवा कुछ और, याकि चाहे जब भी इस सच का सर्वमान्य नतीजा निकले, कोई न कोई असली वजह तो साइंटिफिक ही है। जुड़वां बच्चों की पैदाइश यहां के व्यावहारिक जीवन में हर वक्त कोई न कोई कठिनाई पैदा करती रहती है। घर वालो ने स्कूल में एडमिशन कराया किसी और, पढ़ रहा कोई और। क्लास बंक करने वाला हंस-हंस कर लोटपोट हो रहा है और क्लास अटेंड कर चुका भाई मुफ्त में पिट रहा है।

प्रायः मांएं भी दुविधा में पड़ जाती हैं। जिसने खाना खा लिया हो, उसे ही दुबारा खाने के लिए डांट-डपट अथवा शादी-ब्याह के मौकों पर ससुरालियों में धर्म संकट की स्थितियां आ जाती हैं। इस दौरान जिन्हें सही सही पता होता है, वे आपस में एक दूसरे से मजे लेने, चुहलबाजी आदि से भी नहीं चूकते हैं। गांव में आने वाले नाते-रिश्तेदारों अथवा गणना के मौकों पर सरकारी कर्मचारियों के सामने, वोट मांगने पहुंचे नेताओं को भी इसी तरह की दुविधाओं का सामना करना पड़ जाता है। सबसे ज्यादा मुश्किलों से गर्भवती माताओं को गुजरना पड़ना है। जन्म के समय जरूर बधाइयां मिलती हैं कि अरे वाह! आप जुड़वा बच्चों की माँ बन गई हैं लेकिन यह शब्द सुनने में जितना अच्छा लगता है, उतना ही अंदर से सहमा देते हैं।

मल्टीपल प्रेगनेंसी में महिला की परेशानियां बढ़ जाती हैं। महिलाएं मानसिक तौर पर दिक्कत में आ जाती हैं। सिंगल बच्चे की पैदाइश की तुलना में मल्टीपल प्रेगनेंसी में मां को थकान ज्यादा हो जाती है। जुड़वा बच्चों का वजन औसत से अधिक होने का भी खतरा रहता है। एक की बजाए दो-दो बच्चों को एक साथ संभालना भी मां की मुफ्त की मुसीबत हो जाती है। गर्भ में जुड़वाँ बच्चे के होने से साँस की कमी, कब्ज, हर्टबर्न और सूजन की समस्या भी मां को झेलनी पड़ती है।

एक कठिनाई ये भी रहती है कि जुड़वाँ बच्चों के प्रसव ज्यादातर सीजेरियन होते हैं। साथ ही प्रीप्रीमैच्योर बर्थ के अंदेशे रहते हैं। जन्म से पहले मां को भयानक सिर दर्द होता है, दृष्टि में धुंधलापन बढ़ जाता है, पेट के ऊपरी हिस्से में हमेशा पेन बना रहता है, उल्टियां ज्यादा होती हैं और कई बार अचानक शरीर सूजने लगता है। प्रसवती महिलाओं की शारीरिक परेशानियों की दृष्टि से भी देखें तो इस रहस्य का पता लगाया जाना अब बहुत जरूरी माना जा रहा है। जनसंख्या वृद्धि की दृष्टि से भी यह सिलसिला देश-समाज के लिए कत्तई हितकर नहीं है।

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पत्रकार/ लेखक/ साहित्यकार/ कवि/ विचारक/ स्वतंत्र पत्रकार हैं। हिन्दी पत्रकारिता में 35 सालों से सक्रीय हैं। हिन्दी के लीडिंग न्यूज़ पेपर 'अमर उजाला', 'दैनिक जागरण' और 'आज' में 35 वर्षों तक कार्यरत रहे हैं। अब तक हिन्दी की दस किताबें प्रकाशित हो चुकी हैं, जिनमें 6 मीडिया पर और 4 कविता संग्रह हैं।

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