फुटपाथ पर सब्जी बेचते हुए पूरी की पढ़ाई, दसवीं में लाया 79 पर्सेंट नंबर

बेंगलुरु के फुटपाथ पर सोने वाले विनोद की कहानी...

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विनोद जब कुछ ही महीनों का था तो एक हादसे में उसके माता-पिता की मौत हो गई। इसके बाद उसका पालन पोषण उसकी नानी मुनिरत्ना ने किया। मुनिरत्ना बेंगलुरु में कृष्णा राजेंद्र नगर में सब्जी बेचने का काम करती हैं।

विनोद
विनोद
 वह फुटपाथ पर अपनी नानी के साथ ही सब्जी बेचता और समय मिलने पर किताबों में भी लग जाता। इसी मेहनत की बदौलत इस साल दसवीं के रिजल्ट में विनोद ने करिश्मा कर दिखाया। मुश्किल हालात को मात देते हुए विनोद ने 79 प्रतिशत नंबर हासिल किए।

बेंगलुरु शहर में काफी भीड़ रहती है और इसी भीड़भाड़ वाले शहर में एक इलाका है कृष्णा राजेंद्र नगर जिसे सिटी मार्केट के नाम से भी जाना जाता है। यह मार्केट सुबह से खुलता है और दिनभर यहां अच्छी-खासी चहल पहल होती है। हम आपको इस इलाके से इसलिए रूबरू करा रहे हैं क्योंकि इतने भीड़भाड़ वाली जगह पर एक छोटे से बच्चे ने विपरीत परिस्थितियों में दसवीं की परीक्षा में 79 प्रतिशत नंबर हासिल किए हैं। हर कोई जानता है कि किसी भी शोरगुल वाली जगह पर रहकर पढ़ाई कर पाना नामुमुकिन सा होता है, लेकिन विनोद कुमार ने वह मुमकिन कर दिखाया है जिसकी कल्पना कर पाना थोड़ा मुश्किल है।

मूल रूप से मैसूर के रहने वाला विनोद जब कुछ ही महीनों का था तो एक हादसे में उसके माता-पिता की मौत हो गई। इसके बाद उसका पालन पोषण उसकी नानी मुनिरत्ना ने किया। मुनिरत्ना बेंगलुरु में कृष्णा राजेंद्र नगर में सब्जी बेचने का काम करती हैं। विनोद उन्हीं की देखरेख में पला बढ़ा। वह जब 4 साल का था तभी से सब्जी बेचने के काम में अपनी नानी की मदद करने लगा था। वह अपनी नानी के साथ पास में ही फुटपाथ पर रहता था। विनोद जब थोड़ा और बड़ा हुआ तो नानी मुनिरत्ना ने पास के ही एक नगरपालिका द्वारा संचालित सरकारी स्कूल में उसका दाखिला करा दिया।

विनोद दिन में स्कूल जाता था और शाम को नानी के साथ सब्जी बेचता था। उसका पढ़ने में मन लग गया। इसी बीच बोस्को (BOSCO) निलय नाम के एक एनजीओ की नजर विनोद पर पड़ी। यह एनजीओ बेंगलुरु में बच्चों की देखभाल और उनकी अच्छी परवरिश के लिए काम करता है। इस एनजीओ ने विनोद की काफी मदद की। न्यू इंडियन एक्सप्रेस की एक रिपोर्ट के मुताबिक विनोद इस एनजीओ के सेंटर में जाने लगा और वहां उसे स्कूल के अलावा भी काफी कुछ पढ़ने को मिलता। एनजीओ की कक्षाएं शाम में होती थीं।

लेकिन विनोद फुटपाथ पर रहता था और उसे पढ़ने में कई तरह की दिक्कतें आती थीं। एक महीने के बाद विनोद ने BOSCO के डायरेक्टर फादर रेगी जैकब को अपने हालात के बारे में बताया। उन्होंने विनोद की पढ़ाई का सारा खर्च खुद से वहन करने का फैसला किया। इसके बाद वह बोस्को के स्कूल का छात्र बन गया। वह फुटपाथ पर अपनी नानी के साथ ही सब्जी बेचता और समय मिलने पर किताबों में भी लग जाता। इसी मेहनत की बदौलत इस साल दसवीं के रिजल्ट में विनोद ने करिश्मा कर दिखाया। मुश्किल हालात को मात देते हुए विनोद ने 79 प्रतिशत नंबर हासिल किए।

विनोद पढ़ने में तो तेज है ही साथ ही वह बाकी कमजोर छात्रों की भी मदद करता है। बोस्को एनजीओ में उसने कई बच्चों को पढ़ाया है। उसे बेंगलुरु के जोगी मोहल्ले में नेहरू मकाला संघ का लीडर भी बनाया गया है। उसने नवंबर 2017 में कर्नाटक राज्य की दसवीं बाल अधिकार संसद में छात्र प्रतिनिधि के तौर पर हिस्सा लिया था। इसके अलावा हैदराबाद में इसरो की तरफ से हुए क्विज कॉम्पिटिशन में भी उसने हिस्सा लिया था। विनोद आगे चलकर आईएएस बनना चाहता है और अपनी नानी को फुटपाथ की जिंदगी से दूर अच्छा जीवन देना चाहता है।

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