हर बच्ची की परवरिश बेहतर हो तभी देश आगे जाएगा-दीया मिर्जा

जीवन का दृष्टिकोण समझाते हुए भावनाओं से अभिभूत होकर दीया अपनी जिंदगी के उस पल को याद करती हैं जिसने उन्हें जीवन का असल मकसद और मायने समझाए।

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जीवन का दृष्टिकोण समझाते हुए भावनाओं से अभिभूत होकर दीया अपनी जिंदगी के उस पल को याद करती हैं जिसने उन्हें जीवन का असल मकसद और मायने समझाए।

दीया मिर्ज़ा
दीया मिर्ज़ा

दीया बताती हैं कि पांच साल की उम्र में मेरे माता-पिता का तलाक हो गया था। इसके बाद वे दोनों अलग-अलग रहने लगे थे। मैं सप्ताह के आखिरी दिनों में पिता के घर जाया करती थी। एक दिन मैं घर की सीढि़यों पर बैठी थी, सहमी सी डरी हुई। मेरे पिता मेरे पास आए और पूछा - क्या हुआ? तुम इतना परेशान क्यों हो? मैंने जवाब दिया कि मैं कई परेशानियों से घिरी हुई हूं। उन्होंने मेरा हाथ पकड़ा और उस कमरे में ले गए जहां उनकी बनाई हुई कई चीजें मौजूद थीं। उन्होंने विश्व का नक्शा दिखाते हुए उसमें महाद्वीपों की पहचान कराने लगे। विश्व के मानचित्र पर भारत की ओर इशारा करते हुए उस शहर को दिखाने लगे जहां हम लोग मौजूद थे। हमारे शहर का नामोनिशान एक डॉट के समान था। मैंने जिज्ञासावश पापा से पूछा कि पापा हमारा हैदराबाद शहर इतना छोटा है कि एटलस में यह केवल एक डॉट में सिमटकर रह गया? पापा ने जवाब दिया- अब देखो तुम्हारी समस्याएं इससे कहीं बड़ी हैं।

नजरिए का दीया के लिए है विशेष महत्व

दीया अपनी जिंदगी के फैसलों को लेकर बेहद स्पष्ट हैं। वह कभी भी निजी मान्यताओं को किसी दूसरे पर नहीं थोपती हैं। वह स्वतंत्र विचारों को तवज्जो देते हुए अहम फैसले लेती हैं। रैंप से लेकर बॉलीवुड एन्टरप्रेन्योर से लेकर अपने खुद के प्रोडक्शन हाउस बोर्न फ्री एन्टरटेन्मेंट में प्रोडूसर तक के सफर में, दीया ने हर एक फैसला अपनी आत्मा की आवाज सुनकर लिया है। दीया का मानना है कि कोई भी फैसला लेते वक्त हम अगर अपने नजरिए को तवज्जो दें तो इसके सकारात्मक परिणाम देखने को मिलेंगे।

भारतीयता है पहचान

दीया के लिए अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के यह मतलब कतई नहीं कि वह नेशनल टीवी पर जोर-जोर से चिल्लान शुरू कर दें। दीया भारतीय होने पर फक्र करती हैं और यह मानती हैं कि सफल होने के लिए शोर मचाना, कोई तरीका नहीं है। दीया के पिता ईसाई और नास्तिक थे और मां मूल रूप से बंगाली थीं। जबकि उनके सौतेले पिता मुस्लिम थे। अब एक हिंदू से ब्याह रचाने के बाद दीया खुद की पहचान बतौर भारतीय बताने में सबसे ज्यादा नाज़ करती हैं।

दीया अपने बचपन में मां से अकसर यह पूछती थीं कि आखिर उस नवजात बच्चे का क्या धर्म और मजहब है जिसने अभी-अभी इस दुनिया में सांस लेना शुरू किया है ? उनका मानना है कि धार्मिक पहचान एक विभाजनकारी रणनीति है जिसके तहत युवावस्था में ही हमें एक दूसरे से दूरियां बनाने की नसीहत दी जाती है। लोगों में अंतर लाने की साजिश को वह धार्मिक पहचान की संज्ञा देती हैं। दीया की मां का मानना था कि एक अच्छा इंसान होना सबसे जरूरी है। दीया जब कभी भी अपनी मां से यह पूछती थीं कि मां मैं कौन हूं तो उन्हें एक ही जवाब मिलता था- जो एक अच्छा इंसान बनने की प्रक्रिया की शुरूआत कर सके तुम वो हो। यही तुम्हारी पहचान होगी। बचपन में पहचान की ऐसे पाठ पढ़ने वाली दीया की समझ से यह परे था कि मुल्क में आखिर किस आधार पर लोगों को कम भारतीय या ज्यादा भारतीय की श्रेणी में रखकर विभाजित किया जाता है।

वह कहती हैं कि हम उस मुल्क के बाशिंदे हैं जहां अपनी विशिष्ट पहचान के साथ विभिन्न परंपराओं व मान्यताओं में विश्वास करने वाले लोग एक साथ रहते हैं। अनेकता में एकता के इसी पैगाम से समाज में सकारात्मक संदेश जाता है और हमें अपने बच्चों को भी ऐसी ही सीख देनी चाहिए। यह हम पर है कि हम दूसरों की संस्कृति का कितना सम्मान करते हैं, उन्हें कितना मानते हैं। हमें दूसरों की संस्कृति में अपनी संस्कृति का अक्स देखना चाहिए और उन्हें अपनाना चाहिए।

दीया के अनुसार, हमारी पहचान क्या है, यह सकारात्मक बहस का एक विषय है लेकिन इसके बावजूद वह ऐसा करने से बचती हैं। उनका मानना है कि एक भारतीय होने के लिए किसी धर्म या मजहब से ताल्लुक रखना कोई जरूरी नहीं है। हम इसके लिए बाध्य नहीं हैं। वह कहती हैं कि हमारी अपनी पहचान तो होनी चाहिए लेकिन यह किसी धर्म विशेष या समुदाय विशेष से नहीं बल्कि हमारे नेक इंसान होने की कसौटी पर खरे उतरने से होनी चाहिए।

एक सार्वजनिक हस्ती होने के नाते वह प्रोफेशन में होने वाले भेदभाव से भलीभांति परिचित हैं और विभाजन के लिए लोग इसी आसान रास्ते को चुनते हैं। दीया कहती हैं कि यह सब जानने के बाद मेरे लिए यह कतई मुमकिन नहीं कि धर्म या संप्रदाय विशेष के नाम पर भेदभाव पर मैं खामोश रहूं। हालांकि, वह यह भी जोड़ती हैं कि मैं यह नहीं कहती कि मैं जो कुछ भी कह रही हूं वहीं सही है। हम सभी को निजी विवेक का इस्तेमाल करना चाहिए और उचित प्लेटफार्म पर वक्त वक्त पर अपनी आवाज उठाते रहना चाहिए। यूं देखा जाए तो लोग दीया की बातों को गंभीरता से लेते हैं जिसका प्रमाण है उनके ट्विटर हैंडल का आएदिन सोशल मीडिया पर ट्रेंड करता है।

प्रारंभिक साल

दीया के आज में उनके बीते हुए कल का काफी योगदान है। उनका बचपन बेहद रोचक दौर से गुजरा और वह इसके लिए खुद को खुशनसीब मानती हैं। ऑल योर स्टोरी दीया मिर्जा आर्टिकल में दीया के बारे में सबकुछ विस्तार से लिखा गया है। वह कहती हैं कि उन्हें मिलने वाले मौकों के लिए वह गौरवान्वित महसूस करती हैं और वह इस बात को लेकर भी संतुष्ट हैं कि उन्हें अच्छे व बुरे में अंतर करना बखूबी आता है। वह मानती हैं कि यह ईश्वर का आशीर्वाद है कि उन्हें लोगों की फितरत पहचानना व क्या करना है और क्या नहीं करना, अच्छे से आता है।

माता-पिता के सृजनात्मक होने व एकता में विश्वास रखने के चलते दीया की परवरिश एक बेहतर माहौल में हुई। वह कहती हैं कि उनके पेरेंट्स ने उन्हें हमेशा यह सिखाया कि माता-पिता भी इंसान होते हैं और गलती उनसे भी हो सकती है। गलती हम सभी से होती है और हमें अपनी गलती स्वीकारनी चाहिए। बतौर नौसिखिया, ऐसी शिक्षा मेरे लिए किसी वरदान से कम नहीं थी। दीया के आकर्षक व्यक्तित्व के पीछे उनकी स्कूलिंग का भी अहम योगदान है। उन्होंने उस स्कूल से प्रारंभिक शिक्षा ग्रहण की जहां जे कृष्णमूर्ति के सिद्धांतों को पढ़ाया जाता था। यह स्कूल एक असाधारण महिला द्वारा संचालित होता था जो शिक्षा को एक विशेष तरीके से बच्चों तक पहुंचाने के लिए जानी जाती थीं। इस स्कूल में पेड़ की छांव में कक्षाएं संचालित होती थीं। खेल दिवस का आयोजन होता था और सांस्कृतिक आयोजन भी होते हैं लेकिन आज की तरह वहां मेडल्स नहीं दिए जाते थे। वहां थिएटर था, हॉर्स राइडिंग होती थी, तैराकी होती थी और नजदीकी गांवों में स्थानीय लोगों से संवाद के लिए विजिट भी होती थी। इन लोगों के जीवन को समझने व उनके बच्चों को शिक्षित करने का भी मौका मिलता था। दीया अपने अनुभवों के बारे में शेयर करते हुए कहती हैं कि उस स्कूल में समझाने की बजाय प्रैक्टिकल चीजों पर ज्यादा ध्यान दिया जाता था। उन्होंने हिंदी फिल्म में पहली बार तब काम किया जब वह मात्र 12 या 13 साल की रही होंगी। इससे पहले वो आर्ट हाउसेज व वर्ल्ड आर्ट सिनेमा का हिस्सा थीं।

मिस एशिया पेसिफिक 2000 

अवसरों व अनुभवों की दुनिया में मिस इंडिया प्रतियोगिता दीया के लिए मील का पत्थर साबित हुई। उनकी शुरुआत सीखने व इसमें हिस्सा लेने से हुई बजाए कि टॉप पोजीशन के लिए टक्कर करने के लिए। धीरे-धीरे वह खुद को शांति से प्रतियोगिता का विजेता बनने के लिए तैयार करने लगीं। मुंबई शिफ्ट होने से उनमें आत्मविश्वास का संचार हो गया था। दीया कहती हैं कि यह पहला अवसर था कि जब उन्हें घर से बाहर रहना पड़ा। वह मानती हैं कि इसी दरमियान उन्होंने पैसा व समय प्रबंधन बेहतर ढंग से सीखा। वह कहती हैं कि खिताब के लिए तैयारियां करने आईं अन्य लड़कियों से बातचीत करना व उन्हें समझना एक नया व विशेष तरह का अनुभव था। मिस इंडिया प्रतियोगिता के मंच ने उन्हें वैश्विक स्तर पर भारत का प्रतिनिधित्व करने का मौका दिया। उस क्षण को याद करते हुए दीया कहती हैं कि-

उस वक्त मैं खुद को तन्हा महसूस कर रही थी और वहां मेरे साथ मेरे परिवार का या कोई अपना नहीं था। वहां ऐसा कोई नहीं था जिससे कि मैं उन लम्हों की खुशियों को साझा कर सकूं। इससे मुझे एक विशेष सीख मिली कि आप तब तक खुश नहीं हो सकते जब तक कि आप आत्मा से खुश न हों या फिर जब तब आपके पास अपनी खुशी शेयर करने के लिए कोई अपना न हो। मुझे अपनी जीत की खुशी का सच्चा अहसास तब हुआ जब मैं विजेता बनकर भारत लौटी और अपने माता-पिता से मिली। उस वक्त मुझे वाकई एक विनर की अनुभूति हो रही थी। 19 साल की छोटी सी उम्र में मेरे लिए यह मुकाम किसी सपने से कम नहीं था। यह एक स्पेशल व खूबसूरत अहसास था। वह मानती हैं कि किसी महिला को आजाद बनाने के लिए जो सबसे पहली चीज है वह है आर्थिक आजादी।

सफर बॉलीवुड का

मिस इंडिया का ताज अपने नाम करने के बाद दीया के पास फिल्मों के एक के बाद एक ऑफर्स आने लगे। उन्होंने यह निश्चय किया कि फिल्मों में अभिनय करने के उनके ख्वाब को पर लगे हैं और किसी भी तरह की आशंका से बेपरवाह होकर वह इन मौकों को हाथ से जाने नहीं देना चाहती थीं। करियर के शुरुआती दिनों में दीया के पास जिन बातों को सोचने की फुर्सत तक नहीं थी, आज वह खुद को उसके पास पाकर खुश थीं। वह कहती हैं कि संघर्ष का एक ऐसा दौर रहा जब उन्हें पास सोचने तक की फुर्सत नहीं थी। दीया कहती हैं कि बॉलीवुड इंडस्ट्री एक पुरुष प्रधान इंडस्ट्री है। बतौर औरत, इस इंडस्ट्री में उन्होंने जो सबसे पहली चीज सीखी वह यह थी कि यहां महिलाओं को गंभीरता से नहीं लिया जाता। हालांकि, बीते चार से पांच सालों में वह एक रोचक दौर से गुजरी हैं जहां उन्होंने कई सह कलाकारों, निर्देशकों व फिल्म मेकर्स के साथ काम किया है। उनका मानना है कि ये वो चुनिंदा लोग हैं जो हर किसी को बराबरी की नजर से देखते हैं। वह कहती हैं कि आप अगर तार्किक बातें करेंगे तो लोग आपके जेंडर से बेपरवाह होकर आपको सुनेंगे।

दीया का मानना है कि महिलाओं के स्तर को सुधारने के मकसद को मुकाम तक पहुंचाने के लिए इस इंडस्ट्री से तमाम महिलाओं को जुड़ना होगा और फिल्म मेकिंग की विशाल प्रक्रिया से खुद को जोड़ना होगा। उन्हें विभिन्न क्षेत्रों से जुड़ी महिलाओं का नेतृत्व करना होगा और इंडस्ट्री के विभिन्न डिपार्ट्मेंट्स में किस्मत आजमानी होगी। इसके बाद ही हम लिंग समानता के सपने को हकीकत की शक्ल दे सकेंगे। उनका मानना है कि इस बदलाव में मीडिया का भी अहम योगदान हो सकता है। वह मीडिया को आत्मवलोकन करने की नसीहत देते हुए कहती है कि उसे पुरुष व महिला एक्टर्स को कवर करने में भेदभाव नहीं करना चाहिए।

वह कहती हैं कि हमें यह पता होना चाहिए कि हम क्या चुन रहे हैं और उसके क्या परिणाम संभावित हैं।

एन्टरप्रेन्योरशिप

दीया कहती हैं कि वह खुद को सीमित नहीं रख सकतीं। वह सवालिया अंदाज में कहती हैं कि हम केवल डॉक्टर, फिल्ममेकर या लॉयर बनने तक ही क्यों सीमित रह जाते हैं? जबकि इसके अलावा भी तमाम विकल्प खुले हैं। मैं एक फिल्ममेकर हूं इसका मतलब कतई नहीं कि मुझमें कुछ और करने के गुण नहीं हैं। दीया और उनके पति द्वारा संचालित होने वाली प्रोडक्शन कंपनी बोर्न फ्री एंटरटेनमेंट के बारे में वह कहती हैं कि यह हम दोनों की इच्छा का नतीजा है। इसके जरिए हम लोगों को एक विशेष तरह की कहानी बताना चाहते हैं। दीया कंपनी को लेकर हर रोज नई चुनौतियों का सामना करने को लेकर खुश हैं। इंटेलिजेंट व खूबसूरत होने के साथ ही दीया एक स्मार्ट एन्टरप्रेन्योर भी हैं जो चुनौतियों का सामना बखूबी करना जानती हैं। फिल्म प्रोडक्शन में उन्हें जो सबसे बड़ी चुनौती नजर आती है वह यह है कि पब्लिक तक कहानी को सही तरीके से पहुंचाना। लोगों को क्या दिखाना है और क्या नहीं यह एक ट्रिक है। इसके साथ ही आर्थिक संसाधनों का भी विशेष ध्यान रखना पड़ता है।

एक औरत होने के नाते

एक बेहतर परवरिश से होकर गुजरीं दीया हमेशा से ही बराबरी व स्वतंत्र विचारों की हितैषी रहीं। गलतियों को माफ करना उनकी जीवनशैली का हिस्सा है। दीया अपनी मां को सबसे स्ट्रिक्ट मानती हैं और वही उनके लिए अब तक की सबसे बड़ी आलोच्य हैं। वह इस बात के लिए खुश और अपनी मां के प्रति आभारी हैं। दीया का मानना है कि भारत में गर्ल चाइल्ड होने का असल मतलब तब साकार होगा जब देश की हर एक बच्ची को उनकी तरह परवरिश मिले। काॅलेज से घर लौटते वक्त जब शोहदे उन्हें घूरते थे तब उन्हें इस बात का तकाजा हुआ कि यह समाज लड़कियों के लिए किस हद तक घातक साबित हो सकती है।

कारण

दीया अब तक तमाम संस्थाओं व उनके कार्यों को प्रोत्साहित कर चुकी हैं लेकिन प्रकृति के लिए उन्होंने अब तक जो कुछ किया वह इसके लिए खुद को सबसे ज्यादा गौरवान्वित महसूस करती हैं। वह खुद को खुशनसीब मानती हैं कि सैंक्चुरी एशिया की बिट्टू सहगल को जानने का उन्हें मौका मिला और उन्हें उन चीजों में खुद को सक्रिय करने का अवसर मिला जिनमें उनकी सबसे ज्यादा रुचि थी।

दीया इस वक्त भी इंटरनेट के जरिए ऐसे लोगों की कहानियों को सबके सामने लाने की तैयारी कर रही हैं जिनका जीवन प्रेरणास्त्रोत है। फिल्म को आधार बनाते हुए वह उनकी कहानियों को सभी से विशेष तौर पर युवाओं से साझा करना चाहती हैं। वह मानती हैं कि यदि वह अपने इस मिशन में कामयाब हो गईं तो यह उनके लिए अब तक की सबसे बड़ी सफलता होगी।

भविष्य के प्लैन

दीया का मानना है कि ब्रह्माण्ड में असीमित संभावनाएं हैं। वह भविष्य में अपने जीवन के उद्देश्यों को मुकाम तक पहुंचाने के मकसद से कई फिल्में बनाना चाहती हैं। इसके साथ ही बच्चों के सपनों का ख्याल रखते हुए अपने पति साहिल का कंपनी व जीवन में पार्टनर होने के नाते पल-पल साथ देना भी उनकी प्राथमिकता है। वह हमारे पाठकों को यह संदेश देना चाहती हैं कि अपने लक्ष्य को पहचानो, फिर चाहे वह कितना ही कठिन क्यों न हो। उसके बारे में जानो और बेहतर ढंग से जानो।

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