चाइल्ड रेप के लिए फांसी की सजा: वह शख़्स जिसकी याचिका ने दिया एक ऐतिहासिक फ़ैसले को अंजाम

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 सरकार ने एक ऐतिहासिक क़ानून को अंजाम दिया और उसे राष्ट्रपति की मंज़ूरी भी मिली, जिसके तहत अब न्यायपालिका 12 साल से कम उम्र के बच्चों के साथ दुष्कर्म के दोषियों को मौत की सज़ा सुना सकती है। 

अलख श्रीवास्तव (फोटो साभार- हिंदुस्तान टाइम्स)
अलख श्रीवास्तव (फोटो साभार- हिंदुस्तान टाइम्स)
इससे पहले सज़ा की न्यूनतम अवधि 10 वर्ष ही थी; लेकिन क्या आप जानते हैं कि इस ऐतिहासिक फ़ैसले और बदलाव के प्रतिमान के पीछे किस शख़्स का सबसे बड़ा योगदान है?

हालिया नैशनल क्राइम डेटा के मुताबिक़, भारत में बच्चों के साथ रेप के जितने मामले दर्ज होते हैं, उनमें से सिर्फ़ 28 प्रतिशत मामलों में दोषियों को सज़ा मिल पाती है। ये आंकड़े, हालात की गंभीरता के गवाह हैं। 2016 में भारत में चाइल्ड रेप के 90 प्रतिशत मामले अधर में लटके हुए थे और पीड़ितों के पास न्याय की उम्मीद के साथ इंतज़ार करने के अलावा दूसरा कोई चारा नहीं था। साथ ही, हाल ही में उन्नाव और कठुआ में बच्चों के साथ दुष्कर्म की घटनाओं ने तो इंसानियत के अस्तित्व पर ही सवाल उठा दिया। दोनों ही मामलों में विरोध और समर्थन का अजब ही विरोधाभास सामने आया।

ऐसे हालात में सरकार ने एक ऐतिहासिक क़ानून को अंजाम दिया और उसे राष्ट्रपति की मंज़ूरी भी मिली, जिसके तहत अब न्यायपालिका 12 साल से कम उम्र के बच्चों के साथ दुष्कर्म के दोषियों को मौत की सज़ा सुना सकती है। साथ ही, इस क़ानून के तहत अब 16 साल की उम्र से कम की महिला के साथ रेप के मामले में दोषी को कम से कम 20 साल की सज़ा का प्रावधान भी बन चुका है। इससे पहले सज़ा की न्यूनतम अवधि 10 वर्ष ही थी; लेकिन क्या आप जानते हैं कि इस ऐतिहासिक फ़ैसले और बदलाव के प्रतिमान के पीछे किस शख़्स का सबसे बड़ा योगदान है?

यह शख्स हैं, अलख आलोक श्रीवास्तव। अलख ने ही सुप्रीम कोर्ट में जनहित याचिका दायर करते हुए मांग की थी कि बच्चों के साथ बलात्कार के दोषियों को फांसी की सज़ा सुनाई जाए। अपनी मांग के फलस्वरूप बने इस नए क़ानून को मंज़ूरी मिलने के बाद अलख मुस्कुराते हुए कोर्ट से बाहर निकले थे। देश की राजधानी दिल्ली में महज़ 8 महीने की बच्ची के साथ बलात्कार की दर्दनाक और निंदनीय घटना के बाद अलख आलोक श्रीवास्तव ने सुप्रीम कोट में यह जनहित याचिका दायर की थी। हिन्दुस्तान टाइम्स की रिपोर्ट के मुताबिक़, बच्ची के बलात्कार का आरोप उसके ही रिश्तेदार पर था।

दिल्ली विश्वविद्यालय के कैम्पस लॉ सेंटर से गोल्ड मेडलिस्ट अलख की याचिका के बाद सुप्रीम कोर्ट ने मामले की जांच के लिए एक मेडिकल बोर्ड का गठन किया। अलख बताते हैं कि अख़बार में इस दर्दनाक घटना के बारे में पढ़ने के बाद उनसे रहा नहीं गया और वह बच्ची और उसके परिवार से मिलने पहुंचे। अलख कहते हैं कि इस मौके के दौरान उन्हें किस हद तक तकलीफ़ हुई, वह उस संवेदना को बयान नहीं कर सकते। बच्ची के मां-बाप से मिलने के बाद और पूरी बात जानने के बाद, अलख ने सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर करने का फ़ैसला लिया।

अलख को गोल्ड मेडल सौंपने वाले, पूर्व मुख्य न्यायाधीश एस. एच. कपाड़िया ही उनकी प्रेरणा बने, और उन्हीं के नक़्श-ए-कदम पर चलते हुए अलख ने हाशिए पर खड़े समुदाय के लोगों की मदद की।

'सियासत' के हवाले से जानकारी मिली कि आलोक ने 2014 से लॉ प्रैक्टिस शुरू की थी। इससे पहले तक वह हिंदुस्तान पेट्रोलियम कॉर्पोरेशन लिमिटेड में नौकरी करते थे। आलोक दो बच्चियों के बाप हैं और लंबे समय से बच्चों के साथ शारीरिक शोषण और उत्पीड़न के मामलों के ख़िलाफ अपनी आवाज़ बुलंद करते आए हैं। आलोक इससे पहले भी ऐसे ही कई महत्वपूर्ण फ़ैसलों के पीछे के नायक रहे हैं। साल 2017 में उन्होंने एक 10 साल की बच्ची का गर्भपात करवाने के लिए चंडीगढ़ ज़िला अदालत में याचिका दायर की थी। बच्ची का उसके ही मामा ने बलात्कार किया था। कोर्ट ने बच्ची को गर्भपात कराने की इजाजत नहीं दी क्योंकि उसकी प्रेग्नेंसी अडवांस स्टेज पर पहुंच चुकी थी।

बच्चों के अधिकारों और सुरक्षा के लिए काम करने वाले अलख के लिए यह फ़ैसला सिर्फ़ एक सफलता ही नहीं, बल्कि एक बहुत बड़ी राहत है। अलख कहते हैं, "एक पिता होने के नाते मैं पीड़ितों के अभिभावकों और रिश्तेदारों की तकलीफ़ महसूस कर सकता हूं। अगर मैं इनके लिए कुछ प्रभावी नहीं कर पाता तो मैं शायद अपने आपको कभी माफ़ नहीं कर पाता।"

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