गांव के छात्रों के सामाजिक शिक्षण के लिए एक मंच 'Classle'

20 वर्षों तक काॅग्निजेंट जैसी बड़ी कंपनी में काम करने वाले वैद्यनाथन ने वर्ष 2009 में की स्थापनाभारतीय शिक्षा प्रणाली की मूलभूत समस्याओं के निदान की तलाश में गांवों में पहुंचे वैद्यनाथन को मिली ग्रामीण छात्रों से प्रेरणा2 लाख से भी अधिक छात्र उपयोकर्ता और 100 से भी अधिक काॅलेज इनके साथ जुड़े हुए हैंग्रामीण इलाकों के छात्रों को सामाजिक शिक्षा देकर उन्हें नौकरी दिलवाने में करते हैं मदद

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बिना सामधान की समस्याएं

वर्ष 1995 में काॅग्निजेंट में काम करना शुरू करने के साथ 20 वर्षो से भी अधिक का अनुभव रखने वाले वैद्यनाथन ने काॅब्निजेंट में अपने काम के अंतिम वर्षों में ध्यान दिया कि लोग अक्सर भारतीय शिक्षा के क्षेत्र में आने वाली समस्याओं के बारे में बात करते रहते थे। लगभग इसी दौरान इनका ध्यान भारत में पर्यावरण की बिगड़ती हुई स्थिति की ओर भी गया और इस ओर भी कि कोई भी इस समस्या का एक मापनीय समाधान लेकर सामने नहीं आ रहा है। Classle (क्लासले) के संस्थापक और सीईओ वैद्यनाथन कहते हैं, ’’किसी न किसी को तो इस दिशा में प्रयास करना ही था इसलिये मैंने ही शुरुआत करने का फैसला किया।’’


ग्रामीण सबब

हालांकि ‘क्लासले’ की शुरुआत भारतीय शिक्षा प्रणाली में मौजूद मूलभूत समस्याओं के बारे में पता करना था और वैद्यनाथन का इरादा एक ऐसे व्यापार को तो शुरू करना बिल्कुल भी नहीं था जो उन्हें आने वाले सामाजिक क्षेत्र की ओर जाने के लिये प्रेरित करे। लेकिन इन मूलभूत समस्याओं की जड़ की तलाश उन्हें ग्रामीण भारत में रहकर पढ़ने वाले छात्रों की ओर ले गई जो वर्तमान में देश की कुल छात्र जनसंख्या के 85 प्रतिशत हैं। इस प्रकार वर्ष 2009 में ‘क्लासले’ की स्थापना वेब की दुनिया से बाहर के एक सामाजिक शिक्षा के मंच के रूप में हुई जिसने बाद में भारत के ग्रामीण क्षेत्रों में रहने वाले छात्रों के लिये मोबाइल सेवा का भी प्रारंभ किया।

वैद्यनाथन कहते हैं, ‘‘भारत के ग्रामीण क्षेत्र को अभी ठीक तरह से परखा नहीं गया है और यह एक कोरी मिट्टी की तरह है। इस क्षेत्र में किसी भी परिवर्तन के बारे मे विचार करना एक बहुत बड़ी चुनौती था। विशेष रूप से आपको अपने ऐसे विचारों का समर्थन करने के लिये निवेश की व्यवस्था करना और भी बड़ी चुनौती साबित होता है।’’ पूंजी जुटाने की असफल कोशिशों के बाद उन्होंने इस काम के लिये अपनी बचत को ही इस्तेमाल करने का फैसला किया और उन्होंने अपने इस सफर की शुरुआत भविष्य में पूंजी जुटाने की स्पष्ट योजनाओं के साथ की और इन्होंने हाल ही में चेन्नई एंजिल्स से एक अच्छा निवेश प्राप्त किया है। पूंजी की व्यवस्था करना तो सिर्फ पहली बाधा थी और इसके बाद कर्मचारियों की व्यवस्था के रूप में एक और बाधा ने इनका रास्ता रोकने का प्रयास किया। अक्सर किसी भी स्टार्टअप के साथ काम करने के लिये अच्छी प्रतिभाओं को तलाशना काफी दुष्वार होता है और विशेषकर सामाजिक उद्यम के क्षेत्र में तो यह और भी मुश्किल हो जाता है। इस समस्या का समाधान उन्हें ग्रामीण इलाकों में मिला और उन्होंने वहां जाकर बेहतरीन प्रतिभाओं को तलाशने का काम प्रारंभ किया।


‘क्लासले’, एक सामाजिक शिक्षण मंच

सामाजिक शिक्षा के नेटवर्क के रूप में ‘क्लासले’ एक दो-तरफा माॅडल है। इसके एक छोर पर तो व्यक्तिगत छात्र उपयोगकर्ता हैं और दूसरी तरफ वे उपभोक्ता है जो इस छात्रों के भविष्य के संभावित नियोक्ता हैं। वर्तमान में ‘क्लासले’ के 2 लाख से भी अधिक पंजीकृत उपयोगकर्ता हैं और इनके नेटवर्क में 100 से कुछ अधिक साथी काॅलेजों जुड़े हुए हैं। काॅलेज अपने छात्रों को ‘क्लासले’ का एक घंटा उपलब्ध करवाने के लिये अपनी समयसारिणी में समायोजन करते हैं। चूंकि मोबाइल इस मंच की प्रारंभिक दृष्टि और विचार का एक अभिन्न अंग था इन्होंने ऐसे फीचर्स तैयार करने में अपना ध्यान लगाया जिसका प्रयोग छात्र आॅफलाइन तरीके से भी आसानी से कर सकें। ‘कैयाल’ जिसका मतनब होता है आपके हाथ में, छात्रों को उनके मोबाइल फोन के माध्यम से आॅडियो-वीडियो संसाधनों का प्रयोग करने में सक्षम बनाने के लिये ही तैयार किया गया था। इनका मोबाइल इंटरफेस इस प्रकार से तैयार किया गया है यिह एक सामान्य मोबाइल फोन पर भी आसानी से संचालित हो सकता है। अगर किसी छात्र के पास एक मोबाइल फोन और एक सिम कार्ड है तो वह एसएमएस के माध्यम से टेस्ट प्रश्नों को भेज सकता है और बदले में सिस्टम भी एसएमएस से ही उत्तर भी भेज देता है। हालांकि भारत सरकार द्वारा एसएमएस सेवाओं में किये गये भारी फेरबदल ने इनकी मोबाइन सेवाओं को काफी हद तक प्रभावित किया है।

राजस्व की दिशा में इनका इस द्विस्तरीय माॅडल है। शिक्षण संस्थाएं प्रतिमाह प्रति उपयोकर्ता एसएएएस आधारित भुगतान करती हैं। इसके अलावा जब छात्र इनके मंच पर अपना पंजीकरण करवाते हैं तो उनके काम की गतिविधियों का डाटा विभिन्न कंपनियों को इन्हें नौकरी पर रखने के लिये भेजा जाता है और वे कंपनियों से इसकी कीमत लेते हैं। वैद्यनाथन बताते हैं, ‘‘हम उन छात्रों को राजगार दिलवाने में मदद करते हैं जिन्हें उनकी क्षमताओं के बावजूद नौकरी के अवसर नहीं मिल पाते हैं।’’


भविष्य की योजनाएं

वैद्यनाथन अपनी बातों को विराम देते हुए कहते हैं, ‘‘हर कोई शिक्षा के क्षेत्र का एक हिस्सा बनने के लिये बेकरार है और उनमें से लगभग सभी नई व्यवस्थाओं में शिक्षा की बुनियादी बातों को समझे और जाने बिना उसी पुराने घिसे-पिटे माॅडल की नकल करने में लगे हैं। हम एक बदलाव लाना चाहते हैं और अभी हम इस काम की गहराई में नहीं उतरे हैं। आपके सामने सबसे बड़े अवसर सिर्फ भारत में ही हैं। अगर आप इसे यहां काम करने लायक बना पाते हैं तो यह निश्चित तौर पर प्रतिस्पर्धी बन जाता है और आपके माॅडल को पूरी दुनिया में कहीं भी बेधड़क इस्तेमाल किया जा सकता है। मैं लोगों को बाहर निकलकर जीवन के मजे लेने के लिये प्रेरित करता हूँ।’’

बीते 18 महीनों में आॅफलाइन, मोबाइल और सामाजिक शिक्षण का संयोजन चहुंओर सुर्खियां बटोरने में कामयाब रहा है। ‘क्लासले’ ने अन्य लोगों की यसोच से कुछ साल पहले पारंपरिक ज्ञान के खिलाफ काम करने की शुरुआत करके अपने प्रतिद्वंदियों पर एक बढ़त बनाने में सफलता प्राप्त की है। वास्तव में आने वाला समय आॅनलाइन सामाजिक शिक्षण का ही है।

इस सामाजिक शिक्षण मंच के बारे में अधिक जानकारी पाना चाहते हैं। एक नजर डालिये ‘क्लासले’ पर।

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Worked with Media barons like TEHELKA, TIMES NOW & NDTV. Presently working as freelance writer, translator, voice over artist. Writing is my passion.

Stories by Nishant Goel