प्रकृति प्रेम: दिल्ली के मंदिरों में चढ़ाए जाने वाले फूलों से तैयार की जा रही खाद

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दिल्ली के झंडेवालान मंदिर के सामने दुकानदार आपको माता की चुन्नी और मालाएं बेचते नजर आ जाएंगे। यहां हर रोज 5,000 से 10,000 श्रद्धालु रोजाना पूजा करने के लिए आते हैं। इससे हर रोज लगभग 2 क्विंटल फूल एकत्रित हो जाते हैं।

सांकेतिक तस्वीर
सांकेतिक तस्वीर
बीते कुछ सालों से मंदिर में एक मशीन लगाई गई है जिससे बेकार हो गए फूलों को खाद में बदल दिया जाता है। मशीन न होने की स्थिति में ये फूल नदियों और नालों में प्रवाहित किया जाता था।

क्या आप किसी मंदिर में पूजा-अर्चना करने गए हैं? गए ही होंगे, लेकिन क्या आपने कभी सोचा कि जो फूल-माला भगवान की मूर्ति पर चढ़ाई जाती है, उसका बाद में क्या होता होगा। दरअसल फूल-माला और पूजन सामग्री का सही से निपटान न होने से ये शहरों में प्रदूषण का एक बड़ा कारण बन जाता है। दिल्ली में मंदिर में चढ़ाने वाले फूलों से खाद बनाने का काम किया जा रहा है। यह खाद किसानों के लिए अत्यंत उपयोगी साबित हो रही है।

दिल्ली के झंडेवालान मंदिर के सामने दुकानदार आपको माता की चुन्नी और मालाएं बेचते नजर आ जाएंगे। यहां हर रोज 5,000 से 10,000 श्रद्धालु रोजाना पूजा करने के लिए आते हैं। इससे हर रोज लगभग 2 क्विंटल फूल एकत्रित हो जाते हैं। मंगलवार और रविवार को तो 5 क्विंटल फूल इकट्ठा हो जाता है। वहीं नवरात्रि के दिनों में हर रोज मंदिर से एक टन फूल निकलता है। बीते कुछ सालों से मंदिर में एक मशीन लगाई गई है जिससे बेकार हो गए फूलों को खाद में बदल दिया जाता है। मशीन न होने की स्थिति में ये फूल नदियों और नालों में प्रवाहित किया जाता था।

पिछले 24 सालों से इस मंदिर में काम करने वाले सुरेंद्र कमार मशीन को चलाने का काम करते हैं। टाइम्स ऑफ इंडिया से बात करते हुए उन्होंने कहा, 'मैं मशीन में फूलों को बुरादे और बैक्टीरिया के साथ डाल देता हूं। इससे अपने आप कंपोस्ट बनकर निकल आता है।' सुरेंद्र मशीन कोो हर 15 दिन में चलाते हैं और हर रोजज 30 किलोग्राम खाद तैयार करते हैं। इस कंपोस्ट की हरियाणा के किसानों और नजदीकी स्कूलों में काफी डिमांड है। खास बात यह है कि इस मशीन को चलाने का खर्च सिर्फ 500 रुपये महीने होता है। वहीं पहले फूलों को एक जगह से दूसरी जगह भेजने में ही 3,000 रुपये लग जाते थे।

दिल्ली में 8 जगहों पर ऐसी मशीनें लगाई गई हैं, जिनसे फूलों को खाद में परिवर्तित कर दिया जाता है। ये मशीनें एंजेलीक फाउंडेशन और लोकसभा सांसद मीनाक्षी लेखी के सहयोग से लगाई गई हैं। एक आंकड़े के मुताबिक भारत में हर रोज 20 लाख टन फूलों का कचरा इकट्ठा होता है जिसका अधिकांश हिस्सा कचरे के ढेर में डंप हो जाता है। फिर यह किसी काम भी नहीं आ पाता क्योंकि यह उन तमाम चीजों के साथ मिल जाता है जो जैविक रूप से निम्नीकरण योग्य नहीं होते।

ऐसे ही कानपुर में भी अंकित अग्रवाल और करन रस्तोगी 49 मंदिरों का फूल इकट्ठा करते हैं और उनसे खुशबूदार धूप तैयार करते हैं। उन्होंने 2015 में हेल्प अस ग्रीन की स्थापना की थी। वे हर रोज 4.2 टन फूलों का कचरा इकट्ठा करते हैं और इससे 75 महिलाओं को रोजगार भी मुहैया कराते हैं। रस्तोगी कहते हैं, 'हम पैकेजिंग के ऊपर धार्मिक चिह्न बना देते हैं ताकि लोग इसे कचरे के ढेर में फेंकने से पहले एक बार सोचें। हम उसमें तुलसी के बीज डाल देते हैं ताकि लोग इसे गमले में लगा सकें।'

पानी में फूलों को प्रवाहित करने से नदियां और नाले प्रदूषित होते हैं। इससे नदियों में ऑक्सिजन की मात्रा कम हो जाती है और उसमें रहने वाले जीव जंतुओं का जीवन खतरे में पड़ जाता है। बेंगलुरु में पीएचडी कर रहीं केमिकल इंजीनियर पारिमाला शिवप्रसाद ने इन फूलों से कई तरह के तेल बनाने का नुस्खा खोज लिया है। वह हर रोज लैब में 2 किलोग्राम फूल लेकर जाती हैं और उससे तेल तैयार करती हैं। बाकी का जो हिस्सा बचता है उसे वह खाद के रूप में बदल देती हैं। वह पायलट प्रॉजेक्ट के तौर पर बेंगलुरु के ही एक मंदिर में इसे सेट अप कर रही हैं।

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