जयपोर: यकीन के लिए नाम ही काफी है

दिल्ली की एक हवेली से वर्चुअल दुनिया तक का सफर

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दिसंबर 2011 का वक्त था। दिल्ली की कड़ाकी ठंड में सुबह के आठ बजे थे। पुनीत चावला गुड़गांव के लीला होटल में अपने भावी को-फाउंडर शिल्पा शर्मा का इंतजार कर रहे थे। पांच मिनट में ही वह आ गईं। दोनों ने जयपोर की कल्पना की थी, एक ऐसे ई-कॉमर्स पोर्टल की जिसका उद्देश्य भारत में बने उत्पादों को दुनिया में ले जाना था।

जल्द ही पुनीत शिल्पा और कुछ दोस्तों की एक टीम तैयार हो गई और उन्होंने दिल्ली के शाहपुर जाट में एक पुरानी हवेली में अपना पहला ऑफिस खोला। जाड़े का दिन टेरेस पर धूप सेंकते हुए कटता था या फिर सड़कों पर शूट करते हुए कटता था। टेरेस के कोने पर पड़ी चारपाई थकान भरे दिन से राहत दिलाता था। मीटिंग्स और इंटरव्यूज पड़ोस के कॉफीशॉप में होते थे। पुनीत याद करते हैं- “जब हमने ऑफिस में एक मीटिंग रूम बनाया तो वह वास्तव में एक मित्र का सोफा सेट था जिसे कोने में रखा गया था। आज भी वह सोफा हमारे नए ऑफिस के वेटिंग एरिया में पड़ा हुआ है।”

कंपनी की शुरूआत बहुत ही साधारण थी फिर भी पुनीत और शिल्पा अपने आइडिया की कामयाबी को लेकर आश्वस्त थे। पुनीत ई-कॉमर्स बिजनेस में काम कर रहे थे और यूएस के एनआरआई कस्टमर्स को इंडियन डिजाइनर ड्रेस बेच रहे थे।

ठोस जमीन पर हवाई किले का निर्माण

पुनीत कहते हैं- “मैंने नोट किया कि इंडियन मेड प्रोडक्ट्स की डिमांड बहुत ज्यादा थी खासकर उनकी जो हमारे जड़ों से गहराई से जुड़े हुए थे। मैंने शिल्पा से यही बात बताई। उस समय वह एक कंसल्टेंट के तौर पर काम कर रही थी। फिर हम दोनों ने जयपोर की स्थापना करने का फैसला किया।”

मगर स्टार्टअप लाइफ बहुत ही मुश्किल होती है। सपने देखने वालों के लिए तो दिल्ली में पुरानी हवेली वाला ऑफिस परफेक्ट था मगर अब वो उस सपने को बिजनेस में बदलने की कोशिश कर रहे थे। शुरुआती टीम के हर मेंबर के पास एक अलग तरह का हार्ड टास्क था। पुनीत बताते हैं- “शुरुआती दिनों में मैं खुद ही पहरेदार था, इलेक्ट्रिशियन था, सीईओ था, डेटा एंट्री ऑपरेटर था, फोटोग्राफर और डिलेवरी ब्वॉय था।”

पुनीत चावला, जयपोर के सह-संस्थापक
पुनीत चावला, जयपोर के सह-संस्थापक

दूसरी तरफ उन्हें फंड की चुनौती से भी जूझना था। टीम लगातार किसी तरह बिना कुछ खर्च किये काम करने के तरीकों को खोज रही थी। सिर्फ ऑनलाइन तक सीमित बिजनेस की एक सबसे बड़ी चुनौती है कि जब तक आप किसी के पास नहीं पहुंचते हैं, वो आपके वजूद के बारे में नहीं जान पाता है। यहां भी मार्केटिंग के लिए पैसों की जरुरत थी।

तब टीम ने आम तौर पर अपनाए जाने वाले रास्ते को चुना और सोशल मीडिया पर अपने टारगेट ऑडिएंस के लोगों की तलाश के लिए व्यक्तिगत तौर पर लोगों को अपनी वेबसाइट विजिट करने के लिए इनवाइट करने लगी। पुनीत बताते हैं- “हमें शुरुआती समर्थन हमारे परिवार और दोस्तों से मिला जो हमारे फेसबुक पेज को शेयर करते थे। इसके बाद वर्ड्स-ऑफ-माउथ का दौर शुरू हुआ।”

सपनों की दुनिया में वास्तविकता का सामना करना

शुरुआती दिनों में टीम सिर्फ यूएस में ही प्रोडक्ट बेच रही थी। जब किसी इंटरनेशनल वेबसाइट से खरीदारी की बात आती है तो विश्वास एक बड़ा फैक्टर होता है। कस्टमर अपने क्रेडिट कार्ड डिटेल्स की सेफ्टी और प्रोडक्ट के असली होने को लेकर डरते थे। कुछ शुरुआती कस्टमर्स के डर को दूर करने के लिए तो पुनीत को व्यक्तिगत तौर पर फोन करना पड़ता था।

पैकेजिंग मैटेरियल और शिपिंग डिटेल्स के काम को निपटाने के लिए कोर टीम को दिल्ली के चावड़ी बाजार और मुंबई के क्राफोर्ड मार्केट में सही वेंडर्स और मैटेरियल के लिए भटकना पड़ा। पैकेजिंग सही है या नहीं, ये जांचने के लिए दुनिया भर में दोस्तों के पास प्रयोग के तौर पर कई शिपमेंट भेजे गए।

एक बार जब वो ट्रैफिक और रेवेन्यू पाना शुरू कर दिये तो अब टीम के सामने टेक्नोलॉजी इंफ्रास्ट्रक्चर की चिंता थी। उनका शुरुआती सर्वर लोड नहीं उठा पा रहा था और अक्सर बैठ जाता था। बीयर और पिज्जा के बदले में दोस्तों और सॉफ्टवेयर इंजीनियरिंग से जुड़े पूर्व सह-कर्मचारियों से सर्वर प्रॉब्लम दूर कराई जाती थी।

पुनीत बताते हैं- “जैसे ही हम विकसित हुए हमारी चुनौतियां भी बदल गईं। जब हमने शुरुआत किया तब भी बहुत सारी दूसरी साइट्स थीं जो हमारे जैसे ही प्रोडक्ट्स बेच रही थीं। अब हमें आगे टिके रहना था और अपने स्थान की रक्षा करनी थी। ये बहुत चुनौतीपूर्ण था मगर कुछ अलग करने की इच्छाशक्ति और रोमांच ने हमें चलते रहने की शक्ति दी।”

ग्रोथ उनके उम्मीद से कई गुना बेहतर था। अमेरिकी मार्केट के लिए सितंबर 2012 में बीटा लॉन्च हुआ। इसे जनवरी 2013 में ग्लोबली लॉन्च किया गया और तब से जयपोर के रेवेन्यू में 5000% का उछाल आ चुका है।

भीड़ से अलग शुरुआत

पुरानी हवेली के दिनों से ही जयपोर तीन चीजों की वजह से टिका रहा- गुणवत्ता, ईमानदारी और कस्टमर्स से प्यार। उन्होंने कभी इन तीनों चीजों से समझौता नहीं किया। सब कुछ पारदर्शी था। कस्टमर्स, इन्वेस्टर्स, इम्पलॉयिज सबसे कुछ भी छिपा हुआ नहीं था। जो दिखाया जाता है, वही दिया जाता है।

पुनीत कहते हैं कि लोग मशीन से बने सस्ते उत्पादों के बजाय हैंडलूम से बने सामानों को सिर्फ इसलिए नहीं चुनते कि वो इसे एफोर्ड कर सकते हैं, बल्कि वो ऐसा इसलिए करते हैं क्योंकि वो हमारे युगों-पुराने क्राफ्ट्स को प्रमोट करना चाहते हैं और हमारी प्राचीन विरासत को बरकरार रखना चाहते हैं। इसीलिए टीम उन्हें सिर्फ एक कस्टमर के तौर पर नहीं देखती बल्कि एक परिवार के तौर पर देखती है।

बिजनेस की बात

जयपोर जिस भी उत्पाद को बेचती है उसके सेलिंग प्राइस और उसे सोर्स करने में लगी कीमत के बीच मार्जिन रखती है। ये एक सिंपल रिटेल रेवेन्यू है। टीम जयपोर को एक ग्लोबल प्रोडक्ट के तौर पर स्थापित करना चाहती है।

देशभर के बुनकरों, समूहों और डिजाइनर्स के खूबसूरत प्रोडक्ट्स के अलावा टीम कुछ चुनी हुई कैटेगरिज में खुद का एक्सक्लूसिव प्रोडक्ट विकसित करना चाहती है। पुनीत आखिर में कहते हैं- “और जब सही समय आएगा तो हम ऑफलाइन बिजनेस में भी अपनी उपस्थिति दर्ज कराना चाहेंगे।”

इस साल के आखिर तक भारत में ई-कॉमर्स का मार्केट 16 बिलयन डॉलर का हो जाएगा। दरअसल, भारत दुनिया में सबसे तेजी से बढ़ने वाला ई-कॉमर्स मार्केट है। इसके अलावा एथनिक और क्षेत्र-विशेष से जुड़े हुए प्रोडक्ट्स का मार्केट तेजी से बढ़ रहा है। इसमें पहले से ही बहुत सारे प्लेयर हैं जैसे Giskaa, Tjoriऔर Kashmiri Box।