चुनाव में माननीयों के गलत शपथपत्र, फर्जी पैन कार्ड!

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आम मतदाता से तो हमारी चुनाव व्यवस्था बड़ी बारीकी से ईमानदारी की उम्मीद करती है, अक्सर मामूली बात पर भी उसे वोट देने से वंचित कर दिया जाता है लेकिन एक सर्वे में ऐसे तमाम सांसदों, सैकड़ों विधायकों के बारे में खुलासा हुआ है, जो फर्जी पेन कार्ड, गलत शपथपत्र देने आदि के दोषी पाए गए हैं।

चुनाव मैदान में उतरने से पूर्व हर प्रत्याशी को शपथपत्र के साथ पैन कार्ड का ब्योरा भी देना जरूरी होता है। मिजोरम विधानसभा चुनाव में अभी तक 40 विधायकों में से 28 ने अभी तक अपने पैन कार्ड के ब्योरे नहीं दिए हैं।

चुनाव सुधारों के लिए काम करने वाली संस्था एसोसिएशन आफ डेमोक्रेटिक रिफॉर्म्स (एडीआर) और नेशनल इलेक्शन वाच (एनईडब्ल्यू) के एक अध्ययन में पता चला है कि कानूनी बाध्यता के बावजूद भारत के सात सांसदों और लगभग दो सौ विधायकों ने अब तक चुनाव आयोग के पास अपने पैन कार्ड ब्योरा प्रस्तुत नहीं किया है। इतना ही नहीं, लाखों, करोड़ो मतदाताओं का प्रतिनिधित्व करने वाले ज्यातर प्रत्याशी तो ठीक से शपथपत्र और नामांकन पत्र भर ही नहीं पाते हैं, जबकि निर्वाचन आयोग की ओर से ऐसे प्रत्याशियों की अयोग्यता को ध्यान रखते हुए शपथपत्र का नया और सरल प्रारूप निर्वाचन जारी करना पड़ा है। हर चुनाव में तमाम प्रत्याशी शपथपत्र में ढेरों गलतियां छोड़ देते हैं। इस पर संबंधित रिटर्निंग अफसर नोटिस जारी कर देते हैं और औपचारिकता पूरी हो जाती है। अब आयोग ने शख्ती बरतते हुए स्पष्ट निर्देश दे रखे हैं कि शपथपत्र में कोई भी कॉलम खाली छोड़ना अथवा कोई गलत निशान लगाना कत्तई स्वीकार्य नहीं होगा।

विशेषज्ञों का मानना है कि कइयों से नासमझी में ऐसा हो जाता है है तो कई राजनेता दो चुनावों के बीच निजी संपत्ति में होने वाली बेतहाशा वृद्धि को छिपाने के लिए पैन कार्ड के फर्जी ब्योरे देने लगे हैं। केंद्रीय प्रत्यक्ष कर बोर्ड (सीबीडीटी) सुप्रीम कोर्ट को बता चुका है कि वह देश के सात लोकसभा सांसदों और विभिन्न राज्यों के 98 विधायकों की संपत्ति में बेतहाशा वृद्धि और उनकी ओर से पेश किए ब्योरे में विसंगतियों की जांच कर रहा है। चुनाव पर्यवेक्षकों का कहना है कि कानून के रखवालों से ऐसे फर्जीवाड़े की तों उम्मीद नहीं की जानी चाहिए। अगर वे ही ऐसा करेंगे तो आम मतदाता से निजी जीवन में ईमानदारी की उम्मीद कैसे की जा सकती है? चुनाव विशेषज्ञों का कहना है कि सांसदों, विधायकों के ऐसे फर्जीवाड़ों के खिलाफ जांच कर कड़ी कार्रवाई होनी चाहिए। ऐसा नहीं होने पर आम लोगों में गलत संदेश जाएगा। हर दो चुनावों के बीच ज्यादातर नेताओं की संपत्ति कई गुनी बढ़ जाती है। इसे छिपाने के लिए वे या तो पैन कार्ड का ब्योरा नहीं देते या फिर फर्जी ब्योरे दे देते हैं। ऐसे मामलों में आयकर विभाग से विशेष सतर्कता की उम्मीद की जानी चाहिए।

चुनाव मैदान में उतरने से पूर्व हर प्रत्याशी को शपथपत्र के साथ पैन कार्ड का ब्योरा भी देना जरूरी होता है। मिजोरम विधानसभा चुनाव में अभी तक 40 विधायकों में से 28 ने अभी तक अपने पैन कार्ड के ब्योरे नहीं दिए हैं। इसी तरह एडीआर और एनईडब्ल्यू ने लोकसभा के 542 सांसदों और विभिन्न राज्यों के कुल 4,086 विधायकों के पैन कार्ड के ब्योरे के अध्ययन के बाद तैयार अपनी रिपोर्ट में बताया है कि सात सांसदों और 199 विधायकों ने पिछले चुनावों के दौरान चुनाव अधिकारियों के सामने दायर अपने हलफनामे में पैन कार्ड के ब्योरे नहीं दिए। ऐसे विधायकों में 51 तो अकेले कांग्रेस के विधायक हैं। इस मामले में भाजपा भी पीछे नहीं है। कुछ ही कम, उसके 42 विधायकों ने अपने पैन कार्ड के ब्योरे जमा नहीं किए। आम मतदाताओं की सियासत करने वाली माक्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी के भी 25 विधायकों ने पैन कार्ड ब्योरे नहीं दिए हैं। राज्यवार आयोग की इस चुनावी समीक्षा में केरल के 33 विधायकों ने अपने पैन कार्ड का ब्योरा जमा नहीं किया है।

देश के तमाम माननीय सांसद भी इस समीक्षा में अपने पैन कार्ड के ब्योरे नहीं देने वालों में उल्लिखित हैं। ऐसे सांसदों में से दो बीजू जनता दल (ओडिशा) और दो एआईडीएमके (तमिलनाडु) के हैं और बाकी एक-एक असम, मिजोरम और लक्षद्वीप के हैं। ये तीनों क्रमश: ऑल इंडिया यूनाइटेड डेमोक्रेटिक फ्रंट (एआईयूडीएफ), कांग्रेस और नेशनलिस्ट कांग्रेस पार्टी (एनसीपी) के हैं। जिन विधायकों के पैन कार्ड के ब्योरों में विसंगितयां हैं, उनमें सबसे ज्यादा 18 भाजपा, नौ कांग्रेस, तीन जनता दल (यूनाइटेड) के हैं। इससे पूर्व 'कोबरापोस्ट' की एक ताजा रिपोर्ट में दावा किया जा चुका है कि देश के छह पूर्व मुख्यमंत्रियों और दस मौजूदा मंत्रियों समेत 194 विधायकों ने चुनाव आयोग के समक्ष पैन कार्ड का फर्जी ब्योरा पेश किया है। वेबसाइट ने वर्ष 2006 से 2016 के बीच आयोग के समक्ष दायर हलफनामों और आयकर विभाग की वेबसाइट पर उपलब्ध आंकड़ों के हवाले से ये दावा किया है। कइयों ने तो अस्तित्वहीन पैन नंबर के ब्योरे दे दिए। कई ऐसे हैं, जो अलग-अलग तरह के पैन कार्ड नंबर पेश कर चुके हैं। इनमें असम के पूर्व मुख्यमंत्री तरुण गोगोई, भूमिधर बर्मन, बिहार के जीतन राम मांझी, हिमाचल प्रदेश केवीरभद्र सिंह आदि के नाम उल्लेखनीय हैं।

सदन की कुर्सी तक पहुंचने से पहले तमाम माननीयों के रिकार्ड दागी पाए जा चुके हैं। उल्लेखनीय है कि इसी साल गत अगस्त माह में सुप्रीम कोर्ट ने चुनाव अपराध को संज्ञेय बनाने और सजा कम से कम दो वर्ष किए जाने की मांग वाली याचिका यद्यपि खारिज कर दी थी, याचिका में मांग की गई थी कि रिश्वतखोरी, चुनाव प्रभावित करने और उम्मीदवार के चुनाव खर्च का लेखाजोखा रखने में नाकाम रहने जैसे चुनाव अपराध को संज्ञेय बनाया जाए। सुप्रीम कोर्ट का कहना था कि जघन्य अपराधों के आरोपियों को चुनाव लड़ने से अयोग्य ठहराने पर फैसला देना संसद के कार्यक्षेत्र में घुसने जैसा होगा। कोर्ट 'लक्ष्मण रेखा' पार नहीं करना चाहता है। उधर चुनाव आयोग सुप्रीम कोर्ट में पेश अपने एक हलफ़नामे में कह चुका है कि राजनीति को अपराध मुक्त बनाने की दिशा में और प्रभावी क़दम उठाने के लिए क़ानून में संशोधन की ज़रूरत है।

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पत्रकार/ लेखक/ साहित्यकार/ कवि/ विचारक/ स्वतंत्र पत्रकार हैं। हिन्दी पत्रकारिता में 35 सालों से सक्रीय हैं। हिन्दी के लीडिंग न्यूज़ पेपर 'अमर उजाला', 'दैनिक जागरण' और 'आज' में 35 वर्षों तक कार्यरत रहे हैं। अब तक हिन्दी की दस किताबें प्रकाशित हो चुकी हैं, जिनमें 6 मीडिया पर और 4 कविता संग्रह हैं।

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