ज़रूरी है डिलीवरी के बाद डिप्रेशन में जा रही मां का ख्याल रखना

एक नये और नन्हें जीव को इस दुनिया में लाकर दुनिया को समझने और जीने के काबिल बनाना शायद सबसे बड़ी चुनौती है। ये कह कर, कि 'अरे बच्चे तो पल जाते हैं...' बचा नहीं जा सकता, क्योंकि बच्चे पलते नहीं उन्हें पालना पड़ता है और उसके लिए सबसे बड़ी भूमिका निभानी पड़ती है माँ को, लेकिन क्या माँ पूरी तरह से तैयार है उसके लिए?

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मां बनने का अहसास होता है सबसे खास। घर में एक नए सदस्य आने की खुशी से पूरा घर खिल उठता है, लेकिन नई मां बनी औरत एक साथ ही कई सारे मानसिक, शारीरिक, भावनात्मक बदलावों, दर्द और अनुभवों से होकर गुजरती है। डिलीवरी या गर्भावस्था के बाद नई मां डिप्रेशन में जा सकती है। औरत का दुखी महसूस करना, अपने आप को व्यर्थ समझना और समय-समय पर रोना, ये सब डिलीवरी के बाद हॉर्मोन की मात्रा शरीर में बदलने के कारण होता है, जो कि बड़ी सामान्य-सी बात है। इस बदलाव को बेबी ब्लूज कहा जाता है, लेकिन कभी-कभी स्थिति बेबू ब्लूज से आगे की बन जाती है, जिससे कि कोई गंभीर डिप्रेशन पैदा हो सकता है...

फोटो साभार: Shutterstock
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ऐसा कई बार देखा गया है, कि नई मां प्रसव के बाद किसी खास तरह की मानसिक बीमारी का शिकार हो जाती है। कई दफा लोग इसे आया गया समझ लेते हैं, लेकिन ऐसी चीज़ों को हल्के में लेने की ज़रूरत हैं, क्योंकि ये इशारा हो सकता आने वाली किसी गंभीर बीमारी का।

मां बनना जितना खूबसूरत एहसास है, उतना ही मुश्किल भी। एक नये और नन्हें जीव को इस दुनिया में लाकर दुनिया को समझने और जीने के काबिल बनाना शायद सबसे बड़ी चुनौती है। ये कह कर, कि 'अरे बच्चे तो पल जाते हैं...' बचा नहीं जा सकता, क्योंकि बच्चे पलते नहीं उन्हें पालना पड़ता है और उसके लिए सबसे बड़ी भूमिका निभानी पड़ती है माँ को। लेकिन ऐसा हर बार नहीं होता कि एक नई बनी मां भी अपनी इस जिम्मेदारी को निभाने के लिए शारीरिक और मानसिक दोनों रूपों में तैयार हो। जहां कोई जगह खाली रह जाती हैं, वहीं शुरू होता सामान्य और डिप्रेशन का द्वंद।

डिलीवरी बेहद ही कठिन प्रक्रिया है। डिलीवरी के बाद एक औरत के शरीर में कई तरह के नये हार्मोन्स बनते और खत्म होते हैं। कभी-कभी ये हार्मोंन्स पॉज़िटिव न होकर नैगेटिव हो जाते हैं, जो कि शरीर के साथ-साथ मानसिक कष्ट पहुंचाना शुरू कर देते हैं और वो कष्ट होता है, डिप्रेशन। डिलीवरी के बाद का डिप्रेशन दो प्रकार का होता है- प्रारम्भिक डिप्रेशन या बेबी ब्लूज और देर तक रहने वाला पोस्टपार्टम डिप्रेशन

जल्दी समाप्त होने वाला डिप्रेशन बहुत गंभीर नहीं होता है। ये अवसाद लगभग 80% महिलाओं को होता है। ये प्रसव के बाद शुरू होता है और आमतौर पर बिना किसी प्रकार के चिकित्सकीय उपचार के कुछ हफ़्तों में ही ठीक हो जाता है। देर तक रहने वाले अवसाद को ही ज्यादातर डॉक्टर पोस्टरपार्टम डिप्रेशन मानते हैं। ये अधिक गंभीर होता है और प्रसव के बाद कई हफ्तों से लेकर एक वर्ष तक रह सकता है। ये अवसाद 10% -16% महिलाओं को होता है।

अच्छी बात ये है, कि सभी तरह के डिप्रेशन का इलाज दवा और परामर्श से हो सकता है। बेहतर होगा की डिप्रेशन का इलाज शुरुआती लक्षणों से ही कर लें न कि उनके बढ़ने का इंतज़ार कर अपनी सेहत से खेलें। जल्द से जल्द एक प्रोफेशनल मानसिक स्वास्थ्य विशेषज्ञ से सम्पर्क करें।अगर आप प्रसव पश्चात अवसाद से ग्रस्त मां के साथी हैं तो उसको अकेला न छोड़ें, बल्कि उसको प्यार दें, उसकी भरपूर देखभाल करें। आपको ये समझने की जरूरत है कि यह एक ऐसी मां है जो गंभीर भावनात्मक मनोविचारों में जकड़ी हुई है। उससे थेरेपी और दवाओं के लिए आग्रह करें।

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डिलीवरी के बाद डिप्रेशन के कारण

गर्भावस्था के दौरान महिलाओं में 2 हॉर्मोन जैसे एस्ट्रोजन और प्रोजेस्ट्रोन की मात्रा ज्यादा होती है और डिलीवरी के बाद इनकी मात्रा अचानक से गिर जाती है, जो बच्चे के जनम के 3 दिन बाद अपने आप संतुलित हो जाती है। ये अचानक से हारमोन्स की गिरावट नई मां के शरीर में हार्मोनल संतुलन को असंतुलित कर देते है, जिससे डिप्रेशन बनता है। लेकिन कितनी मात्रा में इन 2 हार्मोन्स की गिरावट, डिप्रेशन को बनाती है इसका सही से अनुमान नहीं लगाया जा रहा है। पोस्टपार्टम डिप्रेशन बच्चे के जन्म के 4 हफ़्तों में इन 3, बेबी ब्लूज, डिप्रेशन में से किसी एक के कारण बन सकता है। ज्यादातर नई मां बेबी ब्लूज को एक या दूसरे प्रकार में अनुभव करती हैं लेकिन दस में से कोई एक महिला डिप्रेशन का शिकार बनती है। हज़ार में से कोई एक महिला प्रसव के बाद मानसिक बीमारी या पोस्टपार्टम साइकोसिस से गुज़रती है। पोस्टपार्टम साइकोसिस बहुत ही गंभीर समस्या है, जिसमें आत्महत्या या अपने ही बच्चे को मार डालने की आशंका ज्यादा होती है। ये बच्चे के जन्म के 48 घंटे के या 2 हफ्तों के अंतर्गत में अचानक से हो जाता है।

पोस्टपार्टम डिप्रेशन के लक्षण

नींद न आना, कम भूख लगना, अपने बच्चे और पार्टनर से दूर होना, मूड स्विंग्स, लगातार दुखी रहना, चिड़चिड़ाहट या बेचैनी, बार बार रोना, अधिक चिंता, डर सताना, अपराधी या नाकाबिल महसूस करना, आत्महत्या का विचार करना, निराशा घेर लेना, अधिक थकान। अगर ये लक्षण 1 से 2 दिन से ज्यादा रहे तो इन्हें सामान्य सा बेबी ब्लूज समझ कर टालना नहीं चाहिए, बल्कि इनका तुरंत इलाज करना शुरू करें।

पोस्टपार्टम डिप्रेशन की वजहें

गर्भावस्था से पहले या बाद परिवार में डिप्रेशन का इतिहास, वैवाहिक जीवन में कलह या परिवार में कोई समस्या, समाज और परिवार से कम सहायता।

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पोस्टपार्टम डिप्रेशन का इलाज

अगर डिलीवरी के 1 से 3 दिन के अतरिक्त आपको पोस्टपार्टम डिप्रेशन हो गया है और आप अब भी अस्पताल में है तो तुरंत अपने डॉक्टर से इस बारे में बात करें और इसका इलाज करवा लें। वैसे भी एंटी डिप्रेसंट नई मां के लिए हानिकारक है वो भी जब वे अपने बच्चे को स्तन से दूध पिलाती हो। इस दौरान के लिए कुछ विशेष दवा है जिनका प्रयोग किया जा सकता है लेकिन बेहतर होगा की पहले डॉक्टर से इस बारे में विस्तार से परामर्श ले लें। ज्यादातर पोस्टपार्टम डिप्रेशन डिलीवरी के 2 से 3 दिन के बाद होता है जब आप अस्पताल से जा चुकी है और अपने घर पर लौट चुकी हो। इस डिप्रेशन के इलाज के लिए आप नीचे दिए गए सुझाव को अपना सकती है, अगर कोई सुधार नहीं हो रहा तो आप अपने डॉक्टर को कॉल कर उनकी सहायता ले सकती हैं। इन सुझाव से आप गर्भावस्था के बाद के डिप्रेशन का इलाज कर सकती है।

कितनी बार डॉक्टर से करवायें जांच?

ज्यादातर नई मांएें सोचती हैं की समय के साथ डिप्रेशन दूर हो जाएगा लेकिन ऐसा कुछ नहीं होता, जब तक आपको ना पता हो कि कब आपको मेडिकल की सहायता से इलाज करना चाहिए। इलाज न करवाने से समस्या गंभीर हो सकती है। अगर आपके डिप्रेशन के लक्षण 2 हफ्तों से ज्यादा तक है तो आपको समय व्यर्थ किये बिना डॉक्टर के पास जाना चाहिए। अगर नई मां किसी भी प्रकार से अपने जीवन को संभाल नहीं पा रही है, अपनी रोज़मर्रा की जिंदगी की देखभाल नहीं कर पा रही है, तो उसका जल्द से जल्द मेडिकल सहायता द्वारा इलाज करवाया जाए। ज्यादा डरना, घबराना, चिंतित हो उठाना और मरने के बारे में सोचना या बच्चे को नुक्सान पहुंचाना, ये सब लक्षण देखते ही उन्हें तुरंत डॉक्टर के पास ले जायें।

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कम लेबर पेन, डिप्रेशन की संभावनाएं भी कम

आमतौर पर डिलीवरी के दौरान महिलाओं को खूब लेबर पेन होता है। लेकिन इस लेबर पेन को कम कर दिया जाए तो महिलाएं पोस्ट डिलीवरी होने वाले डिप्रेशन से बच सकती हैं। ये हम नहीं कह रहे बल्कि एक रिसर्च में बात सामने आई है। रिसर्च के मुताबिक, डिलीवरी के दौरान एपीड्यूरल एनेस्थीसिया के जरिए यदि लेबर पेन को कम कर दिया जाए तो महिलाएं डिप्रेशन से बच सकती हैं। एपीड्यूरल एनेस्थीसिया एक लोकल एनेस्थीसिया है, जो शरीर के किसी खास हिस्से में दर्द को रोक देता है। एपीड्यूरल का मकसद दर्द को रोकना है, जबकि एनेस्थीसिया बेहोशी लाती है।

अमेरिका के पेंसिलवेनिया में पिट्सबर्ग यूनिवर्सिटी के प्रमुख शोधकर्ता ग्रेस लिम का कहना है, लेबर पेन जन्म देने के एक्सपीरिएंस से कहीं ज्यादा मायने रखता है। कुछ महिलाओं में यह मानसिक रूप से हानिकारक हो सकता है और उनमें डिप्रेशन की प्रॉब्लम भी खड़ी कर सकता हैं। एक शोध के दौरान शोधकर्ताओं ने 201 महिलाओं की मेडिकल हिस्ट्री पर स्टडी की। जिन्होंने डिलीवरी के दौरान एपीड्यूरल एनलजेसिया का इस्तेमाल किया और डिलीवरी के दौरान उनके दर्द का आंकलन किया गया। यह शोध हाल ही में शिकागो में हुए एनेस्थिसियोलॉजी 2016 में प्रस्तुत किया गया था।

ऐसे रखें डिलीवरी के बाद मां का ख्याल

प्रसव के बाद की देखभाल में पर्याप्त रूप से नींद ले
डिलीवरी के बाद भी मां का शरीर सुधार की अवस्था में रहता है और केवल बच्चे को ही नहीं बल्कि मां को भी पर्याप्त रूप से नींद की आवश्यकता होती है। सही से सोने से और आराम से, मां का स्वास्थय सुधरता है और साथ ही इस से डिप्रेशन के लक्षण जैसे चिड़चिडाहट, मूड स्विंग्स, दुःख और अन्य का इलाज हो सकता है।

पोस्टपार्टम डिप्रेशन का इलाज के लिए व्यायाम करें
सभी प्रकार का व्यायाम मां के लिए सही नहीं हैं, जिसने कुछ दिनों पहले ही बच्चे को जन्म दिया हो लेकिन कुछ व्यायाम जैसे फ्रीहैण्ड एक्सरसाईस और बिना अपने आप को थकावट महसूस कराए धीरे से दौड़ना या चलना का उपयोग कर सकते हैं। व्यायाम से ब्रेन में सेरोटोनिन बनता है। सेरोटोनिन मूड को बेहतर बनाता है।

योगा की मदद से इस डिप्रेशन से निजात
मेडिटेशन, प्राणायाम और ब्रीदिंग एक्सरसाइज से डिप्रेशन को कम करने में काफी मदद कर सकते हैं। इनमें उज्जयी ब्रीथ, फुल योगिक ब्रीथ, भ्रामरी प्राणायाम, योग निद्रा, नाड़ी शोधन प्राणायाम शामिल हैं। ये तेजी से और बेहतर ढंग से बॉडी को रिकवर करने में सहायता करता है।

अपने आहार पर ध्यान दें
आप क्या खाते है, आप वैसा ही महसूस करते है। इसलिए इस दौरान अपने आहार पर ध्यान दे। ज्यादा हरी सब्जियां, ताज़े फल और अनाज को अपने आहार में मिलाये और अपने मूड को बेहतर बनायें। इन खानों में विटामिन्स और मिनरल भरे पड़े है जिससे ब्रेन में मौजूद सेरोटोनिन को बढ़ाया जा सकता है। ओमेगा 3 फैटी एसिड भी मूड को बेहतर बनाने के लिए माना जाता है इसलिए अच्छा होगा कि आप अपने आहार में फैटी फिश, नट्स और बीज का उपयोग करें और अपने आप को डिप्रेशन के दौर से बहार निकालें। इस दौरान शराब और कैफीन को अपने आप से दूर रखें क्योंकि इन से आपका मूड खराब हो सकता है और आप डिप्रेशन की ओर जा सकते है और ये भी ध्यान रखें की आपके रोजाना के आहार में नियमित रूप से प्रोटीन हो, क्योंकि कम प्रोटीन डिप्रेशन को बढ़ा सकता है।

अपने रिश्तों को समय दें
घर में नया सदस्य आने से आपके जीवन की नई राह शुरू होती है और इस दौरान आवश्यक है कि आप अपने पार्टनर के साथ रिश्ते को महत्व दे न कि उन्हें टालें। अपने साथ ऐसे व्यक्ति का होना जिसके साथ आप जिमेदारियों को बांट सकें और जो आपकी समस्या को समझ सके, इससे आप डिप्रेशन के दौर से आसानी से निकल सकती हैं। इसलिए बेहतर होगा की अपने पार्टनर, परिवार और दोस्तों को समय दें जिससे आप डिलीवरी के बाद उत्पन्न हुए डिप्रेशन का इलाज कर सकें।

-प्रज्ञा श्रीवास्तव

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