क्या वर्तमान समय फूडटेक स्टार्टअप्स के लिये अच्छे दिनों की समाप्ति का समय है?

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डाज़ो और स्पूनजाॅय जैसे फूडटेक स्टार्टअप के अपना संचालन बंद करने और फूडपांडा और टाईनीआउल के साथ संचालन को लेकर चल रही दिक्कतों के बारे में आ रही सूचनाओं को सुनने पर लगता है कि यह क्षेत्र अब संकट के दौर से दूर नहीं है। इसके अलावा इस 50 बिलियन डाॅलर के क्षेत्र में हो रहे निवेश में भी भारी कमी देखने को मिली है। कुल मिलाकर यह कहना अतिश्योक्ति नहीं होगा कि यह क्षेत्र फिलहाल बेहद बुरे दौर से गुजर रहा है।

निवेश में गिरावट

अगर आप सिर्फ अप्रैल के महीने में ही इस क्षेत्र में हुए निवेश पर नजर डालें तो कुल मिलाकर 7 सौदों में 74 मिलियन अमरीकी डाॅलर की एक भरी-भरकम राशि का निवेश हुआ है। यह रकम अगस्त के महीने में घटकर सिर्फ 19 मिलियन डाॅलर पर आकर सिमट गई। सितंबर का महीना आते-आते यह संख्या घटकर कुल दो सौदों पर आकर टिक गई।

कई प्रतिद्वंदी लेकिन चुनिंदा परिणाम

ई-काॅमर्स और हाइपरलोकल की ही तर्ज पर फूडटेक का क्षेत्र भी कई मी-टू स्टार्टअप्स में निवेश के लिये तैयार बैठे निवेशक और वीसी का साक्षी रहा है जो व्यापार के बुनियादी मूल सिद्धांतो को पीछे छोड़कर सिर्फ विस्तार और विकास पर ध्यान दे रहे हैं। और निवेशकों का यह उत्साह मुख्यतः फोमो (फियर आॅफ मिसिंग आउट यानि कहीं मैं पीछे न रह जाऊँ) से प्रेरित था। ग्रोएक्स वेंचर्स के प्रबंध निदेशक आशीष तनेजा कहते हैं कि हर कोई आने वाली सबसे बड़ी और लोकप्रिय वस्तु का एक हिस्सा होना चाहता है।

याॅरस्टोरी के सूत्रों का मानना है कि अधिकतर निवेशकों को लगा कि यह क्षेत्र आने वाले समय में बहुत फायदेमंद साबित होगा और कई फंडों ने इस क्षेत्र के समानांतर दांव खेलना प्रारंभ कर दिया। इसका सीधा सा निष्कर्ष यह निकला कि एक बहुत छोटे से ही अंतराल में कई कंपनियों ने निवेश पाना प्रारंभ कर दिया। इसका एक और मतलब यह निकलता है इसके परिणामस्वरूप आने वाले समय में सामने आने वाली कंपनियों में निवेश के लिये अधिक धन बचा ही नहीं। इंडियाक्योशंट के संस्थापक आनंद लूनिया कहते हैं, ‘‘अगर आप इसपर बारीक नजर डालें तो आज की तारीख तक प्रत्येक वीसी ने इस क्षेत्र में किसी न किसी प्रकार का निवेश कर रखा है। और इनमें से कईयों के लिये परिणाम उनकी आशा के अनुरूप नहीं रहे हैं।’’

इसके अलावा एक और महत्वपूर्ण तथ्य यह है कि भारतीय पारिस्थितिकीतंत्र के दो सबसे बड़े निवेशकों, टाइगर ग्लोबल और साॅफ्टबैंक ने किसी भी फूडटेक स्टार्टअप पर दांव नहीं लगाया क्योंकि वे इस क्षेत्र के इकाई अर्थशास्त्र को लेकर खुद ही संशय की स्थिति में हैं।

उपभोक्ता का बदलता हुआ व्यवहार

आखिरकार इस गिरावट के पीछे का कारण क्या है? निवेशकों का मानना है कि यह एक प्राकृतिक कार्यविधि है और इससे इस पारिस्थितिकीतंत्र में संतुलन बनाए रखने में मदद मिलेगी। व्यवसाय प्रारंभ करने वाले कुछ हजार स्टार्टअप्स में से वास्तव में सिर्फ गिनती के ही कुछ इस दौर से पार पा सकते हैं।

सीडफंड वेंचर पार्टनर और निवेष/संरक्षण के विशेषज्ञ संजय आनंदराम का कहना है कि प्रौद्योगिकी आधारित अधिकतर खाद्य व्यापार सचालन प्रधान प्रकृति के हैं। वे कहते हैं, ‘‘मुख्यतः एप्प आधारित इस खाद्य कारोबार को प्रारंभ में तो किसी भी शहर के कुछ चुनिंदा इलाकों में तो तवज्जो मिल सकती है लेकिन आप पूरे देश के सभी हिस्सों से ऐसी उम्मीद नहीं कर सकते।’’

वे जोर देते हुए यह भी कहते हैं कि जरूरी नहीं है कि जो चीज एक स्थान पर सफल हो वही दूसरे स्थानों पर भी लोगों को पसंद आए। अधिकतर स्टार्टअप आबादी के छोटे से हिस्से को ध्यान में रखकर सचालन प्रारंभ करते हैं और पूरा देश कभी भी इनकी नजरों में नहीं होता है। संजय बताते हैं, ‘‘व्यवहार में एक सुसंगत और उसे आदत में बदलने में कम से कम दस वर्ष या फिर एक पूरी पीढ़ी का समय लगता है।’’

इसका सीधा सा मतलब है कि कंपनी खुद को बनाए रखे और उसके पास ऐसे निवेशक हों जो जल्द ही पीछे न हटें। नाॅरवेस्ट वेंचर पार्टनर्स के समीर जुनेजा का मानना है कि जबतक आप उपभोक्ता के सामने आने वाली समस्याओं का समाधान पेश नहीं करेंगे वे आपके उत्पाद में दिलचस्पी नहीं दिखाएंगे। वे कहते हैं, ‘‘चाहे आप कितने ही डिकाउंट कूपन और बाजार पर कब्जा करने की रणनीतियां आजमा लें, उपभोक्ता आपकी ओर आकर्षित नहीं होगा।’’

स्थिरता की कसौटी पर इम्तिहान

कई विशेषज्ञों का मानना है कि भारी-भरकम निवेश के चलते कई स्टार्टअप भारी छूट और कूपनिंग के दौर में चले गए। फूडटेक के क्षेत्र में उपभोक्ता को अपनी ओर खींचना एक बहुत महंगा सौदा है। सूत्रों का तो सहां तक दावा है कि फूडपांडा जैसा लोकप्रिय मंच तक इकलौते उपभोक्ता को अपनी ओर आकर्षित करने के लिये 400 से 500 रुपये तक खर्च करता है। सूत्रों का यह भी दावा है कि स्विगी भी करीब इतनी ही रकम खर्च करता है। हालांकि कईयों का मानना है कि इन दोनों की तुलना इस कसौटी पर करना पूर्णतः अनुचित है। सुमेर का कहना है कि औरों के मुकाबले स्विगी हमेशा से ही एक मजबूत माॅडल लेकर आगे चला है। स्विगी का कहना है कि वे एक इकलौते उपभोक्ता को आकर्षित करने के क्रम में ऊपर बताई गई रकम खर्च करने में बिल्कुल भी यकीन नहीं करते हैं।

स्विगी के सहसंस्थापक नंदन कहते हैं, ‘‘हम कभी भी भारी छूट वाले माॅडल पर विश्वास नहीं करते। हम ऊपर उल्लेख की गई संख्या या रकम से बिल्कुल भी सहमत नहीं हैं और हम यह सुनिश्चित करने का प्रयास करते हैं कि अधिक से अधिक उपभोेक्ता लौटकर दोबारा हमारे पास आएं और ऐसा भारी छूट का माॅडल अपनाकर कभी भी नहीं किया जा सकता।’’

कई लोगों का दावा है कि स्विगी और रोडरनर जैसे रेस्टोरेंट आधारित लाॅजिस्टिक्स स्टार्टअप ने बहुत अधिक पूंजी का निवेश पाते हुए दूसरे स्टार्टअप्स के विकास को रोकने का काम किया जो इनके चलते निवेश के अगले राउंड पाने से महरूम रह गए। कुछ विशेषज्ञों का यह भी मानना है कि फूडटेक के क्षेत्र में उल्लिखित निवेशकों की उदासीनता के चलते यह क्षेत्र जल्द समेकित होने में सफल रहा। हालांकि आशीष का कहना है कि ऐसा सिर्फ प्रारंभिक चरण के निवेश के चलते हुआ। यह सिर्फ जोखित उठाने को लेकर है और आगे के चरण कई अन्य कारकों पर निर्भर करते हैं।

कईयों का यह भी मानना है कि खाद्य का क्षेत्र आसानी से लोगों को अपनी ओर आकर्षित करता है और प्रतिदिन 300 आॅर्डरों के आंकड़े के छूना बच्चों का खेल है। असल मुसीबत तब शुरू होती है जब यह संख्या बढ़कर 300 के पार चली जाती है। आनंद का कहना है कि प्रारंभिक निवेशक सिर्फ इन पहले 300 आॅर्डरों तक काम आते हैं और इसके बाद जैसे-जैसे आॅर्डरों की संख्या बढ़ती है शेष निवेश स्थिरता और निरंतरता के बल पर मिलता है।

सुमेर कहते हैं, ‘‘एक तरफ जहां विकास और बाजार का नेतृत्व महत्वपूर्ण है वहीं दूसरी तरफ इसका अर्थशास्त्र और मितव्ययता के साथ सामंजस्य सुनिश्चित करना भी बहुत महत्वपूर्ण है।’’

संचालन करना सीखना

संचालन-प्रधान व्यापार होने के चलते फूडटेक के क्षेत्र में आगे बढ़ने का सपना देखने वाले युवा उद्यमियों कोे निरंतर सीखने के कई दौरों से गुजरना पड़ता है। संजय आगे कहते हैं कि इस प्रकार के भारी संचालन में पारंगत होने के लिये अनुभव सबसे महत्वपूर्ण कड़ी है। वे फ्लिपकार्ट का उदाहरण सामने रखते हुए समझााते हैं कि इन्होंने अपनी मैनेजमेंट टीम में कई बार पुराने लोगों को दोहराया क्योंकि इन्हें आगे बढ़ने के लिये अनुभव की आवश्यकता थी।

आशीष कहते हैं, ‘‘अबतक ये सभी संस्थान सिर्फ विकास, उपभोक्ता के अधिग्रहण, बढ़ते हुए आॅर्डरों और दोहराव पर ही अपना ध्यान केंद्रित कर रही थीं और कोई भी लाभप्रदता, विस्तार और स्थिरता के बारे में बात नहीं कर रहा था। यह इसी चक्र के दौरान होता है कि अधिकतर व्यवसाई व्यवसाय का प्रबंधन करने और उसे बनाए रखने में पारंगत होते हैं।’’

इसके अलावा लगातार समय का प्रबंधन इस क्षेत्र में सफलता की एक और कुंजी है। आपको यह सुनिश्चित करना होगा कि आपके द्वारा परोसा जा रखा खाना अच्छी गुणवत्ता का हो और इसका बिल्कुल सही समय पर सही तापमान में सर्व किया जाना बेहद जरूरी है। और ऐसा करना बिल्कुल भी आसान काम नहीं है। आनंद के अनुसार संचालन के बोझ के तले दबे इस क्षेत्र में कोई भी व्यक्ति जो खाने के प्रति जनूनी नहीं है वह इसमें सामने आने वाली विभिन्न चुनौतियों का सामना ही नहीं कर पाएगा।

डाॅरविन के सिद्धांत का पालन करना

अगर आप उभरते हुए क्षेत्रों और स्थानों पर एक नजर डालें तो सिर्फ चुनिंदा स्टार्टअप ही बचे रहेंगे। और विशेषज्ञों का मानना है कि बिल्कुल ऐसा ही होना चाहिये। आशीष का मानना है कि अब अधिकतर लोगो ने अपना स्थान ग्रहण कर लिया है और अब परीक्षा का समय है। सुमेर का मानना है कि विस्तार के क्रम में आगे बढ़ने के लिये व्यापार के सभी पहलुओं का मूल रूप से एकीकृत होना सबसे अधिक महत्वपूर्ण है। अब जब निवेश का दौर समाप्त होता जा रहा है कितने इस दौर से आगे जाने मेें सफल होंगे यह तो आने वाला वक्त ही बताएगा।

Worked with Media barons like TEHELKA, TIMES NOW & NDTV. Presently working as freelance writer, translator, voice over artist. Writing is my passion.

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