एक साधारण छात्र का असाधारण कारनामा

हमारे एक साथी प्रोफेसर ने हमसे कहा की हमारा यह उद्यम एकदम अस्थायी होगा. बेहतर होगा आप कोई आईटी की नौकरी ढूढ़ लो.

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एम सी जयकांत एक औसत से भी कम के विद्यर्थी थे और प्रायः सभी विषयों में अनुतीर्ण हो जाया करते थे. फिर किसी प्रकार से उन्हें बोर्ड परीक्षाओं में अच्छे अंक प्राप्त हुए और वो एक निजी इंजीनियरिंग कॉलेज में दाखिला पाने में सफल रहे.अपनी पढाई के तीसरे साल में जब छात्रों से यह अपेक्षा की जाती है कि वो डिजायन और फैब्रिकेसन की परियोजनाओं पर काम करेंगें, "मैं हमेशा कुछ अलग करना चाहता था. और तभी मैं ने अपनी पहली डिजायन और फैब्रीकेशन परियोजना के तहत पंखविहीन विंड टर्बाइन की अवधारणा प्रस्तुत की." जयकांत बताते हैं. और कुछ ही दिनों बाद अपने एक मित्र एस हरीश के साथ उन्होंने कॉलेज के सभा कक्ष में होने वाले एक प्रस्तुतिकरण को देखा."हम अंदर गए और वक़्त गुजारने के ख्याल से उस वातानुकूलित कक्ष की सबसे आखिरी कतार में बैठ गए. उसी दौरान हमारे विभाग के एक कर्मचारी ने हमें वहां बैठे हुए पकड़ लिया. उसे समझाने की कोशिश करते हुए हमने उस से यूँ ही पूछ लिया कि क्या हम भी अपनी परियोजना यहाँ प्रस्तुत कर सकते हैं. यह सोच कर कि शायद वो हमें गंभीरता से नहीं ले और जाने दे. लेकिन वो व्यक्ति 10 मिनट बाद वापस आया और हमें मंच पर प्रस्तुतिकरण के लिए कहा." वो कहते हैं. बहुत हिम्मत जुटा कर मै मंच पर गया, 5 मिनट में अपना प्रस्तुतीकरण पूरा किया और वहां से भाग लिया.

एक सप्ताह के बाद उन्हें पता चला कि उनके प्रदर्शन को सबसे ज्यादा अंक और पूरी प्रतियोगिता में प्रथम स्थान प्राप्त हुआ है." जीवन में मुझे पहली जीत मिली थी. इस ख़ुशी के मानस से उबरने और सामान्य होने में मुझे लगभग एक सप्ताह लगा. इस से मुझे सिर्फ इतना एहसास हुआ कि यह मेरे जीवन में एक नए अध्याय की शुरुआत है." जयकांत कहते हैं. इस घटना ने जयकांत को आत्म-परीक्षण करने का रास्ता दिखा दिया और उन्होंने विभिन्न कॉलेजों द्वारा आयोजित इस प्रकार की सभी प्रतियोगिता में हिस्सा लिया. गोवा से वापस आते हुए अपनी एक यात्रा के दौरान जयकांत के मन में भविष्य को लेकर कई विचार आने लगे. और चेन्नई पहुंच कर उन्होंने अपने विचारों को कागज पर उतारना प्रारम्भ कर दिया. "और फिर मैंने अपनी दो परियोजनाओं के पेटेंट के लिए आवेदन किया. इस से लोगो का मेरे प्रति नजरिया ही बदल गया. उन दो पेटेंट्स ने मेरा जीवन ही बदल दिया." जयकांत उद्घाटित करते हैं.

पेटेंट प्राप्त करने के बाद जयकांत ने विचार करना शुरू किया कि-अन्य विद्यार्थी अपने आप को सीमित क्यों रखते हैं और कुछ अभिनव क्यों नहीं सोचते हैं? और कारणों का विश्लेषण करते हुए उन्हें यह एहसास हुआ कि इस का मूल कारण विद्यालय हैं. सभी विद्यालयों में हमें केवल पढ़ना सिखाया जाता है ना कि सीखना और कार्यान्वित करना.परीक्षाओं तथा अन्य दबावों के कारण हम सीखना भूल जाते हैं और परीक्षाओं और अंकों के लिए केवल पढाई करते हैं. जिस से की हम सीखने का आनंद ही नहीं उठा पाते.

इस सोच ने जयकांत को युवा पीढ़ी के लिए कुछ करने के लिए प्रेरित किया और उन्होंने निर्णय लिया कि वो युवाओं को सिद्धान्त रूप से सीखी गयी चींजो का प्रत्यक्ष अनुभव कराएँगे.

"मैंने अपना यह विचार अपने कुछ मित्रों को बताया और वो इसमें शामिल होने के लिए सहर्ष तैयार हो गए." जयकांत बताते हैं. आगे चल कर हरीश के साथ उन्होंने 15 सितम्बर 2013 को इंजीनयर दिवस के अवसर पर "Infinite Engineers" की शुरुआत की. "Infinite Engineers" व्यावहारिक विज्ञान की जानकारियों को रूट स्तर पर अनुभव आधारित सीख के तहत छात्रों को देता है जिस से की उन्हें अपना नवाचार और रचनात्मक कौशल बढाने में मदद मिलती है. यह विद्यर्थियों को विद्युत, इलेक्ट्रॉनिक्स, रोबोटिक्स, मेकेनिकल, ऐरो मॉडलिंग, कंप्यूटर साइंस और जैव प्रौधौगिकी के क्षेत्र में प्रशिक्षित करता है.

जयकांत और हरीश के अतिरिक्त एस जयविघ्नेश, ए किशोर बालगुरु और एन अमरीश "Infinite Engineers" के सह-संस्थापक हैं. वर्तमान में कई प्रशिक्षण केंद्र स्कूली छात्रों को रोबोटिक्स और ऐरो मॉडलिंग का प्रशिक्षण दे रहे हैं. " लेकिन हमारा उद्देश्य विद्यालयी पाठ्यक्रम में अग्रणी रूप से व्यवहारिक प्रशिक्षण को समाहित कराना है जिस से उनकी शिक्षा सम्पूर्ण हो सके. शिक्षा किताबों और श्यामपट के रूप में मात्र द्विआयामी बन कर ना रह जाए बल्कि शिक्षा को अनुभव किया जाना चाहिए." जयकांत बताते है.

अभी तक कंपनी ने चेन्नई में 70-80 स्कूलों को दौरा किया है. इन में से २ स्कूलों में "Infinite Engineers" ने अपना प्रशिक्षण प्रारम्भ कर दिया है. जल्द ही ये अपना "प्रयुक्त विज्ञान अनुसन्धान संस्थान" शुरू करने वाले हैं जहाँ किसी भी स्कूल के विद्यार्थी इस प्रकार का प्रशिक्षण ले सकते है. और उपलब्ध संसाधनो के माध्यम से अपनी अवधारणाओं को व्यवहार में लाने का प्रयास भी कर सकते है जो की उन्हें अभिनव और रचनात्मक बनाने में सहायक होगा.

कोई भी नकारत्मक प्रतिक्रिया आप के जूनून को और मजबूत करती है. "हम नकारात्मक टिप्पणियों से प्रेरणा लेते हैं. हमारे एक साथी प्रोफेसर ने हमसे कहा की हमारा यह उद्यम एकदम अस्थायी होगा.बेहतर होगा आप कोई आईटी की नौकरी ढूढ़ लो.इन शब्दों ने हमें अपने लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए और मजबूत बनाया. तो हमारी सफलता का कुछ श्रेय उन प्रोफेसर महोदय को भी मिलना ही चाहिए. कुछ ने तो मुझसे सवाल भी किया की मेरे पास पढ़ाने के लिए क्या योग्यता है? लेकिन शायद उन्हें नहीं पता की अाखिरी बेंच पर बैठने वाला विद्यर्थी ही बेहतर जानता है कि विद्यार्थीयों को बिना सुलाये कैसे पढ़ाया जाता है." जयकांत हँसते हुए कहते है. विज्ञान को आसान और व्यावहारिक बनाने का उनका यह प्रयास बहुत से "बैक बेन्चर्स" की तकदीर बदल सकता है.