80 साल पहले नाडिया ने हिन्दी सिनेमा में वो किया, जो आज भी करना असंभव है

नाडिया न होतीं तो अमिताभ बच्चन भी न होते। शायद सलीम-जावेद की प्रेरणा में नाडिया का भी स्थान हो। लेकिन नाडिया ने अमिताभ बच्चन के उलट सड़क पर फैसला करने में अंततः क़ानून का ही सहारा लिया। उसने किसी की हत्या नहीं की।

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अगर आप सोचते हैं बॉलीवुड में हमेशा से ही नायक प्रधान फिल्मों का बोलबाला रहा है, तो आप गलत सोचते हैं। इंडियन फिल्म इंडस्ट्री में पहला एक्शन स्टार कोई हीरो नहीं, बल्कि एक हीरोइन थी। ऐसा देखा गया है कि हमारी बॉलीवुड फिल्मों में एंग्री होना सिर्फ यंग मैन के हिस्से आता था। व्यवस्था और समाज सुधारने के लिए एंग्रीयंग मैन के पदार्पण से करीब 40 साल पहले ही किसी ने सिर्फ हंटर लेकर असामाजिक तत्वों को तत्काल सजा देना शुरू कर दिया था। यह हंटर भी किसी हंटरवाले के पास नहीं, बल्कि हंटरवाली के पास था और ये हंटरवाली थीं मैरी एन एवांस, जिन्हें सारी दुनिया निडर नाडिया के नाम से जानती है।

मैरी एन एवांस 'निडर नाडिया' के रोल में। फोटो साभार: HT
मैरी एन एवांस 'निडर नाडिया' के रोल में। फोटो साभार: HT
30 के दशक में फियरलेस नाडिया ऐसी एक्शन स्टार के तौर पर उभरीं जिसके एक्शन को देखकर दर्शक दांतों तले उंगलियां दबा लिया करते थे। नाडिया स्टारर हंटरवाली में उनकी घुड़सवारी, तलवारबाजी के स्टंट एक्शन उस दौर मेें ऐसे हिट हुए कि नाडिया के साथ 'फियरलेस' का टैग जुड़ गया।

"आज के दौर में जब एक्ट्रेसेज़ अपने स्टंट सींस देती हैं, तो उन्हें तमाम तरह की सिक्योरिटी फैसेलिटीज अवेलेबल हैं, लेकिन उस दौर में जब ऐसी कोई व्यवस्था नहीं थी तो भी फियरलेस नाडिया ने कई हैरतअंगेज स्टंट दिये और 27 साल तक हिंदी सिनेमा पर राज किया।"

ऐसे शॉट्स जिन्हें करने में स्टंटमैन को भी पसीना आ जाए, उसे मैरी आराम से कर गुजरती थीं। ट्रेन पर फाइट सींस, एक ट्रेन से दूसरी ट्रेन पर जम्प करना और हॉर्स चेंज जैसे कई खतरनाक स्टंट उन्होंने कर के दिखाए। करीब 30 साल के अपने कैरियर में मैरी ने 50 से ज्यादा फिल्में कीं, लेकिन उनकी ज्यादातर फिल्मों के पोस्टर्स में से हीरो की फोटो और नाम गायब होते थे। नाडिया (मैरी) के नाम के साथ हंटर वाली का टैग ऐसा लगा, कि हर निर्माता अपनी फिल्मों में नाडिया के हंटर से गुंडों की पिटाई का सीन जरूर रखता। हंटरवाली एक कल्ट फिल्म बन गई थी। हर जुबान पर बस नाडिया का ही नाम था। इस फिल्म के बाद नाडिया को स्टंट फिल्मों के ऑफर मिलने लग गए और इस तरह शुरूआत हुई फिल्मों में हिरोइन के एक्शन क्वीन बनने की। आज के दौर में जब कई एक्ट्रेसेज अपने स्टंट सींस करने को तैयार रहती हैं, उनको तमाम तरह की सुरक्षा और सुविधाएं मुहैया करवाई जाती हैं, लेकिन उस दौर में जब ऐसी कोई व्यवस्था नहीं थी फियरलेस नाडिया ने कई हैरतअंगेज स्टंट दिये और 27 साल तक हिंदी सिनेमा पर राज किया।

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हंटरवाली का प्रादुर्भाव

नाडिया की फिल्मों को वाडिया बंधु बनाते थे। सच्चे अर्थों में नाडिया एक विश्व नागरिक थीं। 9 जनवरी, 1910 को पर्थ, आस्ट्रेलिया में जन्मी नाडिया का पूरा नाम मैरी इवांस था। पिता एक हरबर्ट इवान्स वेल्स ब्रिटिश सेना के मुलाजिम थे। ग्रीक मूल की मां मार्गरेट सरकस में कलाकार रह चुकी थीं। पिता का तबादला होने पर वह भी पांच साल की उम्र में भारत आ गईं। एक अमेरिकी ज्योतिषी के कहने पर उसका नाम नाडिया रख लिया गया था। उनके पिता जब इंग्लैंड वापस गए तब उसकी मां उसे लेकर भारत में ही रह गईं।

मैरी जब बड़ी हुईं तो मां के काम में हाथ बंटाने के लिए नौसेना के एक स्टोर में सेल्स गर्ल बन गईं। इसी दौरान रूसी बैले नर्तकी अस्त्रोवा से मुलाकात हुई और वह उससे बैले सीखने लगीं। कुछ दिन तक एक रूसी सर्कस में भी अपनी कला का प्रदर्शन किया। बाद में बैले के प्रदर्शन भी करने लगीं। देश भर में घूमकर उसने शो किए और ऐसे ही एक शो में वाडिया मूवीटोन के होमी वाडिया की नजर उस पर पड़ गई।

वाडिया ने लाहौर में अपने किसी परिचित के माध्यम से नाडिया (मैरी) के सामने फिल्मों में काम करने का प्रस्ताव भेजा और सहमति मिलने पर स्क्रीन टेस्ट के लिए मुम्बई बुला लिया। सन् 1934 में नाडिया को दो फिल्मों में काम करने का मौका मिला। एक फिल्म थी ‘देश दीपक’ और दूसरी ‘नूर-ए-यमन’। नीली आंखों वाली इस गोरी हीरोइन को लोगों ने खूब पसंद किया। लेकिन स्टार का दर्जा उसे मिला फिल्म ‘हंटरवाली’ से। उत्तर-पश्चिमी सीमांत प्रांत में रहने के दिनों में नाडिया ने घुड़सवारी भी सीख ली थी। बैले नर्तकी होने के कारण शरीर में लोच तो था ही। इन सब के मिश्रण से उसके स्टंट बेजोड़ बन गए थे। उसके बाद नाडिया ने पीछे मुड़कर नहीं देखा। हंटरवाली की सफलता से उत्साहित होकर सन् 1943 में होमी वाडिया ने इसका सीक्वल ‘हंटरवाली की बेटी’ बनाया। इसके बाद तो उसकी हिट फिल्मों की कतार लग गई। ‘टाइग्रेस’, ‘स्टंट क्वीन’, ‘मिस फ्रंटियर मेल’, ‘डायमंड क्वीन’, ‘जंगल प्रिंसेस’, ‘बगदाद का जादू’, ‘खिलाड़ी’ और ‘लेडी रॉबिन हुड’ ने उसे लोकप्रियता के सातवें आसमान पर पहुंचा दिया।

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फिल्म इतिहासकार मनमोहन चड्ढा नाडिया की इन फिल्मों के बारे में लिखते हैं, 'इन फिल्मों की खूबी यह थी कि नाडिया सभी स्टंट खुद करती थी। इन स्टंट दृश्यों में, चलती रेलगाड़ी की छत पर एक आदमी को कंधे पर लादकर खड़े होना, शेर के पिंजरे में जाकर उससे खेलना, ढलान पर लुढ़कते रेल के इकलौते डिब्बे पर खड़े होकर लड़ना आदि सब कुछ शामिल था। असली समस्या यह थी कि उस दौरान चेहरे पर वीरता का भाव बनाए रखना भी जरूरी था। नायिका के चेहरे पर उभरा हल्का-सा भय का भाव कुर्सी के कोने पर बैठे दर्शक का मोहभंग कर सकता था।'

ऐसे ही एक स्टंट दृश्य के बारे ‘सेवंटी इयर्स ऑफ इंडियन सिनेमा’ में खुद नाडिया ने एक इंटरव्यू में बताया था, 'बम्बई वाली नाम की एक फिल्म में मुझे एक बछड़ा उठाकर चलना था। आप कल्पना नहीं कर सकते, यह कितना कठिन काम था। बछड़ा बार-बार फिसल जाता था और उसके खुर मेरे शरीर में गड़ गए थे लेकिन यह भी जरूरी था कि चेहरे पर दर्द की परछाई तक न दिखे।'

मशहूर फिल्म निर्देशक श्याम बेनेगल ने ने एक बार कहा था कि 'नाडिया न होतीं तो अमिताभ बच्चन भी न होते। शायद सलीम-जावेद की प्रेरणा में नाडिया का भी स्थान हो। लेकिन नाडिया ने अमिताभ बच्चन के उलट सड़क पर फैसला करने में अंततः क़ानून का ही सहारा लिया। उसने किसी की हत्या नहीं की।'

नाडिया के पोते और मशहूर डांस डायरेक्टर शियामक डावर ने एक बार उन्हें याद करते हुए बताया था, कि कैसे कभी एंजेलिना जोली ने शाहरुख खान से कहा था कि 'नाडिया पर अगर कोई फिल्म बने तो वे उसमें मुख्य भूमिका निभाना चाहेंगी।'

-प्रज्ञा श्रीवास्तव

(कहानी में मैजूद फैक्ट्स लेखक ने विकिपिडिया से उठाये हैं)

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