पाकिस्तान की महिला अफसर जिसकी बहादुरी की पूरी दुनिया में हो रही है चर्चा

लेखक की बहादुर बेटी ने तीन आतंकियों को मार गिराया

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सक्रिय सामाजिक कार्यकर्ता एवं लेखक अजीज तालपुर को अपनी उस बहादुर पुलिस अफसर बेटी सुहाय अजीज पर नाज़ है, जिसने एक बड़े अटैक को नाकाम करते हुए तीन आतंकियों को मार गिराया। उनका परिवार तो सुहाय को चार्टर्ड अकाउंटेंट बनाना चाहता था, लेकिन वह सिंध की पहली महिला एएसपी बन गई।

सुहाय अजीज (फोटो साभार- फेसबुक)
सुहाय अजीज (फोटो साभार- फेसबुक)
जब वह पढ़ाई कर रही थीं, उनके रूढ़िवादी रिश्तेदारों तक ने उनके घर-परिवार से नाता तोड़ लिया था। वे पिछड़े खयालात के लोग हैं। लड़कियों की पढ़ाई-लिखाई उन्हे खराब बात लगती है। ऐसी स्थितियों में भी उन्होंने हार नहीं मानी। 

आतंकवादी जब पिछले दिनो कराची शहर के क्लिफ़टन इलाक़े में स्थित दाऊद के घर के बगल में चीनी वाणिज्य दूतावास के पास गोलियां और बम बरसा रहे थे, दो पुलिसकर्मियों की मौत भी हो गई लेकिन उनके सामने दीवार बनकर खड़ीं सहायक पुलिस अधीक्षक सुहाय अजीज ने दो घंटे तक चली इस मुठभेड़ में अपनी टीम का नेतृत्व करती हुई तीन आतंकियों को मार गिराया। सुहाय अजीज सिंध (पाकिस्तान) के जिला तांडो मोहम्मद खान के गांव भाई खान तालपुर निवासी सक्रिय सामाजिक कार्यकर्ता एवं लेखक अजीज तालपुर की बेटी हैं।

मध्यमवर्गीय परिवार में पली बढ़ीं सुहाय की 10वीं तक की पढ़ाई अपने गांव के ही फौजी फाउंडेशन हायर सेकंड्री स्कूल से हुई है। वहां से हैदराबाद के बहरिया फाउंडेशन कॉलेज से 12वीं करने के बाद उन्होंने जुबैदा गर्ल्स कॉलेज से बीकॉम किया। फिर जमशोरो में यूनिवर्सिटी ऑफ सिंध से मास्टर्स की डिग्री ली। इसके बाद हैदराबाद के अल हम्द अकैडमी चार्टर्ड अकाउंटेंसी में सर्टिफिकेट कोर्स किया। वर्ष 2013 में सिविल सेवा में सेंट्रल सुपीरियर सर्विसेज की परीक्षा पास करने के बाद वह पुलिसबल में तैनात हो गईं। इस समय पूरी दुनिया में सुहाय की बहादुरी की चर्चाएं हो रही हैं।

सुहाय कहती हैं कि उनके जीवन के साथ ही उनके सपनों में भी तमाम उतार-चढ़ाव आते रहे। कभी वह आर्किटेक्ट बनना चाहती थीं तो कभी न्यूरोसर्जन बनने के सपने देखती रहतीं, कभी पायलट बनकर आसमान चूमना चाहती थीं तो कभी महिला पुलिस अधिकारी। उनका आखिरी सपना हकीकत बन गया। वह एएसपी बन गईं। जब वह पढ़ाई कर रही थीं, उनके रूढ़िवादी रिश्तेदारों तक ने उनके घर-परिवार से नाता तोड़ लिया था। वे पिछड़े खयालात के लोग हैं। लड़कियों की पढ़ाई-लिखाई उन्हे खराब बात लगती है। ऐसी स्थितियों में भी उन्होंने हार नहीं मानी।

समाज के पिछड़े खयालात वाले कुछ भी सोचते रहें, उनकी आंखों में तो सिर्फ मंजिल के सपने थे तभी तो वह सेंट्रल सुपीरियर सर्विसेज की परीक्षा पास कर पुलिस अधिकारी बन गईं। इसके बाद तो कभी उनकी आलोचना करते रहे नाते-रिश्तेदार भी उनका सगा बनने के लिए आगे-पीछे चक्कर लगाने लगे। सुहाय कहती हैं कि जब बाकी अपने लोग उनका मनोबल तोड़ रहे थे, उनके माता-पिता उनका हौसलाफजाई करते रहे। वे नहीं चाहते थे कि बेटी किसी भी कीमत नाकामयाब साहित हो। इसलिए एक पुलिस अफसर के रूप में उनका ही नहीं, उनके माता-पिता का भी सपना पूरा हुआ है। उनके पिता लेखक हैं, इसलिए उन्होंने सुहाय को साहित्य पढ़ने के लिए भी प्रेरित किया।

सुहाय बताती हैं कि जब मेरे माता-पिता ने मेरा दाख़िला स्कूल में कराया था तो मेरे रिश्तेदारों ने मेरे परिवार को ताने मारे थे, जबकि वह आज लोअर सिंध की पहली महिला सहायक अधीक्षक बन गई हैं। ताना मारने वालों पर स्तंभकार आएशा सरवारी लिखती हैं कि जब तक सभी को किसी रक्षक की ज़रूरत न हो, वे कहते हैं कि महिलाओं की जगह रसोई में है। जब महिलाएं बहादुरी दिखा देती हैं तो वे उन्हे सलाम करने लगते हैं। अजीज बताते हैं कि वह सुहाई को निजी स्कूल में पढ़ाना चाहते थे। इस वजह से रिश्तेदारों ने उनसे संबंध खत्म कर लिए।

रिश्तेदारों का मानना था कि सुहाई को मदरसे में ही पढ़ाना चाहिए, लेकिन उन्होंने अपनी बेटी को अच्छी शिक्षा दिलाने की कसम खाई थी। पूरा परिवार चाहता था कि सुहाय चार्टर्ड अकाउंटेंट बनें, लेकिन सुहाय को वह नौकरी काफी नीरस लगती थी। इसके बाद उसने सीएसएस की तैयारी शुरू कर दी और पहली कोशिश में ही कामयाब भी हो गई। आज उनको और देश को अपनी बहादुर बेटी नाज़ है।

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पत्रकार/ लेखक/ साहित्यकार/ कवि/ विचारक/ स्वतंत्र पत्रकार हैं। हिन्दी पत्रकारिता में 35 सालों से सक्रीय हैं। हिन्दी के लीडिंग न्यूज़ पेपर 'अमर उजाला', 'दैनिक जागरण' और 'आज' में 35 वर्षों तक कार्यरत रहे हैं। अब तक हिन्दी की दस किताबें प्रकाशित हो चुकी हैं, जिनमें 6 मीडिया पर और 4 कविता संग्रह हैं।

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