सड़क पर जिंदगी की गाड़ी खींच रही महिला ट्रक ड्राइवर

हर फील्ड में महिलाओं का जज्बा कायम...

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जीवन के हर क्षेत्र में हाथ आजमातीं महिलाएं अब हाइवे पर फर्राटे से भारी-भरकम ट्रक दौड़ा रही हैं। देश की पहली महिला ट्रक चालक योगिता रघुवंशी, हिमाचल की पहली महिला ट्रक चालक नील कमल, कनाडा में ट्रक चला रहीं पहली पंजाबी महिला ट्रक चालक राजविंदर कौर ऐसी ही मिसाल 'वुमनिया' में शुमार हैं।

महिला ट्रक ड्राइवर नीलकमल और योगिता की कहानी
महिला ट्रक ड्राइवर नीलकमल और योगिता की कहानी
आज की महिलाएं और बच्चे भी कभी किसी पेशे को छोटा न समझें, जुनून से काम करें तो एक दिन उन्हे छोटी-बड़ी सफलता जरूर मिल सकती है। मुझे 'मुश्किल' की परिभाषा नहीं आती है। 

ट्रक चालकों की जिंदगी का कड़वा सच भला किसे पता नहीं होता है। न खाने का ठिकाना न सोने का, जब तक आंखों में रोशनी, तभी तक रोजी-रोजगार सलामत। आधी से अधिक जिंदगी सड़कों पर गुजर जाती है। ऐसे में किसी महिला ट्रक चालक की जिंदगी की दुश्वारियां कितनी दिक्कत तलब होती होंगी, सोचकर भी कयास लगाया जा सकता है लेकिन हमारे देश की कई एक ऐसी साहसी महिलाएं जिंदगी की जद्दोजहद से दो-दो हाथ करती हुई कोलकाता से कनाडा तक हाइवे पर फर्राटे भर रही हैं। ऐसी ही मिसाल 'वुमनिया' में शुमार हैं देश की पहली महिला ट्रक चालक योगिता रघुवंशी, हिमाचल की पहली महिला ट्रक चालक नील कमल, कनाडा में ट्रक चला रहीं पहली पंजाबी महिला ट्रक चालक राजविंदर कौर आदि।

सेवा से रिटायर्ड पिता विजय सिंह रघुवंशी और माता वंदना के घर 13 अगस्त 1970 में योगिता रघुवंशी का जन्म महाराष्ट्र के नंदुरबार में हुआ था। योगिता बचपन में एयर होस्टेस बनने के सपने देखा करती थीं लेकिन बी कॉम करने के बाद उनकी शादी भोपाल के वकील राजबहादुर रघुवंशी से हो गई। उन्होंने भी एलएलबी कर ली। बाद में एक बेटी और बेटा उनकी कोख में आ गए। दोनों की अंग्रेजी मीडियम स्कूल में पढ़ाई होने लगी। पति राजबहादुर की फरवरी 2003 में बस की टक्कर से मौत हो गई। योगिता कुछ वक्त तक सदमे में रहीं लेकिन उसके बाद अपने अरमानों को कुचलती हुईं उसी साल से वह दो माह में ड्राइविंग सीखकर ट्रक चलाने लगीं। कमाई होने लगी। बच्चों पढ़ाई थमी नहीं। ट्रक ड्राइवरी की रोजी से ही दोनो की उच्च शिक्षा पूरी हो गई। योगिता कहती हैं कि उनके जिंदगीनामा में कुछ भी अकल्पित सा नहीं है। वह जज्बे के साथ अपने काम को अंजाम देती हैं।

आज की महिलाएं और बच्चे भी कभी किसी पेशे को छोटा न समझें, जुनून से काम करें तो एक दिन उन्हे छोटी-बड़ी सफलता जरूर मिल सकती है। मुझे 'मुश्किल' की परिभाषा नहीं आती है। औरों की तरह ट्रक चलाना मेरा भी सिर्फ पेशा है। मेरा जीवन दूसरों जैसा ही है। मेरे सामने आने वाली मुश्किलें भी मेरे पेशे, मेरे जीवन का हिस्सा हैं। ट्रक चालकों को अपनी कमाई और अधिकारों की लड़ाई के साथ अपनी सेहत को भी प्राथमिकता देनी चाहिए। ट्रक चालक एक ओर कम मजदूरी की बात करते हैं, दूसरी तरफ रोजाना शराब के पाउच पर पैसे फूंकते हैं। इसी राशि को बचाकर वह अपना एक घर खरीद सकते हैं, अपने बच्चों को शिक्षा दिला सकते हैं। एक वक्त में पति की मौत के बाद उन्हे अपने जीवन में सब कुछ खत्म सा लगने लगा था लेकिन उनकी आंखों में बच्चों के सपने चमक उठे। फिर क्या था, उसके बाद वह उनका भविष्य संवारने की जिद कर बैठीं और ट्रक पहियों की तरह उनके घर-परिवार की जिंदगी पटरी पर लौट आई।

सोलन (हिमाचल) के गांव बागी की छत्तीस वर्षीय नील कमल अपने प्रदेश की पहली महिला ट्रक चालक मानी जाती हैं। वह अभी कुछ महीने पहले ही इस काम में जुटी हैं। वर्ष 2010 में उनके भी पति की एक सड़क दुर्घटना में मौत हो गई थी। उस समय उनके दो ट्रक थे। उनको संभालने वाला और कोई ऐसा अपना न था, जिस पर वह पूरी तरह भरोसा कर सकें। उनकी घर-गृहस्थी चलाने के लिए वे दो ट्रक ही एक मात्र जरिया थे। ट्रकों का काम संभालने का उन्होंने खुद बीड़ा उठा लिया। चालकों की कमी, उनकी व्यावहारिक दिक्कतों के कारण धीरे-दीरे उन्होंने खुद ट्रक चलाना सीख लिया। अब तो वह फर्राटे से ट्रक दौड़ा लेती हैं। अल्ट्राटैक सीमेंट कंपनी (बागा) से वह स्वयं हिमाचल के साथ-साथ बाहरी राज्यों में भी ट्रक लेकर जाती रहती हैं। ट्रकों की लोडिंग, अनलोडिंग का सारा काम भी खुद ही देखती हैं। अपने बारह वर्षीय बेटे निखिल की पढ़ाई-लिखाई का पूरा ध्यान रखने के साथ ही वह ट्रकों का भी काम अब पूरी तरह संभाल लेती हैं। उन्होंने अपने साथ कोई हेल्पर भी नहीं रखा है। सफर में रात के समय वह अपने ट्रक में ही सो जाती हैं।

कपूरथला (पंजाब) के गांव सिंधवां दोनां निवासी राजविंदर कौर कनाडा से अमरीका तक की सड़कों पर ट्रक दौड़ाती हैं। उन्होंने कपूरथला के हिंदू कन्या कालेज से ग्रेजुएशन किया है। वर्ष 1999 में उनके दो बेटे अभी शिक्षा ले रहे हैं। शादी के बाद वह वह अपने ससुरालियों के साथ वैंकुवर (कनाडा) चली गईं। वह बताती हैं कि कनाडा में एक दिन अचानक वहां की महिलाओं को ट्रक चलाते देख उनके के भी मन ट्रक चलाने का जोश जागा। उनके पति पहले से ही ट्रक चालक हैं। उनसे ही उन्होंने ट्रक चलाना सीख लिया। ये भी कैसी विडंबना है कि ट्रक चलाकर घर की गाड़ी खींचने वाली ऐसी महिलाओं के रास्ते में कई बार खुद अधिकार संपन्न स्त्रियां ही आड़े आ जाती हैं। हिमाचल के राज्यपाल ने अभी दो सप्ताह पहले पंजाब की जिस महिला टैंकर चालक जसवीर कौर को सम्मानित किया था, भरतपुर परिवहन निगम की निरीक्षक नीतू शर्मा ने गलत वसूली के मात्र पांच सौ रुपए न देने पर जसवीर के मुंह पर डंडा जड़ दिया, जिससे उनका चेहरा लहूलुहान हो गया। उस वक्त वह अपना खाली टैंकर लेकर कानपुर से कांडला तेल लेने जा रही थीं।

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पत्रकार/ लेखक/ साहित्यकार/ कवि/ विचारक/ स्वतंत्र पत्रकार हैं। हिन्दी पत्रकारिता में 35 सालों से सक्रीय हैं। हिन्दी के लीडिंग न्यूज़ पेपर 'अमर उजाला', 'दैनिक जागरण' और 'आज' में 35 वर्षों तक कार्यरत रहे हैं। अब तक हिन्दी की दस किताबें प्रकाशित हो चुकी हैं, जिनमें 6 मीडिया पर और 4 कविता संग्रह हैं।

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