क्यों है वैज्ञानिक अभियानों में भी लैंगिक असमानता?

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सिर्फ महिलाओं के नजरिए से ही नहीं, भारतीय विज्ञान के नजरिये से भी यह बेहद निराश करने वाली बात है कि शीर्ष वैज्ञानिक पद और लीडर के रूप में हमारे देश में महिलाएं प्राय: नगण्य हैं। विज्ञान के वर्तमान दौर में ई. के. जानकी, अमल असीमा चक्रवर्ती, अर्चना शर्मा, इंदिरा नाथ, कस्तुरी दत्ता, आशा कोल्टे आदि भारतीय महिला वैज्ञानिकों ने भी सराहनीय कार्य किया है। किंतु कुछ वर्षों से प्रशंसा न मिलने का एक पहलू यह भी है कि जिन क्षेत्रों में पुरुषों को बढ़त हासिल है, वहां महिलाओं की उपलब्धियों और योगदान को सामने लाने का प्रयास नहीं किया जाता है।

सांकेतिक तस्वीर, साभार: Shutterstock
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 मंगल मिशन में महिला वैज्ञानिक नजर नहीं आई या इसमें किसी महिला साइंटिस्ट या इंजीनियर का योगदान रहा भी है, तो उसे रेखांकित नहीं किया गया, जबकि विज्ञान क्षेत्र में महिलाओं की भागीदारी बढ़ाने के उद्देश्य से यह अपेक्षित था।

 साइंस और टेक्नोलाजी से जहां मनुष्य के जीवन स्तर में सुधार, सामरिक क्षमताओं में बढ़ोत्तरी और ऐसे अनुसंधानों और विकास गतिविधियों की उम्मीद की जाती है जो वैश्विक होड़ में प्रतिस्पर्धात्मक तकनीक को बढ़ावा देकर राष्ट्रीय अर्थव्यवस्था को मजबूत करें, तो वहीं यह अपेक्षा भी है कि वह सामाजिक गैर-बराबरी, खास तौर पर लैंगिक भेदभाव समाप्त करने में भी योगदान दें, जो कि अभी नहीं हो रहा है।

कुछ समय पहले जब भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (इसरो) ने मार्स ऑर्बिटर मिशन यानी मंगलयान का सफल प्रक्षेपण किया तो पूरी दुनिया ने भारत की उपलब्धि की सराहना की लेकिन इस पर शायद ही किसी ने गौर किया हो कि मंगल मिशन में महिला वैज्ञानिक नजर नहीं आई या इसमें किसी महिला साइंटिस्ट या इंजीनियर का योगदान रहा भी है, तो उसे रेखांकित नहीं किया गया, जबकि विज्ञान क्षेत्र में महिलाओं की भागीदारी बढ़ाने के उद्देश्य से यह अपेक्षित था। 

यह एक मौका था, जब इसरो किसी महिला साइंटिस्ट को मंगल अभियान के दस प्रमुख विज्ञानी दल में शामिल करके देश और समाज में एक स्वस्थ संकेत दे सकता था कि वैज्ञानिक संगठनों में महिलाओं को महत्वपूर्ण जिम्मेदारी दी जा रही है और उन्हें नेतृत्व करने का मौका दिया जा रहा है। इसके लिए इसरो मिसाइल वूमेन कही जाने वाली साइंटिस्ट टेसी थॉमस या किसी अन्य महिला वैज्ञानिक के नाम प्रस्ताव मंगल अभियान के लिए कर सकता था, पर वह अवसर गवां दिया गया। सिर्फ महिलाओं के नजरिए से ही नहीं, भारतीय विज्ञान के नजरिये से भी यह बेहद निराश करने वाली बात है कि शीर्ष वैज्ञानिक पद और लीडर के रूप में हमारे देश में महिलाएं प्राय: नगण्य हैं। विज्ञान के वर्तमान दौर में ई. के. जानकी, अमल असीमा चक्रवर्ती, अर्चना शर्मा, इंदिरा नाथ, कस्तुरी दत्ता, आशा कोल्टे आदि भारतीय महिला वैज्ञानिकों ने भी सराहनीय कार्य किया है। किंतु कुछ वर्षों से प्रशंसा न मिलने का एक पहलू यह भी है कि जिन क्षेत्रों में पुरुषों को बढ़त हासिल है, वहां महिलाओं की उपलब्धियों और योगदान को सामने लाने का प्रयास नहीं किया जाता है।

देश के वैज्ञानिक अभियानों-खास तौर से अंतरिक्ष कार्यक्रमों में महिलाओं की भागीदारी कितनी जरूरी है- यह भारत का पड़ोसी चीन शायद ज्यादा बेहतर समझता है। वहां के ज्यादातर अंतरिक्ष अभियानों में युवा महिला वैज्ञानिक शामिल हैं।

पिछले साल 16 जून को जब पहली चीनी महिला के रूप में 35 साल की लियु यांग ने अंतरिक्ष में कदम रखा, तो दुनिया भर के मीडिया ने इसका बढ़-चढ़ कर प्रसारण किया। यांग ने अंतरिक्ष में सोलह दिन बिताए। आज चीन के ज्यादातर वैज्ञानिक कार्यक्रमों में महिलाएं योगदान दे रही हैं। चीन सरकार के आंकड़ों के अनुसार, वर्तमान चीन में कुल विभिन्न किस्मों के महिला विज्ञान तकनीकी कार्यकर्ताओं की संख्या एक करोड़ तक जा पहुंची हैं, जो विज्ञान तकनीकी क्षेत्रों में कार्यरत महिलाओं की कुल संख्या का करीब 37 प्रतिशत बनता है। 

चीनी विज्ञान अनुसंधान की सबसे ऊंची स्तर वाले चीनी विज्ञान अकादमी व चीनी इंजीनीयरिंग अकादमी में महिला अकादमिशनों की संख्या करीब 70 है। चीनी महिला विज्ञान तकनीकी कार्यकर्ताओं की बड़ी संख्या में उभरना न केवल उनके खुद के कठोर परिश्रम सेघनिष्ठ संबंध रखता है बल्कि चीन के समाज विकास व महिला स्थान में भारी उन्नति होने सेभी अलग नहीं किया जा सकता है। चीन में आधारभूत शिक्षा के दौर में हो या उच्च शिक्षालयों की अध्ययन के दौर में, महिला पुरुषों की तरह समानता का अधिकार का उपभोग कर रही हैं,इसरो ने महिलाओं के विज्ञान तकनीकी अनुसंधान के दरबार में तेजी से कदम बढ़ाने की एक मजबूत नींव तैयार की है।

इसके विपरीत भारत में मंगल यान प्रक्षेपण जैसी शानदार उपलब्धि में महिलाओं की अनुपस्थिति ने दर्शा दिया कि अभी देश महत्वपूर्ण वैज्ञानिक अभियानों में लैंगिक समानता के मकसद में कितना पीछे है। वैसे यह अनुपस्थिति महिलाओं के उत्थान के नजरिये से ही नहीं, भारतीय विज्ञान की तरक्की की दृष्टि से भी चिंतित करने वाली है। इस अनुपस्थिति का अर्थ यह नहीं है कि महिलाएं ऐसे क्षेत्रों में आना नहीं चाहती हैं बल्कि उनके लिए काम करने लायक माहौल ही नहीं बन पाया है। सच यह है कि लड़कियां साइंस और इसी तरह के चुनौतीपूर्ण क्षेत्रों में करियर चुनना चाहती हैं लेकिन इस संबंध में न तो उन्हें उचित मार्गदर्शन मिलता है और न प्रोत्साहन।

यह स्थिति तब है, जब बराबर दावा किया जाता है कि सरकारें महिलाओं को विज्ञान के क्षेत्र में अपनी योग्यता व उपयोगिता उसी तरह साबित करने का मौका दे रही हैं, जैसे हाल के दशक में उन्होंने मैनेजमेंट व आईटी सेक्टर में साबित की है। इसमें संदेह नहीं है कि बैंकिंग, आईटी और मैनेजमेंट आदि सेक्टरों में महिलाओं ने अपनी योग्यता साबित करते हुए दर्शाया है कि वे पुरुषों से किसी मामले में कम नहीं हैं, पर विज्ञान के क्षेत्र में अब भी उनकी अपेक्षित भागीदारी नहीं है। 

वर्ष 2013 में वैज्ञानिक एवं औद्योगिक अनुसंधान परिषद (सीएसआईआर) ने एक सर्वेक्षण कराया था, जिससे साफ हुआ था कि इच्छा और रुचि के बावजूद भारत के विज्ञान जगत में महिलाओं की स्थिति सुधरी नहीं है। साइंस साइटेशन इंडेक्सड (एससीआई) जर्नल में प्रकाशित इस सर्वेक्षण के मुताबिक, देश के शोध और विकास (आर एंड डी) सेक्टर में पुरुषों के मुकाबले महिलाओं का प्रतिशत सिर्फ 15 है।

विज्ञान के विषयों में 17-22 वर्ष की उम्र में दाखिल होने वाली महिलाओं का प्रतिशत भी पिछले आधे दशक से जस का तस बना हुआ है यानी उसमें कोई खास तब्दीली नहीं हुई है, बल्कि इसमें थोड़ी कमी ही आई है। वर्ष 2004-05 में यह प्रतिशत 20.18 था जो 2008-09 में 19.98 रहा। यह स्थितियां तब हैं, जब आर एंड डी के क्षेत्र में आने वाली महिलाएं पूरे समर्पण और कर्तव्यनिष्ठा से योगदान दे रही हैं। सीएसआईआर के सर्वेक्षण के अनुसार विज्ञान के शीर्ष जर्नल्स में महिला शोधकर्ताओं के शोध पत्रों के प्रकाशन की दर 63 प्रतिशत है। समान अवधि में पुरुष शोधकर्ताओं के प्रकाशित शोधपत्रों की दर भी 63 प्रतिशत ही है। जहां तक शोधकार्य आदि के लिए अपने गृह राज्य छोड़ कर दूसरे राज्यों में जाने की बात है तो इसमें भी महिला शोधकर्ता पुरुषों से पीछे नहीं हैं। 358 महिला व 581 पुरुष शोधकर्ताओं पर कराए गए सर्वेक्षण में पता चला है कि जहां 30 प्रतिशत पुरुष शोधकर्ता शोध के सिलसिले में अपना राज्य छोड़ देते हैं, वहीं 29 प्रतिशत महिलाएं भी ऐसा जोखिम उठा लेती हैं। वैज्ञानिक शोध के एक मामले में तो महिलाएं पुरुषों से आगे साबित हुई हैं।

अकादमिक क्षेत्र से शोधकार्य में आने वाली महिलाओं का प्रतिशत फिलहाल 44 है जबकि ऐसा करने वाले पुरुषों का प्रतिशत सिर्फ 36 रहा है। यह सर्वेक्षण इस धारणा को गलत साबित करता है कि शोधकार्य के संबंध में महिलाएं संस्थान बदलने या अपना घर छोड़कर देश के किसी भी हिस्से में जाने को तैयार नहीं होती हैं, साथ ही यह धारणा भी गलत है कि वैज्ञानिक शोधकार्य के मुकाबले महिलाएं परिवार को ज्यादा अहमियत देती हैं।

ऐसे में क्या दुविधा है जो वैज्ञानिक संगठनों और प्रमुख वैज्ञानिक अभियानों में शीर्ष स्तर पर महिलाएं अनुपस्थित दिखाई देती हैं। क्या वैज्ञानिक संस्थानों में महिलाओं के लिये काम करने लायक वातावरण का पूर्णत: अभाव है? अथवा तर्क और शोध की बुनियाद पर गति करने वाला विज्ञान जगत भी पुरुष श्रेष्ठता के जड़वत दंभ से ग्रसित है। अभी देश के कई वैज्ञानिक अनुसंधान व रक्षा संस्थानों में योग्य वैज्ञानिकों की कमी है। कुछ समय पहले सरकार ने लोकसभा में जानकारी दी थी कि बंगलुरू स्थित भारतीय विज्ञान संस्थान में स्वीकृत पदों के मुकाबले आधे से भी कम शिक्षक (फैकल्टी मेंबर) हैं। लगभग यही स्थिति राष्ट्रीय प्रौद्योगिक संस्थानों (एनआईटी) और भारतीय प्रौद्योगिक संस्थान (आईआईटी) की भी है। इसरो और डीआरडीओ जैसे महत्वपूर्ण वैज्ञानिक अनुसंधान संगठनों में तो वैज्ञानिकों की और भी कमी है। 

देश में अंतरिक्ष विज्ञान से जुड़ी कई परियोजनाएं वैज्ञानिकों की कमी की वजह से रुकी हैं। डीआरडीओ को ऐसे वैज्ञानिक नहीं मिल रहे हैं जो कम से कम तीन साल तक रक्षा प्रयोगशालाओं में काम करने के लिए प्रतिबद्ध हों। रक्षा अनुसंधान एवं विकास संगठन यानी डीआरडीओ में 20 प्रतिशत महिला वैज्ञानिक हैं। यदि लैंगिक असमानता के पूर्वाग्रह से निकल कर मौका दिया जाए तो न केवल खाली पड़े पद भरे जा सकेंगे, बल्कि देश की प्रगति भी सुनिश्चित हो सकेगी। विज्ञान के क्षेत्र में महिलाओं की भागीदारी के संबंध में आज यह समझ बनाने की जरूरत है कि विज्ञान और तकनीक का मामला सामाजिक अपेक्षाओं से जुड़ा है।

आज साइंस और टेक्नोलाजी से जहां मनुष्य के जीवन स्तर में सुधार, सामरिक क्षमताओं में बढ़ोत्तरी और ऐसे अनुसंधानों और विकास गतिविधियों की उम्मीद की जाती है जो वैश्विक होड़ में प्रतिस्पर्धात्मक तकनीक को बढ़ावा देकर राष्ट्रीय अर्थव्यवस्था को मजबूत करें, तो वहीं यह अपेक्षा भी है कि वह सामाजिक गैर-बराबरी, खास तौर पर लैंगिक भेदभाव समाप्त करने में भी योगदान दें। इसके लिए जरूरी है कि युवा महिलाओं को विज्ञान में करियर बनाने के लिए प्रेरित किया जाए।

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लेखक / पत्रकार

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