"मुल्क" (कविता)

0


ग़ालिब कभी, या फैज़ कभी मैं मीर लिख देता..

"बना के मुल्क को मौज़ू कोई तहरीर लिख देता..

जैसे अभी हालात हैं,अवाम-ए-मुल्क की...

सियासत को अपने लफ्ज़ में शमशीर लिख देता..

एक लफ्ज़ में गर दर्द की करनी हो वज़ाहत..

रंज-ओ-अलम को छोड़ मैं कश्मीर लिख देता।"

(तहरीर- article, शमशीर- sword ,रंज-ओ-अलम - sorrow , वज़ाहत- explain , सियासत-politics)

नई कलम के लिए, बैंगलोर से फैज़ अकरम...

इस कॉलम के लिए पाठक अपनी स्वरचित कविता, कहानी, संस्मरण और लेख editor_hindi@yourstory.com पर भेज सकते हैं। आपके लिखे को लाईव करना हमारी जिम्मेदारी।

Related Stories

Stories by नई कलम