एक पैर वाला 52 साल का ये शख़्स पेंटिंग बनाकर स्वाभिमान से जी रहा है अपनी जिंदगी

जिंदगी में अगर मुश्किलें हैं, तो उनका हल भी है। राजेंद्र खाले की कहानी हमें यही बताती है कि किसी के कंधों पर बोझ बनने से लाख गुना बेहतर है, सिर्फ एक पैर के सहारे मंजिल की दूरी नापी जाए।

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उसके पास नहीं कोई घर, न ही परिवार और न ही हैं दो पैर, लेकिन फिर भी वह अपनी कला के बल पर शान, स्वाभिमान और खुशी से गुज़ार रहा है अपनी जिंदगी, ताकि दूसरों की जिंदगी में भर सके खुशियों के ढेर सारे रंग

राजेंद्र खाले वैसे तो एक आर्टिस्ट हैं, स्केच बनाते हैं लेकिन दुर्भाग्य से उन्होंने अपनी पूरी जिंदगी गरीबी और मुफलिसी में काटी है।
राजेंद्र खाले वैसे तो एक आर्टिस्ट हैं, स्केच बनाते हैं लेकिन दुर्भाग्य से उन्होंने अपनी पूरी जिंदगी गरीबी और मुफलिसी में काटी है।
एक हादसे ने राजेंद्र से उनका एक पैर छीन लिया... तकलीफ तो बहुत हुई, लेकिन होनी के आगे किसकी चलती है! राजेंद्र ने हार नहीं मानी और भीख मांगने से बेहतर उन्होंने अपने उस शौक से पैसे कमाने शुरू कर दिये, जो दो जून की रोटी जुटाने में सालों पहले कहीं खो गया था।

जिंदगी में अगर मुश्किले हैं, तो उनका हल भी है। राजेंद्र खाले की कहानी हमें यही बताती है कि किसी के कंधों पर बोझ बनने से लाख गुना बेहतर है, सिर्फ एक पैर के ही सहारे मंजिल की दूरी नापी जाए। राजेंद्र खाले वैसे तो आर्टिस्ट हैं, स्केच बनाते हैं लेकिन दुर्भाग्य से उन्होंने अपनी पूरी जिंदगी गरीबी और मुफलिसी में काटी है। साधारण-सी देह के भीतर असाधारण-सी प्रतिभा लिए राजेंद्र पुणे में सड़कों के किनारे स्केच बनाते रहते हैं। उनके पास घर नहीं है और न ही कोई परिवार, लेकिन फिर भी वे शान से और खुशी से अपनी जिंदगी गुजारते हुए दूसरों की जिंदगी में भी खुशियों के रंग भर रहे हैं। 

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अपने बचपन के दिनों को याद करते हुए राजेंद्र बताते हैं, कि उन्हें शुरू से ही पेंटिंग और ड्रॉइंग का बहुत शौक था। स्कूल में उन्हें जो बस खाली जगह मिल जाए वो अपनी कलाकारी दिखाना शुरू कर देते थे। किसी भी सादे पेज पर कुछ ही मिनटों में चित्र बनाकर वह लोगों को हैरान करने के लिए मजबूर कर देते थे। हालांकि घर की आर्थिक स्थिति ठीक न होने के कारण उन्हें 5वीं कक्षा के बाद पढ़ाई छोड़नी पड़ी। उसके बाद उन्होंने काम करना शुरू कर दिया।

"कम पढ़े-लिखे होने के कारण अपना पैर खोने से पहले राजेंद्र खाले ने पेपर बांटने से लेकर वेटर, कबाड़ बटोरने और दिहाड़ी मजदूरी के तौर पर भी किया है काम।"

दो वक्त की रोटी जुटाने में उनका पेंटिंग का पैशन कहीं खो सा गया। लेकिन एक हादसे ने उन्हें फिर से इसके करीब ला दिया। एक एक्सिडेंट में राजेंद्र का दाहिना पैर खराब हो गया और उसे अलग करना पड़ा। अब न तो वे मजदूरी कर सकते थे और न सामान्य तरीके से चल सकते थे। मजबूरी में उन्हें खाने-पीने के लिए दूसरों से पैसे लेकर काम चलाना पड़ रहा था। लेकिन मुफ्त में किसी से पैसे लेकर खाना उन्हें अच्छा नहीं लग रहा था। खाली वक्त में उन्होंने पेंटिंग्स बनानी शुरू कर दी। लोगों ने जब उनका हुनर देखा तो खूब तारीफें मिलीं। लेकिन तारीफों से भला पेट कहां भरने वाला था। राजेंद्र ने लोगों से कहा कि मुझे काम की जरूरत है, तारीफों से भला क्या होगा।

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राजेंद्र बताते हैं कि वो आत्मसम्मान और स्वाभिमान के साथ जीना चाहते थे। पिछले साल गणपति पूजा के दौरान उन्होंने गणपति की तस्वीरें बनाईं। लोगों ने उनसे ये तस्वीरें खरीदीं और उसके बदले में उन्हें पैसे भी दिए। उन्हें लगा कि अब पेंटिंग्स से गुजारा हो सकता है। राजेंद्र को कुछ आर्टिस्टों ने टिप्स दिये और उनकी पेंटिंग्स को बेहतर करने में मदद की। अब वो सड़क के किनारे बैठकर सादे पन्ने पर लोगों की तस्वीरें उतारते हैं। इसके लिए वह 100 से 500 रुपये तक लेते हैं। जो कि किसी भी कलाकार के लिए बड़ी मामूली रकम है।

"राजेंद्र अंग्रेजी भी समझ लेते हैं, हालांकि वह हिंदी और मराठी में ही बात करते हैं और अपनी प्रतिभा को भगवान का आशीर्वाद मानते हैं।"

राजेंद्र कहते हैं कि, 'पहले मैं स्केच बनाने के लिए लोगों से 100-150 रुपये ही लेता था, लेकिन बाद में कई लोगों ने मुझसे कहा कि मुझे और पैसे लेने चाहिए।' साथ ही वे कहते हैं, कि 'भीख मांगने से बेहतर है कुछ काम करके रोटी का इंतजाम किया जाए।' 

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राजेंद्र खाले पिछले 30 सालों से सड़क पर जिंदगी गुजार रहे हैं। न तो उनका कोई परिवार है और न ही कोई घर। वो पेंटिंग्स और स्केचिंग में ही अपनी खुशी तलाश लेते हैं। राजेंद्र को उनके एक दोस्त ने मुश्किल दिनों में रहने के लिए आसरा दिया था। अब वो उस दोस्त को रहने के लिए किराया भी देते हैं।

-मन्शेष कुमार 

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