बीज बोये, हल चलाये, फिर भी न किसान कहलाये

उत्तर प्रदेश में 91.7 प्रतिशत महिलायें ऐसी हैं जो पूरे साल कृषि कार्य करती हैं परन्तु उनकी पहचान श्रमिक अथवा पुरुष सहायक के रूप में है। जिसकी वजह से कृषि सबंधी निर्णय, नियंत्रण के साथ-साथ किसानों को मिलने वाली समस्त सुविधाओं से, 65 प्रतिशत कृषि कार्य का भार अपने कंधों पर उठाने वाली महिला, वंचित रह जाती है।

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"जब भी कृषि पर संकट के बादल छाये तो सभ्यता ने नारी के सहारे ही समाधान खोजा है, लेकिन आश्चर्य है कि परम्परा में महिलाओं का ही हल चलाना गुनाह करार दिया गया! आखिर क्यों?"

उत्तर प्रदेश में 32 प्रतिशत परिवारों के पास कृषिगत संसाधन है परन्तु उन पर महिलाओं के स्वामित्व का प्रतिशत शून्य है।
उत्तर प्रदेश में 32 प्रतिशत परिवारों के पास कृषिगत संसाधन है परन्तु उन पर महिलाओं के स्वामित्व का प्रतिशत शून्य है।
उत्तर प्रदेश में करीब 65 फीसदी महिला कृषक खेती-बारी से सम्बन्धित लगभग सारे कामकाज निपटाती हैं। महिलायें ही वे व्यापक व अदृश्य सेवाकर्मी हैं जो कि हमारी अर्थव्यवस्था की रीढ़ हैं, लेकिन इस 'दोयम दर्जे की नस्ल' के कार्यों की गणना किसी भी आंकड़े में हमारे सामने नहीं आती।

'पारम्परिक' महिला किसान या तो किसी ऐसे छोटे किसान परिवार से आती है जिसके पास एक एकड़ से भी कम भूमि होती है या फिर वह भूमिहीन परिवार से होती है, जो छुट-पुट कार्यों और मजदूरी के लिए किसी बड़े किसान की सनक पर निर्भर रहती है।

एक कथा प्रचलित है, कि जब राजा जनक के राज्य में सूखा पड़ा तब राजा के साथ रानी ने भी हल चलाया तो बरसात हुई थी। जनश्रुति है कि कहीं जब सूखा पड़ता है तो अंधकार होने के बाद निर्वस्त्र होकर महिलायें खेत में हल चलाती हैं ताकि देवता शर्मिंदा होकर वर्षा कर दें मतलब कि जब भी कृषि पर संकट के बादल छाये तो सभ्यता ने नारी के सहारे ही समाधान खोजा है। किन्तु आश्चर्य है कि परंपरा में महिलाओं का ही हल चलाना गुनाह करार दिया गया! आखिर क्यों? क्या यहां भी महिलाओं के हक को छीनने के पीछे आदिम अधिनायकवादी पितृसत्तात्मक दृष्टि जिम्मेदार है?
इससे बड़ी विडम्बना क्या होगी, कि आदिम से आधुनिक तक, मदर इंडिया की नरगिस से लेकर गोरखपुर की प्रभावती तक वे सभी महिलाएं जो हल चलाकर, कृषि कार्य करके, अपने परिवार का पेट पालती हैं, आज भी किसान के दर्जे से महरूम हैं। दरअसल अब तक हम-सब उसे ही किसान कहते हैं, जिसकी अपनी जमीन होती है या जो हल जोतता है। उत्तर प्रदेश में करीब 65 फीसदी महिला कृषक खेती-बारी से सम्बन्धित लगभग सारे कामकाज निपटाती हैं। महिलायें ही वह व्यापक व अदृश्य सेवाकर्मी हैं जो कि हमारी अर्थव्यवस्था की रीढ़ हैं, लेकिन इस 'दोयम दर्जे की नस्ल' के कार्यों की गणना किसी भी आंकड़े में हमारे सामने नहीं आती। 'पारंपरिक' महिला किसान या तो किसी ऐसे छोटे किसान परिवार से आती है जिसके पास एक एकड़ से भी कम भूमि होती है या फिर वह भूमिहीन परिवार से होती है, जो छुट-पुट कार्यों और मजदूरी के लिए किसी बड़े किसान की सनक पर निर्भर रहती है।

उत्तर प्रदेश में 91.7 प्रतिशत महिलायें ऐसी हैं जो पूरे साल कृषि कार्य करती हैं परन्तु उनकी पहचान श्रमिक अथवा पुरुष सहायक के रूप में है। जिसकी वजह से कृषि सबंधी निर्णय, नियंत्रण के साथ-साथ किसानों को मिलने वाली समस्त सुविधाओं से, 65 प्रतिशत कृषि कार्य का भार अपने कंधों पर उठाने वाली महिला, वंचित रह जाती है।

आंकड़ों पर जायें, तो कृषिगत कार्यों में महिलाओं का योगदान 55.6 प्रतिशत है, जबकि पुरुष का 5.5 प्रतिशत है, परन्तु नियंत्रण में स्थिति विपरीत है। महिला का नियंत्रण खेती में 4.2 प्रतिशत है, जबकि पुरुष का 47 प्रतिशत है। प्रदेश और केंद्रीय सरकार कृषि क्षेत्र को बढ़ावा देने हेतु अनेक प्रकार की योजनाएं, नीतियां व कार्यक्रम चलाती हैं परन्तु उन सबकी पहुंच महिलाओं तक नगण्य है। यदि कहीं महिलाएं हैं भी, तो वहां उनकी सांकेतिक अथवा निष्क्रिय उपस्थित ही दर्ज होती है।

एक सर्वे के अनुसार उत्तर प्रदेश में कृषि विभाग द्वारा आयोजित प्रशिक्षण शिविरों में मात्र 0.6 प्रतिशत महिलाओं की सहभागिता रही तथा मात्र 09 प्रतिशत महिलाओं को मंडी समिति की जानकारी है, जबकि मंडी समिति में महिलाओं की सहभागिता मात्र 5.3 प्रतिशत है। सिर्फ इतना ही नहीं, बल्कि महिला किसानों को कृषि योजनाओं की जानकारी महज 7.6 फीसदी है जबकि किसान मित्र के विषय में 2.4 प्रतिशत महिलाओं को जानकारी है। प्रसार सेवाओं में महिला किसान की भागीदारी मात्र 12 प्रतिशत है। 85 प्रतिशत ग्रामीण महिलाओं द्वारा प्रतिदिन 4-8 घंटे का समय केवल कृषि कार्यों हेतु दिया जाता है, बावजूद उसके उन्हें कृषि सबन्धी समितियों व निर्णायक मंचों की कोई जानकारी नहीं होती, ऐसे में वह अपने बहुमूल्य अनुभव व ज्ञान दूसरों तक न पहुंचा पाती है न ही अपने प्रस्ताव व विचारों से नई दिशा प्रदान कर पाती हैं।

भारतीय कृषक अनुसंधान परिषद के डीआरडब्ल्यूए की ओर से किए गए एक शोध से पता चला है कि प्रमुख फसलों के उत्पादन में महिलाओं की 75 फीसदी भागीदारी, बागवानी में 79 फीसदी और कटाई उपरांत कार्यों में 51 फीसदी महिलाओं की हिस्सेदारी होती है।

सदियों से कोल्हू के बैल की तरह पिस रही महिला किसान और उसकी बनाई चपाती की बनावट में फर्क नहीं आया है। प्रात: जागकर परिवार के लोगों के लिए खाना-पीना बनाकर या अपने घरेलू कामकाज से निवृत्त होकर अपने लिए खाने की पोटली साथ बांधे चल देती हैं उन खेतों की ओर जहां ये महिला किसान बोती हैं, बिटिया की शादी के सपने, छोटू के स्कूल की फीस, बाबू जी की आंख के आपरेशन का संकल्प।

घंटों-घंटों घुटनों तक भरे पानी में धान के छोटे-छोटे बिरवा को रोपना आसान नहीं होता। पांव कई बार घंटों तक पानी में खड़े होने से फूल जाते हैं, फिर भी अगले दिन ये पुन: सूर्योदय के बाद निरपेक्ष भाव से अपने गंतव्य पहुंच ही जाती हैं। क्या ये लचीलेपन की कोई विशिष्ट छवि है? शायद नहीं। इन उपमाओं से ये समझ में आता है कि स्त्रियों का काम कभी खत्म ही नहीं होता। कृषि में अहम योगदान देने के बावजूद महिला श्रमिकों की कृषि संसाधनों और इस क्षेत्र में मौजूद असीम सम्भावनाओं में भागीदारी काफी कम है।
उत्तर प्रदेश में 32 प्रतिशत परिवारों के पास कृषिगत संसाधन है परन्तु उन पर महिलाओं के स्वामित्व का प्रतिशत शून्य है। मात्र 04 प्रतिशत महिलाओं के पास किसान क्रेडिट कार्ड मौजूद हैं। इस भागीदारी को बढ़ाकर ही महिलाओं को कृषि से होने वाले मुनाफे को बढ़ाया जा सकता है। भारतीय कृषक अनुसंधान परिषद के डीआरडब्ल्यूए की ओर से की गई एक शोध से पता चला है कि प्रमुख फसलों के उत्पादन में महिलाओं की 75 फीसदी भागीदारी, बागवानी में 79 फीसदी और कटाई उपरांत कार्यों में 51 फीसदी महिलाओं की हिस्सेदारी होती है।

पशु पालन में महिलाएं 58 फीसदी और मछली उत्पादन में 95 फीसदी भागीदारी निभाती हैं। खाद्य एवं कृषि संगठन (एफएओ) के वर्ष 2011 में हुए एक अध्ययन के मुताबिक यदि महिलाओं को पुरुषों के बराबर परिसंपत्तियां, कच्चा माल और सेवाओं जैसे संसाधन मिलते तो समस्त विकासशील देशों में कृषि उत्पादन 2.5 से 4 फीसदी तक बढ़ सकता है। इसका मतलब ये होता है, कि भूखे लोगों की तादाद को 12 से 17 फीसदी तक कम किया जा सकता है, जिसकी मदद से लोगों की आमदनी बढ़ने के साथ-साथ उनकी सुरक्षा में भी इजाफा होता।
ये आंकड़े काफी उत्साहजनक हैं। महिलाओं को कृषि क्षेत्र में आत्मनिर्भर बनाने के लिए यदि उन्हें उचित मौके दिए जायें और जरूरी तकनीक उपलब्ध कराई जाये तो उनकी हिस्सेदारी को और अधिक लाभ के रूप में परिणित किया जा सकता है। महिला किसानों को विकास की मुख्य धारा में जोड़ने हेतु आवश्यक है कि उन्हें कृषि सबंधी योजनाओं का लाभ मिले तथा सरकारी सुविधाओं व प्रशिक्षणों में भागीदारी करके वे तकनीकी रूप से सक्षम व समर्थ हो सकें। अत: कृषि योजनाओं, सुविधाओं व प्रशिक्षणों में महिला किसान के लिए 33 प्रतिशत आरक्षण के प्रावधान की आवश्यकता है।

एक ग्रामीण महिला की सबसे जीवन्त और तेजस्वी छवि गांवों में साफ आसमान और तीखे सूर्य के तले दिनभर रोजदारी पर खेत में मजदूरी करते हुए या अपने ही खेत में काम करते हुए या घंटों-घंटे झुक कर दोहरे होते रहने के बाद अपनी टांगे सीधे करते हुए, फावड़ा कुदाली चलाते हुए, खरपतवार उखाड़ते हुए या बुआई करते हुए दिखाई पड़ती है। चेहरे पर बगैर किसी शिकन के कड़ी धूप में प्रकृति, भूख, दैन्य और जिंदा रहने की जंग लड़ते हुए भी ये खेतिहर महिलायें जिस तन्मयता से अपने काम को करती हैं उसके बदले में इन्हें शायद ही कभी 'खेत-मालिकों' के द्वारा सही पारिश्रमिक दिया गया हो। गांठ और निशान पड़े हुए खुरदरे हाथों को शायद ही कभी अपनी मेहनत की वास्तविक कीमत मिली हो।
सारी मलाई एक तरफ और सारे अभाव, रिरियाहट, वंचना और यातना-तकलीफ एक तरफ। इन सबका एक ही इलाज है कृषि भूमि में महिलाओं का मालिकाना हक, जो अभी नाममात्र का है। समझने की आवश्यकता है कि पुरूषों का काम की तलाश में पलायन करना आदि जैसे अनेक कारणों से कृषि कार्य पुरूषों से ज्यादा महिलाओं के हाथ में चला गया है, मगर फिर भी महिलायें किसान नहीं हैं, क्योंकि उनके पास खतौनी (कृषि के मालिकाना हक का दस्तावेज) नहीं है अर्थात वे खेत की वास्तविक मालकिन नहीं हैं।

जमीन का स्वामित्व एक अति आवश्यक सामाजिक व आर्थिक पहलू है, जिस पर व्यक्ति की पहचान उसके अधिकार, निर्णय की क्षमता, आत्मनिर्भरता व आत्मविश्वास निर्भर करता है। महिलाओं के पास जमीन पर अधिकार न होने से उनके सर्वांगीण विकास सशक्तता पर पूर्ण विराम लग रहा है, साथ ही कठिन समय में पैतृक भूमि का समुचित उपयोग करने में वे अक्षम होती हैं। पुरुष के मालिक होने के कारण व्यसन व अकारण जमीन बिक्री पर रोक नहीं है जिससे पारिवारिक कृषि भूमि सुरक्षित नहीं रह पाती, महिला की कोई निर्णायक स्थिति न होने के कारण उसके द्वारा किया गया विरोध अक्सर प्रभावहीन होता है। अत: आवश्यक है कि पैतृक जोत जमीन में पत्नी का नाम भी पति के साथ सहखातेदार के रूप में दर्ज हो, ऐसा कानून में प्रावधान किया जाना आवश्यक है। दीगर है कि उत्तर प्रदेश में महिला किसानों का भूमि पर स्वामित्व मात्र 6.5 प्रतिशत है। इसमें से 81 प्रतिशत महिलाओं को यह विधवा होने तथा 19 प्रतिशत को मायके से संपत्ति के रूप में प्राप्त हुआ है।

उत्तर प्रदेश के पचास जनपदों में किये गये सर्वेक्षण के अनुसार प्रत्येक गांव के 05-06 प्रतिशत लोग तत्काल अपनी पत्नी को जमीन हस्तांतरण हेतु तैयार हैं। किंतु उत्तर प्रदेश में महिला के नाम पैतृक जमीन के हस्तांतरण पर 06 प्रतिशत स्टांप शुल्क देय है। किंतु छोटे-मझोले किसानों के लिए इतनी बड़ी धनराशि देकर जमीन हस्तांतरण कराना संभव नहीं है। महिलाओं को भूस्वामित्व देने तथा उनकी सामाजिक-आर्थिक स्थिति को सुदृढ़ करने हेतु यदि सरकार वर्तमान कानूनों में थोड़ी-सी शिथिलता बरतते हुए पति द्वारा पत्नी को पैतृक जोत जमीन हस्तातंरित करने पर स्टांप शुल्क माफ करने का प्रावधान कर दे तो इस छोटे से कदम से महिला किसानों की स्थिति में बड़ा ही सकरात्मक परिवर्तन आ जायेगा।

जिस दौर में हर तरफ महिला सशक्तिकरण की बातें हो रहीं हैं, तो बातों से आगे बढ़कर कुछ ठोस किये जाने की आवश्यकता है। कृषि भूमि सहित विभिन्न प्राकृतिक संसाधन महिलाओं के पक्ष में हस्तांरित होने चाहिए। सरकार को ऐसी कोई नीति बनानी चाहिए, जिससे ये असमानता दूर हो सके और प्राकृतिक संसाधन सिर्फ पुरूषों के हाथ में न रहें।

कुछ ज़रूरी पॉइंट्स, ताकि मिल सके महिला किसान को हक-

-महिला को किसान का दर्जा देने हेतु कानून में आवश्यक बदलावों की ज़रूरत है।
-पैतृक जोत जमीन में पत्नी का नाम भी पति के साथ सहखातेदार के रूप में दर्ज होने के लिए कानून में प्रावधान हो।
-कृषि योजनाओं, सुविधाओं व प्रशिक्षणों में महिला किसान के लिए 33 प्रतिशत आरक्षण का प्रावधान और उसकी भागीदारी की सुनिश्चितता।
-पति द्वारा पत्नी को पैतृक जोत ज़मीन हस्तातंरण करने के प्रावधान की आवश्यकता।

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लेखक / पत्रकार

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