मोती की खेती से लाखों कमाता है ये किसान

परंपरागत खेती छोड़ मोती उगाता है ये किसान, कमात हैं लाखों

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राजस्थान की ढाणी बामणा वाली के सत्यनारायण यादव और उनकी पत्नी सजना सीप मोती की खेती से हर माह 20 से 25 हजार रुपए की आमदनी कर रहे हैं। इस तरह सालभर में उन्हें करीब तीन लाख रुपए की कमाई हो रही है।

सत्यानारायण यादव (फोटो साभार- भास्कर)
सत्यानारायण यादव (फोटो साभार- भास्कर)
मोती का व्यवसाय शुरू करने के लिए घोंघा को किसी पानी का टैंक बनाकर उसमें अगले अठ्ठारह महीनों तक उपयुक्त वातावरण में रखा जाता है। यह घोंघा तब तक पानी में रहता है जब तक कि मोती आकार न ग्रहण कर ले।

 0.4 हेक्टेयर के तालाब में करीब 25 हजार सीप से मोती का उत्पादन किया जा सकता है। विशेषज्ञों की मानें तो किसान इससे सालाना 8 से 10 लाख रुपए की आय प्राप्त कर सकता है। 

जमाने के साथ ही हमारे देश के किसान भी हाईटेक हो रहे हैं। गेहूं, धान जैसी फसलों में अब उतना मुनाफा नहीं मिलता जिससे कि जिंदगी आराम से बीत सके, इसलिए नए-नए तरीकों को भी आजमाया जा रहा है। मोती की खेती इन दिनों काफी प्रचलन में है। इस व्यवसाय के जरिए किसान न केवल अच्छा पैसा कमा रहे हैं बल्कि समृद्धि की ओर भी बढ़ रहे हैं। ऐसे ही राजस्थान के एक किसान हैं सत्यनारायण यादव जो कि मोती से काफी पैसे कमा रहे हैं।

दैनिक भास्कर की एक रिपोर्ट के मुताबिक राजस्थान की ढाणी बामणा वाली के सत्यनारायण यादव और उनकी पत्नी सजना सीप मोती की खेती से हर माह 20 से 25 हजार रुपए की आमदनी कर रहे हैं। इस तरह सालभर में उन्हें करीब तीन लाख रुपए की कमाई हो रही है। इसके लिए उन्होंने महज 10 हजार रुपए से काम शुरू किया था। दंपती ने आईसीएआर भुवनेश्वर उड़ीसा में 15 दिन के ट्रेनिंग ली है। इसके बाद वे खुद अपनी ढाणी में सीप मोती की खेती करने लगे। सत्यनारायण ने बताया कि मोती पालन के लिए पानी का हौज बनाया जाता है। वे इसमें केरल, गुजरात, हरिद्वार जैसी जगहों से सीप लाकर यहां डालते हैं।

मोती का व्यवसाय शुरू करने के लिए घोंघा को किसी पानी का टैंक बनाकर उसमें अगले अठ्ठारह महीनों तक उपयुक्त वातावरण रखा जाता है। यह घोंघा तब तक पानी में रहता है जब तक कि मोती आकार न ग्रहण कर ले। उपयुक्त परिस्थितियों में मोती के स्वरूप ग्रहण करने में तुलनात्मक रूप से कम वक्त लगता है। प्राकृतिक मोती प्रकृति प्रदत्त होते हैं, जो संयोग की बात है। दूसरी तरफ संवर्धित मोती मानव निर्मित होते हैं जो प्राप्तकर्ता सीप/सीपियों के आंतरिक अंगों में मेंटल ग्राफ्ट और उचित नाभिक की शल्य कार्यान्वयन से बनते हैं।

राजस्थान में मोती का व्यवसाय शुरू करने के लिए सरकारी स्तर भी कई प्रयास किए गए हैं। प्रदेश के कृषि विभाग ने मोतियों से पैसे की संभावना के लिए वैज्ञानिकों की टीम उड़ीसा गई थी जहां पर इसका अध्ययन किया है। इसके बाद प्रायोगिक स्तर पर मोतियों को विकसित करने का काम शुरू हुआ। नतीजे अच्छे आने पर प्रदेश के किसानों को इस ओर प्रेरित किया गया। राजस्थान के कृषि मंत्री प्रभुलाल सैनी बताते हैं कि खारे और मीठे पानी के तालाब, बांध और नदियों में मोतियों की खेती हो सकती है।

अक्टूबर से दिसम्बर मोतियों की खेती के लिए अनुकूल समय होता है। 10 गुणा 10 फीट के आकार के तालाब या फिर 0.4 हेक्टेयर के तालाब में करीब 25 हजार सीप से मोती का उत्पादन किया जा सकता है। विशेषज्ञों की मानें तो किसान इससे सालाना 8 से 10 लाख रुपए की आय प्राप्त कर सकता है। दरअसल सीप एक जलीय जंतु है। इसका शरीर दो पार्श्व कपाटों में बंद रहता है जो बीच से एक दूसरे से जुड़े रहते हैं। इसके भीतर घोंघा नाम का एक कीड़ा होता है, जिसे मॉलस्क कहते हैं।

ये कीड़ा अपने शरीर से निकलने वाले एक चिकने तरल पदार्थ द्वारा अपने घर का निर्माण करता है। घोंघे के इसी घर को सीपी कहते हैं। इसी सीप के भीतर मोती पैदा होती है। जिंदा सीप से मोती प्राप्त किया जाता है। सीपों से निकले मोतियों का इस्तेमाल गमले, गुलदस्ते, मुख्य द्वार पर लटकाने वाली सजावटी झूमर, स्टैंड, डिजाइनिंग दीपक आदि तैयार किए जाते हैं। इसके कवर से पाउडर तैयार किया जाता है जिसका इस्तेमाल आयुर्वेदिक दवाओं में होता है। इसके अलावा आभूषणों में भी मोतियों का इस्तेमाल व्यापक तौर पर किया जाता है।

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