21 साल के इंजीनियरिंग स्टूडेंट्स की टीम ने तैयार की सेल्फ़-ड्राइविंग व्हीलचेयर

समाज के लिए कुछ बेहतर करने की चाह ने केरल के तीन इंजीनियरिंग छात्रों को प्रेरित किया एक ख़ास तरह की व्हीलचेयर तैयार करने को...

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यह व्हीलचेयर आपके आस-पास के इलाके का मैप तैयार करती है और इसके बाद यूज़र (मरीज़ और दिव्यांग आदि) आसानी से एक-जगह से दूसरी जगह जा सकते हैं। आपको बता दें कि एक बार लोकेशन सेलेक्ट करने के बाद यूज़र को कुछ भी नहीं करना होता और मशीन अपने आप ही रास्ते में आने वाली रुकावटों से बचते हुए यूज़र को सुरक्षित रूप से उसकी मनचाही जगह पर पहुंचा देती है।

व्हीलचेयर तैयार करने वाली टीम
व्हीलचेयर तैयार करने वाली टीम
अगर व्हीलचेयर से चलने वाला यूज़र स्मार्टफ़ोन चलाने में किसी तरह की दिक्कत महसूस करता है तो उनका कोई दोस्त या परिवार का सदस्य भी फ़ोन ऑपरेट करके मशीन चला सकता है। व्हीलचेयर को स्मार्टफ़ोन की स्क्रीन या जॉयस्टिक की मदद से ऑपरेट किया जा सकता है।

महज़ 21 साल की उम्र में समाज को कुछ बेहतर देने की चाहत के साथ केरल के तीन इंजीनियरिंग छात्रों ने मिलकर एक ख़ास तरह की व्हीलचेयर तैयार की है। यह व्हीलचेयर आपके आस-पास के इलाके का मैप तैयार करती है और इसके बाद यूज़र (मरीज़ और दिव्यांग आदि) आसानी से एक-जगह से दूसरी जगह जा सकते हैं। आपको बता दें कि एक बार लोकेशन सेलेक्ट करने के बाद यूज़र को कुछ भी नहीं करना होता और मशीन अपने आप ही रास्ते में आने वाली रुकावटों से बचते हुए यूज़र को सुरक्षित रूप से उसकी मनचाही जगह पर पहुंचा देती है।

केरल के कोल्लम ज़िले की अमृता विश्व विद्यापीठम से इंजीनियरिंग की पढ़ाई कर रहे चिंता रवि तेजा, सरथ श्रीकांत और अखिल राज ने इस नायाब चीज़ को तैयार किया है। इस व्हीलचेयर का ऑपरेशन पूरी तरह से सुरक्षित है और यह आविष्कार अस्पतालों, एयरपोर्ट आदि जगहों पर मरीज़ों या दिव्यांगों के लिए बेहद उपयोगी है। आपको बता दें कि यह व्हीलचेयर 300-500 मीटर के दायरे में बड़ी ही सहजता के साथ ख़ुद ही नैविगेट कर सकती है।

दरअसल यह व्हीलचेयर, ऑटोनॉमस नैविगेशन के लिए एक रोबोटिक ऑपरेटिंग सिस्टम (आरओएस) का इस्तेमाल करती है। यूज़र्स अपने ऐंड्रॉयड मोबाइल फ़ोन पर मुद्रा नाम की ऐप डाउनलोड कर अपने आस-पास 300-500 मीटर दायरे तक का मैप देख सकते हैं और फिर अपनी मनचाही जगह का चुनाव कर बिना किसी अतिरिक्त मेहनत के एक-जगह से दूसरी जगह जा सकते हैं। दरअसल, रोबोटिक ऑपेरिटिंग सिस्टम के अंतर्गत यह मशीन एलआईडीएआर नाम की लेज़र सेंसर तकनीक का इस्तेमाल करती है और इसके माध्यम से ही निर्धारित जगह पर मौजूद स्थिर और चलती-फिरती (डायनमिक) सभी तरह की रुकावटों का पता लगा लेती है।

ऐनालिसिस के बाद सिस्टम से एक मैप तैयार होता है, जो आप अपने फ़ोन पर मौजूद मुद्रा ऐप में देख सकते हैं। मुद्रा ऐप की सबसे ख़ास बात यह है कि इसे चलाने के लिए उपभोक्ताओं को इंटरनेट कनेक्टिविटी या फिर जीपीएस की ज़रूरत नहीं पड़ती और साथ ही, व्हीलचेयर का मूवमेंट भी बैटरी से मिलने वाली ऊर्जा के माध्यम से होता है। टीम के सदस्य रवि कहते हैं कि अगर व्हीलचेयर से चलने वाला यूज़र स्मार्टफ़ोन चलाने में किसी तरह की दिक्कत महसूस करता है तो उनका कोई दोस्त या परिवार का सदस्य भी फ़ोन ऑपरेट करके मशीन चला सकता है। व्हीलचेयर को स्मार्टफ़ोन की स्क्रीन या जॉयस्टिक की मदद से ऑपरेट किया जा सकता है।

आपको बता दें कि यह व्हीलचेयर तीन अलग-अलग मोड्स पर ऑपरेट होती हैः

ऑटोमेटेड मोडः मैप लोड होने के बाद, यूज़स कमरे के किसी भी कोने में जा सकता है और इसके लिए उसे अपने फ़ोन पर दिख रहे मैप पर सही लोकेशन का चुनाव करना होता है।

फ़िक्स्ड ऑटोमेटेड मोडः इस मोड में यूज़र टच या नैविगेट नहीं कर सकता। इसमें व्हीलचेयर के सिस्टम में एक जगह निर्धारित होती है और मशीन अपने आप ही यूज़र को निर्धारित जगह पर ले जाती है।

मैनुअल मोडः इस मोड में अगर मनचाही लोकेशन ऐप में पहले से नहीं मौजूद है तो यूज़र को स्मार्टफ़ोन पर दिख रहे मैप पर टैप करते हुए लोकेशन तक जाना पड़ता है।

इस मशीन को बनाने वाले तीनों इंजीनियरिंग स्टूडेंट्स की उम्र महज़ 21 साल है और ये तीनों पिछले दो सालों से अमृता टेक्नॉलजी हब में बतौर जूनियर रिसचर्स काम कर करे हैं। अमृता टेक्नॉलजी हब, उनके कॉलेज का इन-हाउस इनक्यूबेशन सेंटर है। फ़िलहाल यह टीम अपने मॉडल का प्रोडक्शन शुरू कराने की जद्दोजहद में लगी हुई है और उनकी पूरी तैयारी है कि जल्द ही मार्केट में उनका प्रोडक्ट बड़े स्तर पर लॉन्च किया जा सके।

टीम ने जानकारी दी कि पहले इस व्हीलचेयर के प्रोटोटाइप की क़ीमत 90 हज़ार रुपए रखी गई थी, लेकिन इसमें कई और फ़ीचर्स जोड़ दिए गए हैं, इस वजह से व्हीलचेयर की हालिया क़ीमत 1.25 लाख रुपए के करीब पहुंच चुकी है। रवि ने बताया कि टीम की पूरी कोशिश है कि व्हीलचेयर की क़ीमत को 1 लाख रुपए तक लाया जा सके।

व्हीलचेयर का प्रोटोटाइप तैयार करने में विद्यापीठ की ह्मयूमैनिटरियन टेक्नॉलजी लैब के डायरेक्टर और इलेक्ट्रॉनिक्स ऐंड कम्युनिकेशन के असिस्टेंट प्रोफ़ेसर डॉ. राजेश कन्नन मेगालिंगम ने टीम का मार्गदर्शन किया। डॉ. राजेश बताते हैं कि व्हीलचेयर का प्रोटोटाइप उनके सेंटर पर है और अपनी इन-हाउस टेक टीम के साथ मिलकर वह प्रोडक्ट को कमर्शियलाइजेशन और मार्केटिंग के हिसाब और भी उपयुक्त बनाने की जुगत में लगे हुए हैं। वह कहते हैं कि टीम की पूरी कोशिश है कि ज़्यादा से ज़्यादा लोग उनके इस प्रोडक्ट का लाभ उठा सकें। डॉ. राजेश का दावा है कि यह दुनिया की सबसे कम क़ीमत वाली ऑटोमैटिक व्हीलचेयर है।

योर स्टोरी के साथ बातचीत में टीम ने कहा कि उनके सामने पहली सबसे बड़ी चुनौती थी एक सटीक मैप जेनरेटिंग सिस्टम तैयार करने की और इस काम में उनकी राह आसान की, रोबोटिक्स ऑपरेटिंग सिस्टम ने। टीम ने बताया कि दूसरी बड़ी चुनौती यह थी कि व्हीलचेयर को लोगों और पालतू जानवरों से लड़ने से बचाया जा सके और लेज़र तकनीक के माध्यम से इस समस्या का हल निकाला गया। इस व्हीलचेयर के डिवेलपर्स अभी और भी फ़ीचर्स जोड़ने की कोशिश में लगे हुए हैं। उनकी योजना है कि इमरजेंसी के दौरान व्हीलचेयर के माध्यम ही से यूज़र अपने परिवार, नज़दीकी अस्पताल या फिर पुलिस स्टेशन से संपर्क कर सके। डॉ. राजेश ने जानकारी दी कि हर बार व्हीलचेयर पर बैठने के बाद यूज़र को अपने हिसाब से मशीन को कस्टमाइज़ करना होता है।

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