वेटर और सिनेमाहॉल में टिकट काटने वाले जयगणेश को मिली UPSC में 156वीं रैंक

जयगणेश की कहानी सिर्फ इसलिए प्रेरणादायक नहीं है, कि उन्होंने सातवें प्रयास में सफलता हासिल की, बल्कि वह जिस हालात और परिवेश में रहकर आईएएस बने हैं वह काबिल-ए-तारीफ है।

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अगर आपको पहले प्रयास में सफलता नहीं मिलती तो कोशिश करो, कोशिश करो और दोबारा कोशिश करो। तमिलनाडु के जयगणेश की कहानी भी कुछ ऐसी ही है। वह सिविल सर्विस की परीक्षा में छह बार फेल हुए लेकिन हिम्मत नहीं हारी और अपने सातवें प्रयास में 156वीं रैंक हासिल कर IAS बनने का सपना पूरा कर लिया।

फोटो साभार: iaspaper.net
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जयगणेश शुरू से ही पढ़ने में तेज थे और हमेशा फर्स्ट आते थे। गरीब परिवार से आने की वजह से उनका सिर्फ एक ही सपना था कि कैसे भी वह कोई नौकरी कर अपने परिवार को चलाएं। क्योंकि उनके पिता को हर महीने सिर्फ 4,500 रुपये ही मिलते हैं। इतनी कम तनख्वाह में घर का खर्च चलाना और चार बच्चों की पढ़ाई के लिए भी पैसों का इंतजाम करना काफी मुश्किल होता था।

तमिलनाडु के वेल्लौर जिले के एक सुदूर गांव विनयमंगलम में एक गरीब परिवार में जन्में जयगणेश को इंजिनियरिंग करने के बाद भी सिनेमा हॉल में टिकट काउंटर पर बैठने से लेकर रेस्टोरेंट में वेटर का काम करना पड़ा। वह ये सब सिर्फ अपने आईएएस बनने के सपने को पूरा करने के लिए ऐसा करते रहे। जयगणेश के पिता कृष्णन सिर्फ दसवीं तक पढ़े हैं। वह एक लेदर की फैक्ट्री में सुपरवाइजर का काम करते हैं। जयगणेश अपने माता-पिता की सबसे बड़ी संतान हैं। उनकी दो छोटी बहनें और एक छोटा भाई भी है। 8वीं तक गांव के स्कूल में पढ़ने के बाद जयगणेश ने आगे की पढ़ाई पास के कस्बे से की।

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जयगणेश शुरू से ही पढ़ने में तेज थे और हमेशा फर्स्ट आते थे। गरीब परिवार से आने की वजह से उनका सिर्फ एक ही सपना था कि कैसे भी वह कोई नौकरी कर अपने परिवार को चलाएं। क्योंकि उनके पिता को हर महीने सिर्फ 4,500 रुपये ही मिलते हैं। इतनी कम तनख्वाह में घर का खर्च चलाना और चार बच्चों की पढ़ाई के लिए भी पैसों का इंतजाम करना काफी मुश्किल होता था। इसीलिए दसवीं करने के बाद जयगणेश ने पॉलिटेक्निक में एडमिशन ले लिया। क्योंकि उन्हें लगता था कि इसे करने के बाद उन्हें तुरंत नौकरी मिल जाएगी, लेकिन वहां की अंतिम परीक्षा में उन्हें 91% नंबर मिले। इतने अच्छे नंबर लाने के बाद उनके प्रोफेसर ने उन्हें नौकरी करने के बजाय आगे की पढ़ाई करने की सलाह दी।

अच्छे नंबर पाने की वजह से उन्हें बड़ी आसानी से तमिलनाडु के पेरियार गवर्नमेंट इंजिनियरिंग कॉलेज में एडमिशन मिल गया। इस दौरान उनके पिता ने उनकी हरसंभव मदद की। हालांकि इंजिनियरिंग के बाद वह नौकरी ही करना चाहते थे। क्योंकि उनकी पारिवारिक स्थिति बहुत ज्यादा खराब थी। उनके गांव के अधिकतर बच्चे 10वीं तक ही पढ़ाई कर पाते थे और कई बच्चों को तो स्कूल का मुंह ही देखना नसीब नहीं होता था। जयगणेश बताते हैं, कि उनके गांव के दोस्त ऑटो चलाते हैं या शहरों में जाकर किसी फैक्ट्री में मजदूरी करते हैं। अपने दोस्तों में वह इकलौते थे जो यहां तक पहुंचे थे। जयगणेश बताते हैं,

'मुझे अपने पिता से शिक्षा की अहमियत पता चली। अपने परिवार में स्कूल जाने वाले वह इकलौते इंसान थे। वह चाहते थे कि उनके बच्चे भी पढ़ाई पूरी करें।'

साल 2000 में इंजिनियरिंग खत्म करने के चार दिन बाद ही वह नौकरी की तलाश में बेंगलुरु चले गए। नौकरी के लिए उन्हें ज्यादा मेहनत नहीं करनी पड़ी और एक कंपनी में उन्हें 2,500 महीने की नौकरी मिल गई। बेंगलुरु में नौकरी करते वक्त उनके दिमाग में गांव और दोस्तों के बारे में ख्याल आते रहते थे। उन्हें गांव के पिछड़ेपन और बच्चों के स्कूल न जाने पर दुख होता था। गांव की युवा पीढ़ी मजदूरी करने में खप रही थी, और यह बात उन्हें अंदर तक कचोटती रहती थी। उन्होंने सोचना शुरू कर दिया कि वे कैसे अपने गांव वालों की मदद कर सकते हैं।हालांकि उस वक्त तक उन्होंने सिविल सर्विस जैसी किसी परीक्षा का नाम भी नहीं सुना था। जब वह बेंगलुरु पहुंचे तो उन्हें इन सब चीजों के बारे में मालूम चला। उन्हें पता चला कि जिले का कलेक्टर बनने के बाद गांव के लोगों के लिए बहुत कुछ किया जा सकता है। बस तभी से उन्होंने IAS बनने का सोच लिया।

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"जयगणेश ने बिना कुछ सोचे नौकरी से इस्तीफा दे दिया और IAS तैयारी में लग गए। उन्हें इस बात की परवाह नहीं थी कि आगे क्या होगा, क्योंकि उन्हें लगता था कि बड़ी आसानी से वह इस परीक्षा को पास कर लेंगे। उनके पिता को 6,500 रुपये बोनस के तौर पर मिले थे। उन्होंने इन पैसों को जयगणेश को दे दिया ताकि वे स्टडी मटीरियल खरीद सकें। वह स्टडी मटीरियल लेकर गांव वापस आ गए और वहीं घर पर रहकर तैयारी में लग गए।"

लेकिन पहले ही प्रयास में जयगणेश को असफलता हाथ लगी। वह प्री की परीक्षा भी नहीं पास कर सके। उन्हें पता ही नहीं था कि इस एग्जाम की तैयारी कैसे की जाए, कौन सा सब्जेक्ट चुना जाए, क्या पढ़ा जाए। उन्हें गाइड करने वाला कोई नहीं था। उन्होंने मकैनिकल इंजिनियरिंग को अपना मेन सब्जेक्ट चुना था। इसी दौरान वह उमा सूर्य से मिले, जो कि वेल्लौर में सिविल की तैयारी कर रहे थे। उन्होंने जयगणेश को सलाह दी कि अगर वह समाजशास्त्र को वैकल्पिक विषय के तौर पर चुनेंगे तो परीक्षा पास करने में आसानी होगी। लेकिन इस विषय में भी वह फेल होते गए और तीसरे प्रयास में भी परीक्षा नहीं पास कर पाए। हालांकि फिर भी वह घबराए नहीं। क्योंकि उन्हें पता था कि वह खुद से तैयारी कर रहे हैं और उनका मार्गदर्शन करने वाला कोई नहीं है।

इसके बाद उन्हें चेन्नई में सरकारी कोचिंग का पता चला जहां नाम मात्र के पैसों में आईएएस की कोचिंग की तैयारी करवाई जाती है। जयगणेश ने सरकारी कोचिंग का एंट्रेंस दिया और वहा उनका एडमिशन हो गया। उन्हें वहां रहने और खाने को भी मिलता था। यहां रहकर उन्होंने चौथे प्रयास में प्री की परीक्षा पास कर ली। लेकिन मेन की परीक्षा में असफल हो गए। इसके बाद उन्हें कोचिंग छोड़ना पड़ा। वह वापस अपने गांव नहीं जाना चाहते थे, लेकिन चेन्नई में रहकर पढ़ाई करना काफी मुश्किल और महंगा भी था। उन्हें अपनी इंजिनियरिंग की डिग्री की याद आई और वह नौकरी खोजने निकल पड़े। लेकिन काफी प्रयासों के बाद भी उन्हें कहीं नौकरी नहीं मिली। क्योंकि पिछली नौकरी छोड़े उन्हें काफी वक्त हो गया था।

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"जयगणेश ने पार्ट टाइम नौकरी तलाश ली। उन्हें सत्यम सिनेमा की कैंटीन में बिलिंग ऑपरेटर के तौर पर काम मिल गया। इंटरवल के वक्त उन्हें वेटर के तौर पर भी काम करना पड़ता था। मगर इंजिनियरिंग डिग्री वाले जयगणेश इस काम से कभी व्यथित नहीं होते थे। उनके दिमाग में सिर्फ एक ही चीज चल रही होती कि किसी भी तरह IAS बनना है।"

पांचवें प्रयास में उन्होंने प्री क्वालिफाई किया, लेकिन हर बार की तरह मेन्स में फेल हो गए। छठे प्रयास में उन्होंने मेंस क्वॉलिफाई किया और इंटरव्यू तक पहुंचे। लेकिन जब फाइनल रिजल्ट आया तो उसमें उनका नाम नहीं था।

इस दौरान जयगणेश एक विकल्प के लिए कई और सरकारी नौकरी में आवेदन कर रहे थे। उन्हें इंटेलिजेंस ब्यूरो में ऑफिसर की नौकरी भी मिल गई। लेकिन वे दुविधा में थे कि नौकरी ज्वाइन करें या फिर एक आखिरी बार और आईएएस के लिए प्रयास करें। उन्होंने अपने मन की सुनी और फिर से तैयारी में लग गए। आखिरकार जयगणेश की मेहनत रंग लाई और इस बार वे सारी बाधाओं को पार करते हुए चुन लिए गए। उन्हें यकीन नहीं हो रहा था, कि उनकी इतनी अच्छी रैंक आएगी। अब उन्हें यकीन है कि वे IAS बन जाएंगे। जयगणेश को लग रहा है कि उन्होंने कोई लंबा युद्ध जीत लिया है।

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