बिहार के छोटे से गांव की बंदना ने 13,000 लगाकर खोली थी कंपनी, आज एक करोड़ का हुआ टर्नओवर

बंदना ने 13 हजार में शुरू की थी कंपनी, आज टर्नओवर हैं करोड़ों में...

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बिहार की रहने वाली बंदना जैन 10 साल पहले अपना घर छोड़कर मुंबई पढ़ने के लिए आईं थीं। वह अपने परिवार से पढ़ाई के लिए बाहर निकलने वाली पहली लड़की थीं। बंदना आज सक्सेस उद्यमी हैं। वह गृह सज्जा और फर्नीचर के सामान बनाने वाली कंपनी की फाउंडर हैं। खास बात यह है कि उनके फर्नीचर और सजावटी सामान गत्ते के बने होते हैं जो पूरी तरह से इको फ्रेंडली माने जाते हैं।

बंदना जैन
बंदना जैन
बंदना ने गत्ते से हैंडीक्राफ्ट लैंप और फर्नीचर बनाना शुरू किया। उन्होंने शादी से लेकर घर के लिए इको फ्रेंडली सजावट के सामान बनाए। बंदना कहती हैं कि हम ग्राहकों को सिर्फ प्रॉडक्ट नहीं देते बल्कि उन्हें एक आर्ट का पीस देते हैं। 

मूल रूप से बिहार की रहने वाली बंदना जैन 10 साल पहले अपना घर छोड़कर मुंबई पढ़ने के लिए आईं थीं। वह अपने परिवार से पढ़ाई के लिए बाहर निकलने वाली पहली लड़की थीं। बंदना आज सक्सेस उद्यमी हैं। वह गृह सज्जा और फर्नीचर के सामान बनाने वाली कंपनी की फाउंडर हैं। खास बात यह है कि उनके फर्नीचर और सजावटी सामान गत्ते के बने होते हैं जो पूरी तरह से इको फ्रेंडली माने जाते हैं। 30 साल की बंदना ने सिर्फ 13 हजार रुपयों से अपने बिजनेस की शुरुआत की थी। आज उनकी कंपनी का रेवेन्यू 1 करोड़ रुपये पहुंच गया है। उनकी कंपनी का नाम सिल्वन स्टूडियो (Sylvn Studio) है।

बंदना का परिवार काफी बड़ा था। वह बिहार के ठाकुरगंज गांव में अपने 50 सदस्यों वाले विशाल परिवार में रहती थीं। वहां पढ़ाई के लिए सिर्फ लड़कों को बाहर जाने का मौका मिलता था। लड़कियां वहीं के किसी स्थानीय स्कूल और कॉलेज में एडमिशन लेती थीं या फिर अपनी पढ़ाई छोड़ देती थीं। इसके बाद लड़कियों की शादी कर दी जाती थी। बंदना भी उन्हीं लड़कियों में से एक थीं। 2008 में उनकी शादी कर दी गई। इसके बाद ही उन्हें मुंबई जाने का मौका मिला। उन्हें बचपन से ही कला का शौक था और वह दुर्गा पूजा के दौरान पंडाल में जाती थीं और वहां सजावट का काम निपटाती थीं।

दुर्गा की मूर्ति देखकर वह काफी खुश होती थीं और उसे बनाने वाले कारीगरों से मिलना भी चाहती थीं, लेकिन उन्हें यह मौका नहीं मिला। बाद में जब वे बड़ी हुईं तो उन्होंने आर्ट के क्षेत्र में काम करने का मन बनाया, लेकिन घर से अनुमति नहीं मिली। बंदना को मुंबई के प्रतिष्ठित आर्ट स्कूल जेजे स्कूल ऑफ आर्ट के बारे में जानने को मिला लेकिन वे वहां पढ़ाई के लिए नहीं जा सकती थीं। बंदना बताती हैं कि उन्होंने सिर्फ 8वीं तक स्कूल जाकर पढ़ाई की इसके बाद वह सिर्फ परीक्षा देने के लिए स्कूल जाती थीं। इतना ही नहीं सिर्फ 16 साल में ही उनकी शादी की बात चलने लगी थी। लेकिन जिंदगी में कुछ करने की हसरत ने उन्हें आज यहां पहुंचा दिया।

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बंदना कम उम्र में शादी नहीं करना चाहती थीं। वह पढ़ना चाहती थीं और आर्ट के क्षेत्र में ही कुछ करना चाहती थीं। लेकिन उनके घर वाले इस के लिए राजी नहीं थी। लेकिन उन्होंने किसी तरह अपने घरवालों को मनाया और इंटीरियर डिजाइनिंग का कोर्स करने के लिए दिल्ली जाने का प्लान बनाया। लेकिन इसी दौरान एक दुखद घटना घटी। उनके दिल्ली जाने से दो दिन पहले ही उनकी मां को ब्रेन हैमरेज हो गया और उन्हें दिल्ली जाने का प्लान कैंसल करना पड़ा। एक महीने बाद ही बंदना की मां का देहांत हो गया। इस घटना से बंदना को काफी आघात पहुंचा और वो बुरी तरह टूट गईं।

बंदना के दो छोटे भाई थे और उनकी दो बहनों की शादी हो गई थी जो दिल्ली में रहती हैं। उन्हें घर में मां की जिम्मेदारी संभालनी पड़ी। वह घर में सभी के लिए खाना बनाती थीं और सारे काम निपटाती थीं। इसी दौरान वे दिल्ली आईं और उनकी मुलाकात मनीष से हुई। उन्होंने सोचा कि शादी के बाद ही शायद उन्हें उनकी आजादी मिले। उन्होंने मनीष से शादी की, जो कि उस वक्त आईआईएम लखनऊ से पढ़ाई कर रहे थे। बाद में मनीष ने मुंबई में जॉब खोजी और वहीं सेटल हो गए। बंदना के पति मनीष एक कॉर्पोरेट कंपनी में काम करते थे।

मनीष बंदना के भविष्य के बारे में चिंतित थे और काफी संजीदगी से सोचते थे। उन्होंने इसके लिए बंदना को काफी प्रोत्साहित भी किया। इसीलिए शादी के बाद बंदना ने जेजे स्कूल में पढ़ाई करने के बारे में सोचा। लेकिन फिर उन्हें पता चला कि वहां एडमिशन पाना इतना आसान नहीं है। इसके बाद उन्होंने वहां से पढ़ाई कर निकल चुके छात्रों से गाइडेंस लिया और मन लगाकर एंट्रेंस की तैयारी की। बंदना की मेहनत रंग लाई और उन्हें जेजे स्कूल में दाखिला मिल गया। एक ग्रामीण पृष्ठभूमि और पिछड़े राज्य से ताल्लुक रखने की वजह से बंदना जेजे स्कूल में खुद को कमतर समझती थीं। वे बताती हैं कि उनके बैचमेट्स काफी टैलेंटेड थे।

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बंदना की कंपनी में काम करने वाली महिलाएं
बंदना की कंपनी में काम करने वाली महिलाएं

उन्हें साथी छात्रों से काफी मदद मिली तब जाकर उनमें आत्मविश्वास आया। उन्होंने स्कूल में टीचरों के साथ-साथ साथी छात्रों से भी काफी कुछ सीखा। कोर्स खत्म होने के बाद बंदना को समझ नहीं आ रहा था कि अब आगे वह क्या करें। इसी बीच उनके पति ने एक नया घर ले लिया। फिर घर सजाने की पूरी जिम्मेदारी बंदना ने अपने कंधों पर ले ली। बंदना के पास ढेर सारा वक्त था जिसका इस्तेमाल वह घर सजाने में करती थीं। उन्होंने कुछ हटकर करने का सोचा और सामान को पैक करने में इस्तेमाल करने वाले गत्तों को इस्तेमाल किया। लेकिन उन्हें अच्छी क्वॉलिटी का गत्ता नहीं मिल रहा था। इसे खोजने के लिए वह धारावी जैसे भीड़भाड़ वाले इलाके के चक्कर लगाती रहीं और कबाड़ियों से मिलती रहीं।

आखिरकार बंदना को गत्ता मिल गया, लेकिन उसे काटना काफी मुश्किल काम था। उन्होंने किसी तरह इस गत्ते से कुर्सी बनाई। जिसे देखने के बाद उन्हें लगा कि यह सही आइडिया नहीं है। इसी दौरान उन्होंने अपने एक दोस्त से इसके बारे में पूछा उसने बंदना की काफी तारीफ की और इसे इंप्रूव करने के लिए कुछ आइडिया भी दिए। इसके बाद बंदना के भीतर कॉन्फिडेंस आया और उन्होंने सिल्वन नाम से एक कंपनी भी खोल दी। यह नाम सिल्वेनस से लिया गया जो कि रोमन लकड़ी होती है जो जंगल को सुरक्षित रखती है। बंदना को लगा कि यह सबसे सही नाम रहेगा क्योंकि उनका आइडिया भी पर्यावरण को बचाने से जुड़ा हुआ था।

बंदना ने इस गत्ते से हैंडीक्राफ्ट लैंप और फर्नीचर बनाना शुरू किया। उन्होंने शादी से लेकर घर के लिए इको फ्रेंडली सजावट के सामान बनाए। बंदना कहती हैं कि हम ग्राहकों को सिर्फ प्रॉडक्ट नहीं देते बल्कि उन्हें एक आर्ट का पीस देते हैं। साथ ही प्रकृति को बचाने के लिए भी काम करते हैं। सिर्फ इतना ही नहीं बंदना मुंबई की गरीब महिलाओं को रोजगार भी देती हैं। उनकी कंपनी में ऐसी तमाम महिलाएं काम करती हैं जो फाइनैंशियली काफी कमजोर होती हैं। वह बिहार के अपने गांव की महिलाओं को याद करती हैं और कहती हैं कि महिलाओं को आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर होना काफी जरूरी है।

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गत्ते से बनाए गए खूबसूरत लैप
गत्ते से बनाए गए खूबसूरत लैप

वह कहती हैं, 'मैं बिहार की जिस जगह से आती हूं वहां महिलाओं के लिए कोई जगह नहीं होती। उनके टैलेंट की कद्र नहीं की जाती। इसलिए महिलाओं को काम देना मेरे दिल के काफी करीब है।' बंदना ने गत्ते से ही कई सारे खूबसूरत लैंप बनाए और उन्हें अपने घर में सजाने के लिए रख दिया, और जब बंदना ने अपने दोस्तों को बुलाकर दिखाया तो सबने उनकी काफी तारीफ की। इसके बाद बंदना ने कभी पीछे मुड़कर नहीं देखा। उन्होंने मैकडॉनल्ड और रेमंड जैसी कंपनियों के लिए सजावटी सामान बनाया। उन्होंने खुद की वेबसाइट बनाई और उसी से अपने कंपनी के सामान बेचे। आज वह एक सशक्त सफल महिला उद्यमी हैं।

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