डेयरी बिजनेस से तीन साल में करोड़पति बने हरेंद्र, हर माह कमा रहे सोलह लाख

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उत्तराखंड के किसानों की कठिनाइयों से सबक लेते हुए युवा हरेंद्र सिंह ने एमबीए करने के बाद खुद का ऐसा बिजनेस मॉडल खड़ा कर लिया कि तीन साल में ही उनकी कंपनी का सालाना टर्नओवर आठ करोड़ तक पहुंच गया। अब वह हर महीने सोलह-सत्रह लाख रुपए कमा रहे हैं।

हरेंद्र
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 हरेंद्र सिंह राज्य के मैदानी क्षेत्रों से सीड्स के ब्रिडर खरीद कर किसानों को उपलब्ध कराने के साथ ही फसल तैयार होने में भी उनकी मदद करने लगे। 'तराई फार्म सीड्स' फसलें घर पहुंचने से लेकर मार्केटिंग तक की जिम्मेदारी निभा रही है। कंपनी गेहूं, सरसों, चावल, मटर आदि के सीड्स का कारोबार कर रही है।

आज भी रोजी-रोजगार की मुश्किलें चाहें जितनी असाध्य हों, हालात से लड़ने वाले युवा अपनी राह बना ही लेते हैं। हिमाचल प्रदेश हो या उत्तराखंड, देश के समुद्रतटवर्ती इलाके हों या दुश्मन मुल्कों से सटे राज्य, हर जगह के युवा संसाधनों के अभाव में भी नई-नई राहों के अन्वेषी नजर आ रहे हैं। यहां तक कि वे अपने क्षेत्र के लोगों की कठिनाइयों को ही अपने रोजगार का ऑइडिया बना ले रहे हैं। ऐसा ही एक राज्य है उत्तराखंड। यहां दुर्गम पहाड़ी इलाकों में खासतौर से कृषक समुदाय राज्य के गठित हुए डेढ़ दशक से ज्यादा का वक्त गुजर जाने के बावजूद अपने हालात से दो-चार हो रहा है। दिन बरसात को हों या जाड़े के, वक्त गर्मियों में पहाड़ी जंगलों में लपटें उठने का हो या भूस्खलन का, सबसे पहले यहां के गांव वालों को ही प्रकृति से जूझना होता है।

इस हालात को ही गौर से जानने समझने के बाद ऊधमसिंह जिले के हरेंद्र सिंह ने खुद का एक ऐसा बिजनेस मॉडल डेवलप कर लिया कि आज वह हर साल लाख-दो-लाख नहीं, बल्कि सालाना दो करोड़ की कमाई कर रहे हैं। इसी तरह उत्तराखंड प्रोग्रेसिव डेयरी फारमर्स एसोसिएशन के अध्यक्ष डॉ हरेंद्र रावत ने देहरादून के एक दर्जन से अधिक डेयरी किसानों के साथ एक ऐसा मॉडल विकसित किया है, जिसमें किसानों को डेयरी खोलने के लिए लोन लेने से लेकर तकनीक की जानकारी तक की सुविधाएं दी जा रही हैं। एसोसिएशन ने अब तक दून में जो 50 मॉडल डेयरी विकसित किए हैं, उनसे हर रोज औसतन चार हजार लीटर से अधिक दूध का उत्पादन किया जा रहा है। इससे तीन सौ से अधिक किसानों को स्वरोजगार मिला हुआ है।

इन डेयरी किसानों ने शिक्षित बेरोजगारों, पूर्व सैनिकों की मदद के लिए हाथ बढ़ाया है। इस एसोसिएशन से उत्तराखंड के लगभग पांच सौ किसान जुड़ चुके हैं। हंस फाउंडेशन की ओर से इन किसानों को वृद्धावस्था पेंशन, निःशुल्क डेयरी प्रशिक्षण, गाय की मृत्यु, लड़की की शादी, बच्चों की शिक्षा और गंभीर बीमारी के इलाज के लिए आर्थिक सहायता दी जा रही है। एसोसिएशन का हर साल राज्य में कम से कम एक सौ मॉडल डेयरी विकसित करने का लक्ष्य है। एसोसिएशन डेयरी किसानों को निःशुल्क प्रशिक्षण दे रहा है।

उत्तराखंड का जिला ऊधमसिंह नगर राज्य के उन्हीं इलाकों में एक है, जहां की दुश्वारियां भी कुछ कम नहीं हैं। यहीं के रहने वाले हरेंद्र सिंह ने बीएससी एजी करने के बाद एमबीए की पढ़ाई पूरी की। उसके बाद मुरादाबाद से एग्री क्लिनिक एंड एग्री बिजनेस सेंटर से एक और कोर्स किया। उन्हीं दिनो हरेंद्र सिंह पहाड़ के किसानों की दिक्कतों का भी बारीकी से अध्ययन करते रहे। वह बताते हैं कि उत्तराखंड में प्रायः भूस्खलन होते रहते हैं। इससे रास्ते जगह-जगह टूट जाते हैं। पहाड़ी इलाकों का यातायात थम जाता है। इससे सबसे अधिक परेशानी खेतीबाड़ी करने वाले किसानों को होती है। वह खेती में काम आने खाद, बीज तक के लिए तरस जाते हैं। फसलों के बीज खरीदने के लिए बाजार नहीं पहुंच पाते हैं।

इस दौरान बीज की डिमांड और उनकी कीमतें आसमान छूने लगती हैं। पूरे हालात को खंगाल लेने के बाद हरेंद्र सिंह ने वर्ष 2014 में 'तराई फार्म सीड्स एंड कंपनी' नाम से अपनी कंपनी बनाई। अपनी पढ़ाई का कोर्स पूरा कर लेने के बाद वह अपने सीड्स प्रोजेक्ट पर काम करने लगे। ऐसे में उन्हें सबसे पहले धनराशि की जरूरत थी। इसके लिए उन्होंने राज्य के बैंकों से संपर्क किया। आगे बढ़ने का रास्ता मिल गया। उन्होंने एक करोड़ रुपए के लोन के लिए नैनीताल बैंक को अपना प्रोजेक्ट सौंप दिया। बैंक से उनको 65 लाख ही मिले। इसके बाद उनके प्रोजेक्ट को दूसरी मदद नाबार्ड द्वारा 44 प्रतिशत सब्सिडी के रूप में मिली।

इस तरह 'तराई फार्म सीड्स एंड कंपनी' का काम चल निकला। हरेंद्र सिंह राज्य के मैदानी क्षेत्रों से सीड्स के ब्रिडर खरीद कर किसानों को उपलब्ध कराने के साथ ही फसल तैयार होने में भी उनकी मदद करने लगे। 'तराई फार्म सीड्स' फसलें घर पहुंचने से लेकर मार्केटिंग तक की जिम्मेदारी निभा रही है। कंपनी गेहूं, सरसों, चावल, मटर आदि के सीड्स का कारोबार कर रही है। किसानों से 1800 रुपए प्रति क्विंटल सीड्स खरीदकर कंपनी बाजार में उसे लगभग ढाई हजार रुपए प्रति क्विंटल बेच देती है। इससे उसे अपने सालाना टर्नओवर में पचीस प्रतिशत का शुद्ध मुनाफा हो रहा है। कंपनी की हर साल दो करोड़ रुपए की कमाई हो रही है। पिछले साल कंपनी का सालाना टर्नओवर आठ करोड़ रुपए था।

पिछले तीन साल में ही हरेंद्र सिंह अपने उद्यम से राज्य के युवा करोड़पति बन चुके हैं। हरेंद्र सिंह की कंपनी के चल पड़ने की एक खास वजह राज्य के जीबी पंत कृषि एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय से किसानों की उम्मीदें पूरी न हो पाना भी रहा है। कहने को तो यह विश्वविद्यालयअखिल भारतीय स्तर का है, यहां किसान मेले भी लगते रहते हैं लेकिन किसान यहां से मनचाहा और पर्याप्त बीज न मिलने से परेशान रहते हैं। परिवहन व्यवस्थाएं भी ध्वस्त होने से विश्वविद्यालय तक किसानों की पहुंच नहीं बन पाती है। किसान किसी तरह दूरदराज से वहां पहुंचते भी हैं तो उनकी कोई सुनता नहीं है। उन्हें मायूस होकर प्रायः बैरंग लौटना पड़ता है।

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पत्रकार/ लेखक/ साहित्यकार/ कवि/ विचारक/ स्वतंत्र पत्रकार हैं। हिन्दी पत्रकारिता में 35 सालों से सक्रीय हैं। हिन्दी के लीडिंग न्यूज़ पेपर 'अमर उजाला', 'दैनिक जागरण' और 'आज' में 35 वर्षों तक कार्यरत रहे हैं। अब तक हिन्दी की दस किताबें प्रकाशित हो चुकी हैं, जिनमें 6 मीडिया पर और 4 कविता संग्रह हैं।

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