महकमा-ए-सेहत में कैसे हो सुधार: जब ऐसे हैं हालात

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देश के सबसे बड़े प्रदेश उत्तर प्रदेश में 16,289 डाक्टरों के पद सृजित हैं लेकिन इस समय केवल 11,301 डाक्टर तैनात हैं और बारह कम पांच हजार डाक्टरों की कमी हैं। विभाग सभी ब्लाक मुख्यालयों पर विशेषज्ञ डाक्टरों की सेवायें देने का वायदा करता है लेकिन मौके पर हालात यह है कि मात्र बीस प्रतिशत डाक्टर ही उपलब्ध हैं और उनमें से अधिकांश मरीजों को देखने के बजाय निदेशालय में फाइलें निपटा रहे हैं। इतना ही नहीं प्रदेश के अस्पतालों में चाहे वह सीएचसी हो या जिला चिकित्सालय महिला डाक्टरों की नितान्त कमी है। ज्ञात हो कि 3300 गाइनोकोलाजिस्ट के बदले मात्र 400 महिला विशेषज्ञ डाक्टर उपलब्ध हैं।

गोरखपुर में अस्पताल की स्थिति
गोरखपुर में अस्पताल की स्थिति
यह कहना गलत नहीं होगा कि समूचे मुल्क की स्वास्थ्य व्यवस्था इस समय स्ट्रेचर पर है जबकि प्रत्येक जनप्रिय सरकार का सपना होता है कि उसके निजाम में आम आदमी को सस्ती और सफल स्वास्थ्य सेवायें हासिल हो सकें।

देश के सबसे बड़े सूबे उत्तर प्रदेश के हालात तो ऐसे हैं कि प्रदेश के स्वास्थ्य मंत्री सिद्धार्थनाथ सिंह को कहना पड़ता है कि उत्तर प्रदेश की स्वास्थ्य सेवाएं इस इस समय आईसीयू में हैं। वाकई में ऐसा ही है। जिस क्षेत्र का प्रतिनिधित्व स्वयं मुख्यमंत्री करते हैं वहां का अस्पताल दर्जनों मासूमों की हत्या का जिम्मेदार बने तो सुदूर इलाकों के बारे में क्या कहा जाये? उस पर सियासत आज तक सिर्फ लाशें गिनने में मशरूफ है। यहां तो लाशों की भी सेहत दुरुस्त नहीं हैं।

अभी हाल ही में राजधानी लखनऊ स्थित प्रतिष्ठित डॉ. राम मनोहर लोहिया अस्पताल के पोस्टमार्टम कक्ष में एक महिला का शव आवारा कुत्तों द्वारा बुरी तरह से क्षतिग्रस्त कर दिया जाता है। वहीं दूसरी ओर राजस्थान के जोधपुर में ऑपरेशन टेबल पर दो चिकित्सकों का झगड़ा एक नन्हीं जान पर भारी पड़ जाता है। शर्मसार कर देने वाला यह मामला क्षेत्र के सबसे बड़े महिला अस्पताल 'उम्मेद' का है। खबरों के मुताबिक वहां मौजूद नर्सिंग स्टाफ ने दोनों को समझाने की बहुत कोशिश की, लेकिन तब तक देर हो चुकी थी। विडम्बना के हालात यहीं पर खत्म नहीं होते हैं, दास्तान बहुत लम्बी है। अभी जहां गोरखपुर के अस्पताल में 72 बच्चों की मौत का मामला शान्त भी नहीं हुआ कि झारखण्ड के जमशेदपुर के सरकारी अस्पताल, महात्मा गांधी मेडिकल (एमजीएम) में कुपोषण से 52 बच्चों के मरने की खबर ने पूरे सिस्टम को झकझोर दिया है। हालांकि गोरखपुर में ऑक्सीजन की कमी का मामला उभर कर आया था, वहीं जमशेदपुर के अस्पताल में लापरवाही और अस्पताल में भर्ती बच्चों के लिए सही देखभाल की व्यवस्था नहीं होने की बात सामने आ रही है। इस अस्पताल में 30 दिनों में 52 नवजात बच्चों की मौत हो चुकी है। एक रिपोर्ट के अनुसार रांची के अस्पतालों में 117 दिनों में करीब 164 बच्चों की मौत हो चुकी है। अस्पताल सूत्रों के अनुसार इसका प्रमुख कारण कुपोषण बताया जा रहा है।

देश का आम नागरिक हर दिन इस तरह की घटना का शिकार है। हम इतने संवेदनशून्य हो चुके हैं कि जब तक 'नरसंहार' जैसी कोई घटना नहीं घटती, हम हर घटना को नजरअन्दाज कर देते हैं कि ऐसा तो होता ही रहता है। 

यही नहीं अन्तहीन हो रही इस त्रासदी में अब एक कड़ी फर्रुखाबाद का लोहिया अस्पताल भी बन गया है। जिले के लोहिया अस्पताल में पिछले 30 दिनों में 49 शिशुओं की मौत से हड़कम्प मचा है। 49 में से अकेले 30 नवजातों की मौत सिक न्यूबॉर्न केयर यूनिट (एसएनसीयू) में हुई है। शिशुओं की मृत्यु दर के ये आंकड़े 21 जुलाई से 20 अगस्त के बीच के हैं। गौरतलब है कि शिशु-मातृ मृत्यु दर को कम करने के लिए सरकार की ओर से करोड़ों खर्च हो रहे हैं। जननी सुरक्षा व जननी शिशु सुरक्षा योजना के तहत टीकाकरण, आन कॉल एम्बुलेंस व आशाओं की तैनाती भी है। वहीं जन-जागरूकता के नाम पर पोस्टर, बैनर, वॉल पेंटिग जैसे विभिन्न मदों में खर्च का खाता अलग है। इसके बावजूद राम मनोहर लोहिया महिला अस्पताल में 21 जुलाई से 20 अगस्त तक 49 नवजात शिशुओं की मौत होना स्वास्थ्य सेवाओं पर सवाल खड़े कर रहा है। विभागीय आंकड़ों के अनुसार इस अवधि में लोहिया अस्पताल में 468 नवजात शिशुओं का जन्म हुआ है। अस्पताल में प्रसव के दौरान इनमें से 19 बच्चों की मौत हुई है। इस अवधि में गम्भीर रूप से बीमार 211 नवजात शिशुओं को एसएनसीयू वार्ड में भर्ती कराया गया। इनमें से 30 बच्चों की मौत हो गई है। यह स्थिति तब है जब लोहिया अस्पताल में नवजात शिशुओं की सुरक्षा के लिए हाईटेक तकनीक से युक्त एसएनसीयू व केएमसी वार्ड स्थापित हैं।

उपरोक्त वर्णित दोनों घटनायें महज एक आकस्मिक दुर्घटना नहीं थी, जिसके लिए खेद व्यक्त कर जिम्मेदारी से मुक्त हो जाया जाए। दरअसल, यह देश की स्वास्थ्य व्यवस्था में व्याप्त दुर्व्यवस्था का एक बड़ा उदाहरण हैं। देश का आम नागरिक हर दिन इस तरह की घटना का शिकार है। हम इतने संवेदनशून्य हो चुके हैं कि जब तक 'नरसंहार' जैसी कोई घटना नहीं घटती, हम हर घटना को नजरअन्दाज कर देते हैं कि ऐसा तो होता ही रहता है। गोरखपुर काण्ड के बाद उत्तर प्रदेश के स्वास्थ्य मंत्री का जो बयान आया, वह भी ठीक उसी तरह से नजरअन्दाज करने की एक कोशिश थी कि 'अगस्त में तो बच्चे मरते ही हैं।' एक सम्वेदनशील इन्सान ऐसा कभी नहीं कह सकता। यह उपहास है और यह अश्लीलता है। सवाल यह होना चाहिए कि बच्चे क्यों मरते हैं?

अस्पतालों की दयनीय स्थिति
अस्पतालों की दयनीय स्थिति

देश में प्रतिवर्ष बच्चों के प्रसव के समय बड़ी संख्या में महिलाएं काल के गाल में समा जाती हैं। प्रसव के समय महिलाओं की मृत्यु दर का यह आंकड़ा असम में प्रति एक लाख पर 370, मध्य प्रदेश, उत्तर प्रदेश और राजस्थान में 310 से 340 के बीच है।

अगर बच्चे मरते हैं, तो उसकी जिम्मेदारी किसकी है? क्या जन्म देने की वजह से उसके मां-बाप जिम्मेदार हैं, या वह व्यवस्था, जिसके अन्तर्गत किसी बच्चे को कोई जन्म दे रहा है? हम सामाजिक प्राणी हैं। हमने अपने जीवन को बेहतर और सुखी सम्पन्न बनाने के लिए व्यवस्था निर्मित की है। हम उसके संचालन के लिए सरकार चुनते हैं। सरकारें हमसे विश्वास लेकर ही व्यवस्था का दायित्व संभालती हैं। नि:संदेह, प्राथमिक तौर पर हमारी सुरक्षा और सुविधाओं के लिए वही जिम्मेदार होती है। यह उसकी नैतिकता है लेकिन, आमतौर पर घटना की जिम्मेदारी लेने के बजाय एक-दूसरे के दोष खोजे जाने लगते हैं। हालात तो यहां तक खराब हैं कि जननी, जन्म देते वक्त भी सुरक्षित नहीं है। 

देश में प्रतिवर्ष बच्चों के प्रसव के समय बड़ी संख्या में महिलाएं काल के गाल में समा जाती हैं। प्रसव के समय महिलाओं की मृत्यु दर का यह आंकड़ा असम में प्रति एक लाख पर 370, मध्य प्रदेश, उत्तर प्रदेश और राजस्थान में 310 से 340 के बीच है तो झारखण्ड और छत्तीसगढ़ जैसे राज्यों में यह आंकड़ा 180 है। इस वर्ष के स्वास्थ्य सर्वे की सालाना रिपोर्ट के मुताबिक देश की 48 प्रतिशत आबादी का प्रतिनिधित्व करने वाले नौ समृद्ध राज्यों में शिशु मृत्यु दर 70 प्रतिशत और मातृ मृत्यु दर 62 प्रतिशत थी। विश्व के सबसे बड़े लोकतंत्र में मातृत्व सुख पाने के लिए अभी भी बड़ी संख्या में माताओं को और उनके नवजात शिशुओं को बड़ी संख्या में अपनी जान गंवानी पड़ती है।

भारत सरकार की वार्षिक हेल्थ रिपोर्ट के अनुसार भारत के नौ राज्य जिसमें मध्य प्रदेश, उत्तर प्रदेश, राजस्थान, बिहार, उत्तराखण्ड, झारखण्ड और असम आदि राज्यों में मातृ मत्यु दर और शिशु मृत्यु दर चिन्ताजक स्थिति में पंहुच चुकी है। इन राज्यों से लिए गए आंकड़ों के अनुसार मध्य प्रदेश व उत्तर प्रदेश में शिशु मृत्यु दर प्रति एक हजार पर 67 से 70 के बीच है वहीं नये बसे छोटे राज्यों उत्तराखण्ड व झारखण्ड में यह 41 से 43 के बीच है। सरकारी अस्पतालों की बदहाली, बेरुखी और डाक्टरों के अमानवीय व्यवहार की खबरें अक्सर सामने आती रहती हैं। अस्पताल में तोड़-फोड़ और डाक्टरों से दुव्र्यवहार और मारपीट की खबरें भी अक्सर आती हैं।

इसी कारण कई बार डाक्टर हड़ताल करते हैं जिसका नतीजा भी मरीज और तीमारदार ही भुगतते हैं। लेकिन अस्पतालों की बदहाली और डाक्टरों की लापरवाहियों के ढेरों किस्सों के बावजूद सच यह है कि अस्पताल-डाक्टर के बिना जनता का काम नहीं चलता है। इलाज के लिए उन्हें उन्हीं के पास जाना होता है और जब मरीज अस्पताल पहुंचता है तो डाक्टर साहब नदारद मिलते हैं अथवा लाइन इतनी लम्बी होती है कि मरीज को पूरा समय नहीं मिल पाता है, लिहाजा आम आदमी को सहज और सस्ती स्वास्थ्य सेवाओं के लिए आवश्यक है कि डाक्टर की उपलब्धता बनी रहे किन्तु सरकार की लाख कोशिशों के बावजूद विश्व स्वास्थ्य संगठन का वह मानक पूरा नहीं हो पा रहा है जिसमें कहा गया है कि 1500 व्यक्तियों पर एक डाक्टर होना ही चाहिए।

यद्यपि सरकार का दावा है कि प्रत्येक व्यक्ति को चिकित्सा सुविधा उपलब्ध करायी जा रही है लेकिन सच तो यह है कि अगर प्रदेश में कथित झोलाछाप डाक्टर न हो तो लेने के देने पड़ जाएंगे क्योंकि सरकारी अस्पतालों में तो डाक्टर हैं ही नहीं। स्वास्थ्य विभाग के आंकड़ों पर अगर नजर डाली जाए तो पता चलता है कि प्रदेश में 16,289 डाक्टरों के पद सृजित हैं लेकिन इस समय केवल 11,301 डाक्टर तैनात हैं और बारह कम पांच हजार डाक्टरों की कमी है। विभाग सभी ब्लाक मुख्यालयों पर विशेषज्ञ डाक्टरों की सेवायें देने का वायदा करता है लेकिन मौके पर हालात यह है कि मात्र बीस प्रतिशत डाक्टर ही उपलब्ध हैं और उनमें से अधिकांश मरीजों को देखने के बजाय निदेशालय में फाइलें निपटा रहे हैं।

अस्पताल के बाहर मरीज 
अस्पताल के बाहर मरीज 

दिल्ली का एम्स देख लीजिए या लखनऊ का पीजीआई, वहां रेलवे स्टेशनों की तरह भीड़ आखिर क्या साबित करती है? डाक्टर चाह कर भी हर मरीज पर उतना ध्यान नहीं दे सकते जितनी जरूरत होती है।

इतना ही नहीं प्रदेश के अस्पतालों में चाहे वह सीएचसी हो या जिला चिकित्सालय, महिला डाक्टरों की नितान्त कमी है। ज्ञात हो कि 3300 गाइनोकोलाजिस्ट के बदले मात्र 400 महिला विशेषज्ञ डाक्टर उपलब्ध हैं। जिस दिन उत्तर प्रदेश के लगभग बीस लाख कथित झोलाछाप डाक्टरों ने आम आदमी को प्राथमिक उपचार उपलब्ध कराना बन्द कर दिया उस दिन स्थिति यकीनन विस्फोटक हो जाएगी। इसके लिए न सिर्फ लोक सेवा आयोग की लचर कार्य प्रणाली जिम्मेदार है, बल्कि प्रदेश में अपेक्षाकृत मेडिकल कॉलेज का न होना भी है। पिछले 10 वर्षों में भले ही पूरे प्रदेश में सैफई समेत पांच सरकारी मेडिकल कॉलेज और सैकड़ों निजी कॉलेज खुले हों, लेकिन उससे पहले करीब 40 वर्षों तक कोई मेडिकल कॉलेज ही नहीं खुला।

सबसे बड़ी गड़बड़ यह है कि चिकित्सा सुविधाओं का विस्तार दूर-दराज इलाकों तक नहीं किया गया, बड़े अस्पतालों, मेडिकल कॉलेजों, सुपर स्पेसिलिटी संस्थानों का केन्द्र राजधानियां और बड़े शहर ही रहे हैं। आज भी ग्रामीण इलाकों में जो प्राथमिक और सामुदायिक स्वास्थ्य केन्द्र हैं वे सामान्य मरीजों की जरूरतें भी पूरी नहीं करते हैं। अक्सर वहां डाक्टर, स्टाफ और दवाएं तक उपलब्ध नहीं रहते हैं। यह विडम्बना ही है कि इन स्वास्थ्य केन्द्रों की तुलना में आम ग्रामीण झोला छाप डाक्टरों के पास ज्यादा जाता है जो उसे और ज्यादा बीमार ही बनाते हैं। नतीजा यह कि शहरों के अस्पताल दूर-दराज तक के मरीजों से भरे रहते हैं वहां हमेशा डाक्टरों, स्टाफ जांच सुविधाओं से लेकर बिस्तर तक की कमी पड़ जाती है।

दिल्ली का एम्स देख लीजिए या लखनऊ का पीजीआई, वहां रेलवे स्टेशनों की तरह भीड़ आखिर क्या साबित करती है? डाक्टर चाह कर भी हर मरीज पर उतना ध्यान नहीं दे सकते जितनी जरूरत होती है। अनुपलब्ध डाक्टरों, बरामदों तक में बेहाल पड़े मरीजों, खराब मशीनों, टूटे स्ट्रेचर-बेड, चिड़चिड़े स्टाफ जैसी ज्यादातर शिकायतें मरीजों के इसी बढ़ते बोझ का नतीजा नहीं हैं क्या?

राष्ट्रीय ग्रामीण स्वास्थ्य मिशन, उत्तर प्रदेश, की वेबसाइट के अनुसार प्रदेश में 5,172 पीएचसी की जरूरत है, जबकि सिर्फ 3692 ही मौजूद हैं। ग्रामीण इलाकों में सीएचसी व पीएचसी और एएनएम द्वारा संचालित कुल केन्द्रों की संख्या करीब 24,728 है, जबकि आबादी के मुताबिक 37,502 केन्द्र्र होने चाहिए। मौजूदा स्वास्थ्य केन्द्रों पर टेक्निकल स्टाफ की भी भारी कमी है। इन केन्द्रों के लिए करीब 16226 कर्मचारी (स्टॉफ नर्स, लैब टेक्निशियन, एक्स-रे और पैरामेडिकल स्टॉफ ) होने चाहिए, जबकि पूरे प्रदेश में सिर्फ 10,226 ही कार्यरत हैं। प्रति 10 लाख की आबादी पर उ.प्र. में 3.87 सामुदायिक चिकित्सा केन्द्र्र हैं। राष्ट्रीय औसत 4.43 का है। मार्च, 2014 में सामुदायिक केन्द्रों और जिला अस्पतालों में प्रति 10 लाख की आबादी के लिए उत्तर प्रदेश में 2.91 विशेषज्ञ डाक्टर थे। ज्ञातव्य है कि 2010 में इंडियन पब्लिक हेल्थ स्टैंडर्ड बना था, जिसके मुताबिक प्रदेश के 831 विकास खण्डों में अरबों रुपये खर्च कर सामुदायिक स्वास्थ्य केन्द्रों की इमारतें बना दी गईं लेकिन तात्कालिक दावों के मुताबिक प्रत्येक केन्द्र पर चार गाइनेकोलाजिस्ट, चार पीडियाट्रीशियन और चार एनस्थेटिस्ट की नियुक्ति नहीं हुई। एक अनुमान के मुताबिक सरकार की नीतियों के चलते ही हर वर्ष सूबे के मेडिकल कॉलेजों से 760 विशेषज्ञ डाक्टर निकलते हैं, ज्यादा से ज्यादा सौ सरकारी चिकित्सालयों में आकर सेवा देना पसन्द करते हैं।

दीगर है कि इमारतें और मशीनें इलाज नहीं करती, इलाज मानव संसाधनों से होता है शायद तभी, दो वर्ष से कम आयु के छोटे बच्चों का टीकाकरण, जोकि एक बुनियादी सेवा है, जिस पर बाकी सभी स्वास्थ्य सेवाएं आधारित होती हैं, के राष्ट्रीय स्तर पर 44 प्रतिशत सम्पन्न होने के सापेक्ष उत्तर प्रदेश में सिर्फ 23 प्रतिशत है। क्या इस एक उदाहरण से यह निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता कि उत्तर प्रदेश की सरकारी स्वास्थ्य सेवाएं राष्ट्रीय औसत की आधी दर पर काम कर रही हैं? सरकारी स्वास्थ्य सेवाओं की मौजूदा हालत का अन्दाजा शिशु मृत्यु दर से भी लगाया जाता है। देश के सबसे बड़े प्रदेश में शिशु मृत्यु दर 73 प्रति हजार है, जो राष्ट्रीय औसत 57 से कहीं ज्यादा है।

गर्भवती महिलाओं की देखभाल व प्रसूति के हालात से भी हम सरकारी स्वास्थ्य सेवाओं की जांच कर सकते हैं। उत्तर प्रदेश में सिर्फ 22 प्रतिशत गर्भवती महिलाएं अपने बच्चों को सरकारी अस्पतालों या प्राथमिक चिकित्सा केन्द्रों पर जन्म देती हैं। बाकी सभी (78 प्रतिशत) गर्भवती महिलाएं प्रसूति के लिए अनपढ़ दाइयों या परिजनों पर निर्भर करती हैं। प्रसव के दौरान मृत्यु का शिकार होने वाली महिलाओं की संख्या यानि मातृ मृत्यु दर 400 प्रति एक लाख है।

उत्तर प्रदेश में हर घंटे निमोनिया से 11 बच्चे मर रहे हैं। प्रदेश में निमोनिया खासा खतरनाक स्थिति में है। यहां हर वर्ष पैदा होने वाले 50 लाख बच्चों में से पांच लाख की मृत्यु उनके पांच साल का होने से पहले हो जाती है। इनमें भी 17 प्रतिशत की मौत निमोनिया के कारण होती है। स्वास्थ्य विभाग के आंकड़ों के अनुसार प्रदेश में हर साल कुल मिला कर 53 लाख बच्चों को निमोनिया होता है, जिनमें से सही देखभाल के अभाव में लगभग छह लाख बच्चे गम्भीर स्थिति में पहुंच जाते हैं। इनमें भी 89,196 की सांसें निमोनिया के कारण थम जाती हैं। इस तरह हर दिन 248 और हर घंटे 11 बच्चे निमोनिया से कालकवलित हो जाते हैं। उत्तर प्रदेश में कुपोषित बच्चों की संख्या लगातार बढ़ती जा रही है। हालात ये हैं कि राज्य का हर दसवां बच्चा कुपोषित व हर बीसवां बच्चा अत्यधिक कुपोषित है।

हाल ही में आये राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण के आंकड़े बताते हैं कि देश के हर आठ कम वजन वाले बच्चों में एक बच्चा उत्तर प्रदेश का होता है। इसी तरह बौनेपन के शिकार देश के सात बच्चों में से एक और सूखेपन के शिकार 11 में एक बच्चा उत्तर प्रदेश का होता है। उत्तर प्रदेश में 42.4 प्रतिशत बच्चे कम वजन के हैं, वहीं 56.8 प्रतिशत बौने और 14.8 प्रतिशत सूखेपन के शिकार हैं। हर दसवां बच्चा कुपोषण का शिकार है। 5.1 प्रतिशत तो अत्यधिक कुपोषण के शिकार हैं। ऐसे में हर बीसवां बच्चा अत्यधिक कुपोषण का शिकार है, जो उत्तर प्रदेश के लिए चुनौती बना हुआ है। बच्चों का कुपोषण भी उनकी मौत का बड़ा कारण है, क्योंकि कुपोषण से प्रतिरोधक क्षमता कम हो जाती है और उपयुक्त विकास भी नहीं हो पाता।

उत्तर प्रदेश के पास बिहार से कहीं ज्यादा सरकारी अस्पताल हैं, फिर भी बिहार की तुलना में उत्तर प्रदेश के स्वास्थ्य सम्बन्धी आंकड़े निराशाजनक तस्वीर दिखाते हैं।

महिला एवं बाल कल्याण मंत्रालय की सालाना रिपोर्ट के अनुसार लगभग इंटीग्रेटेड चाइल्ड डेवलपमेंट सर्विस (आईसीडीएस) में 3000 करोड़ रुपये लगा देने के बाद भी उत्तर प्रदेश में कुपोषण के सबसे अधिक मामले मिले हैं। इस रिपोर्ट के अनुसार आईसीडीएस के लाभान्वित बच्चों में से 35.5 प्रतिशत शून्य से छह साल तक की आयु के बच्चे औसत वजन से कम वजन के मिले, इसके अलावा 67 हजार से भी अधिक बच्चे अत्यधिक कुपोषित की श्रेणी में आते हैं। इन आंकड़ों की भयावहता का अन्दाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि इस वक्त उत्तर प्रदेश में दो करोड़ से ज्यादा बच्चे और पचास लाख से ज्यादा मातायें आईसीडीएस से लाभान्वित हो रही हैं।

प्रदेश के नौकरशाह और सत्ता में बैठे लोग, चाहे वे किसी पार्टी के हों, अक्सर आबादी के अनुपात में अस्पतालों, डाक्टरों और नर्सों की संख्या कम होने की चर्चा करते देखे जाते हैं पर आंकड़े बताते हैं कि उत्तर प्रदेश की सार्वजनिक स्वास्थ्य सेवाओं के पास ढांचागत संसाधनों की कमी उतनी नहीं है, जितनी की अव्यवस्था। संसाधनों का अनुमान लगाने का एक आम तरीका है कि एक सरकारी अस्पताल कितनी आबादी को स्वास्थ्य सेवाएं प्रदान करता है। इसका राष्ट्रीय औसत प्रति अस्पताल 1.45 लाख व्यक्ति है, उत्तर प्रदेश का औसत 1.98 लाख व्यक्ति, जबकि बिहार का औसत 8.7 लाख व्यक्ति है।

उत्तर प्रदेश के पास बिहार से कहीं ज्यादा सरकारी अस्पताल हैं, फिर भी बिहार की तुलना में उत्तर प्रदेश के स्वास्थ्य सम्बन्धी आंकड़े निराशाजनक तस्वीर दिखाते हैं। उत्तर प्रदेश में आम लोगों के स्वास्थ्य की बिगड़ती हालत को प्रदेश में गरीबी की समस्या से जोड़ कर देखना जरूरी है। गरीबी और बीमारी में चोली-दामन का साथ होता है। गरीब ज्यादा बीमार पड़ते हैं और बीमारी उनकी गरीबी को और बदहाल करती है।

नेशनल सैंपल सर्वे के अनुसार, उत्तर प्रदेश, देश के उन छह राज्यों में से एक है, जहां पिछले 30 वर्षों में गरीबों की संख्या में कमी नहीं आई है। प्रति व्यक्ति सार्वजनिक चिकित्सा व्यय की दृष्टि से उत्तर प्रदेश देश के राज्यों की सूची में काफी नीचे है। नतीजतन गरीब लोगों का यहां चिकित्सा पर प्रतिव्यक्ति निजी खर्च 92 प्रतिशत है, जो राष्ट्रीय औसत 79 प्रतिशत से कहीं ज्यादा है। उत्तर प्रदेश में सार्वजनिक स्वास्थ्य के अलावा आर्थिक और सामाजिक विकास के अन्य सभी पैमाने निराशाजनक तस्वीर प्रदर्शित करते हैं। अधिकांश आर्थिक अनुसंधानों में उत्तर प्रदेश को देश के विकसित राज्यों की सूची में 14वां या 15वां स्थान मिलना इस कटु सत्य का प्रमाण है कि उत्तर प्रदेश की सेहत ठीक नहीं है।

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