'सुई-नश्तर' के पाठकों की तलाश

हास्य/व्यंग्य

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डमरू ने किताब लिख तो ली, छपवा भी ली, अब लोग उसे पढ़ेंगे कैसे, और उसके महान विचारों का पूरे दिग-दिगंत में हाहाकार कैसे मचेगा, इसी फेर में दुबला होते-होते सूख कर कांटा हुआ जा रहा है वह इन दिनों।

तीर-ए-नज़र...

"डमरू एक दिन अपने कवि-कुल-गुरु का शरणागत हो लिया। आशीर्वाद के साथ आज्ञा मिली- 'हे शिष्य, झटपट बस अब चटपट इसे छपवा ही डालो। भले बाबूजी की तिजोरी चट करनी पड़े।"

धूमिल के 'मोचीराम' को पढ़ने के बाद डमरू ने पहली कविता लिखी.... 'सुई'। दूसरी कविता का शीर्षक रखा- 'पत्ती' (ब्लेड)। 'नश्तर' लिख ही रहा था कि रात भर के जगे-अलसाये पिता की नजर पड़ गई उस पर। बरसते हुए बोले- 'अच्छा, तो पढ़ाई-लिखाई छोड़कर कविताई हो रही है!'

डमरू प्रसिद्ध होना चाहता है। प्रसिद्धि की भूख ने उसके रोजमर्रा की इतनी ऐसी तैसी कर रखी है कि चिंता से चश्मे का नंबर भी काफी दुबला हो गया है। जेब में पैसा नहीं कि दूसरा नंबर ले ले। पिछले कई वर्षों से वह फरवरी की सूखी सर्दियों में दिल्ली के पुस्तक मेले जरूर हो आता है। पिता रेलवे में अधिकारी थे। तुकबंदी करते थे। बचपन से ही उसे भी कविता का शौक लगा गए। सो दसवीं तक आते-आते लगा तुक्कड़ तान तोड़ने। जिंदगी तानपूरे से झनझनाने लगी। दे कविता, ले कविता, और कुछ सूझे ही नहीं जिंदगी में।

धूमिल के 'मोचीराम' को पढ़ने के बाद डमरू ने पहली कविता लिखी.... 'सुई'। दूसरी कविता का शीर्षक रखा- 'पत्ती' (ब्लेड)। 'नश्तर' लिख ही रहा था कि रात भर के जगे-अलसाये पिता की नजर पड़ गई उस पर। बरसते हुए बोले- 'अच्छा, तो पढ़ाई-लिखाई छोड़कर कविताई हो रही है!'

उसके कुछ माह बाद डमरू गांव-जवार के ठेठ मुहावरे जुटाने लगा। अच्छा-खासा संग्रह हो गया तैयार। आखिरी के पन्नों पर 'सुई'-'पत्ती'-'नश्तर' वाली कविताएं भी। साहित्य-साधना के जंगल-झुरमुट में दिन बीतते गए, बीतते गए। आखिरकार, वह एक दिन अपने कवि-कुल-गुरु का शरणागत हो लिया। आशीर्वाद के साथ आज्ञा मिली- 'हे शिष्य, झटपट बस अब चटपट इसे छपवा ही डालो। भले बाबूजी की तिजोरी चट करनी पड़े।'

डमरू ऐसा न करता तो अब छपाई के पैसे कहां से आते! मम्मी का शरणागत हुआ। वात्सल्य प्रलाप के बाद वह भी जुगाड़ हो गया। टीटी पापा सप्ताह भर में एक सैकड़ा यात्रियों को मूस लाए थे। छप गई किताब।

इन दिनों डमरू को 'मुहावरेदार सुई-नश्तर' के पाठकों का बड़ी बेसब्री से इंतजार है!

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पत्रकार/ लेखक/ साहित्यकार/ कवि/ विचारक/ स्वतंत्र पत्रकार हैं। हिन्दी पत्रकारिता में 35 सालों से सक्रीय हैं। हिन्दी के लीडिंग न्यूज़ पेपर 'अमर उजाला', 'दैनिक जागरण' और 'आज' में 35 वर्षों तक कार्यरत रहे हैं। अब तक हिन्दी की दस किताबें प्रकाशित हो चुकी हैं, जिनमें 6 मीडिया पर और 4 कविता संग्रह हैं।

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