थॉमस हिरकॉक की साइकिल, जो बदल रही है बच्चों की ज़िंदगी

- झारखंड बिहार के इंटीरियर इलाकों में गरीबों को देख थॉमस के मन में जागा सेवा का भाव।-साईकिल वितरण के जरिए बच्चों को स्कूल जाने के लिए कर रहे हैं प्रोत्साहित।- पहले दस साइकिलें बांटी। उसके बाद सिलसिला चलता गया। अब तक बांट चुके हैं 400 साइकिल।

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थॉमस हिरकॉक जब 12 वर्ष के थे तब वे पहली बार अपने पिता के साथ भारत आए। उनके पिता डेविड भारत में बचपन बचाओ आंदोलन से जुड़े थे। जब थॉमस ने यहां आकर बच्चों को देखा और यहां की गरीबी देखी तो वे हैरान रह गए। वे झारखंड और बिहार के इंटीरियर में अपने पिता के साथ घूमे। जहां मात्र 20 प्रतिशत साक्षरता दर थी और इनमे से भी अधिकांश लड़कियां तो कभी स्कूल तक नहीं गई थीं।

झारखंड में घने जंगल हैं और यहां काफी खदाने भी हैं। घने जंगलों के कारण ग्रामीण लोगों को आने-जाने में काफी दिक्कत होती है। क्योंकि इन जंगलों में खतरनाक जंगली जानवर भी हैं। बच्चों के लिए खासकर लड़कियों के लिए यह काफी दिक्कत भरा था क्योंकि सबसे पहले तो वहां के लोग ही लड़कियों को ज्यादा पढ़ाने के पक्ष में नहीं थे। साथ ही स्कूल भी गांवों से काफी दूरी पर थे, बच्चों को स्कूल के लिए लगभग 10-15 किलोमीटर का सफर तय करके जाना होता था। जंगली जानवर तो थे ही साथ ही पिछले कुछ वर्षों में बच्चों के खासकर लड़कियों की ट्रैफिकिंग भी हो रही थी जिन कारणों से लोग अपने बच्चों को स्कूल भेजने से कतरा रहे थे। इन परेशानियों और घटनाओं को जानकर थॉमस बहुत दुखी हुए और उन्होंने बच्चों के लिए कुछ करने का मन बनाया। जब उन्होंने बच्चों से पूछा कि उन्हें क्या चाहिए? तो ज्यादातर बच्चों का एक ही जवाब था, साइकिल। उसके बाद थॉमस अपने देश वापस गए और अपने मित्रों के साथ मिलकर फंड जुटाने में लग गए ताकि बच्चों की मांग को पूरा किया जा सके। कुछ समय में थॉमस और उनके मित्रों ने साइकिल के लिए लगभग 600 डालर तक फंड जुटा लिया। इस धनराशि से उन्होंने सन 2008 में दस साइकिल खरीदीं। इस सफलता ने उन्हें गरीबों के लिए कुछ करने के लिए और प्रेरित व प्रोत्साहित किया। उसके बाद उन्होंने विभिन्न तरीकों से फंड जुटाना शुरु किया और बच्चों को साइकिल देने का कार्यक्रम चलाते रहे। जिसके परिणाम स्वरूप वे अभी तक 400 साइकिल बच्चों में बांट चुके हैं। इन साइकिलों का इस्तेमाल बच्चे स्कूल जाने के लिए करते हैं और आसानी से स्कूल पहुंच जाते हैं। साइकिल होने से बच्चों के लिए अन्य काम करने भी अब आसान हो गए हैं। उनके लिए अब कहीं भी आना-जाना आसान हो गया है। इन साइकिलों ने बच्चों की जिंदगी आसान बना दी है साथ ही इससे स्कूल जाने वाले बच्चों की संख्या भी बढ़ी है। यह साइकिलें भारत ही बनी हैं और इस प्रकार डिज़ाइन की गईं हैं कि जंगल के कठिन रास्तों पर भी आसानी से चलाई जा सकें। साइकिल में एक टूल किट भी रखी गई है। साथ ही यह साइकिलें इतनी मजबूत हैं कि एक साथ चार व्यक्ति इसमें बैठ सकें।

कई ऐसे भी बच्चे थे जिन्हें साइकिल चलानी नहीं आती थी। ऐसे में थॉमस ने तय किया कि वे उन्हें पढ़ाएंगे और इस प्रकार उन्होंने बच्चों को पढ़ाना भी शुरु कर दिया।

थॉमस का यह प्रयास बेहद सराहनीय है। थॉमस के प्रयासों ने यह संदेश भी दिया कि महज स्कूल खोल देना ही काफी नहीं, केवल इसी से शिक्षा का स्तर सुधारा नहीं जा सकता। बल्कि इस प्रकार के छोटे-छोटे लेकिन बेहद महत्वपूर्ण कार्य भी साथ में करने होंगे। तभी बच्चे स्कूल तक पहुंच सकेंगे।

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