सेवानिवृत्त अध्यापक ने पत्नी की मौत के बाद हाथियों के संरक्षण अभियान को बना लिया जीवन का उद्देश्य

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शंकराशान जेना को अपनी पत्नी के हत्यारे से कोई नफ़रत नहीं है, बल्कि वो ओडिशा के जोरांडा स्थित जंगलों में उन हाथियों की रक्षा में लगे हुए हैं। इस काम के लिए वे लोगों के खिलाफ संघर्ष भी कर रहे हैं। 62 वर्षीय शंकराशान कालेज में प्राध्यापक पद से सेवानिवृत्त हुए हैं।

अपनी पत्नी को हाथियों के कारण खो चुके शंकराशान को उन्हीं हाथियों से लगाव हो गया, जो किन्हीं कारणों से हिंसक हो गये हैं। हाथियों की हिंसा के कारण ही उनकी पत्नी की मौत हो गयी थी, लेकिन वे इस घटना से निराश नहीं होते। कहते हैं,

'जन्म एवं मृत्यु तो भगवान के हाथ है और हम सब उस के साधन हैं। मैं पूरे हाथी समाज को उस घटना के लिए जिम्मेदार नहीं ठहराया जा सकता। क्या लोग दुर्घटना का शिकार होने के डर से सड़क के किनारे चलना बंद कर देंगे? अगर मैं इस कारण हाथियों से नफरत करने लगूँ कि उनके कारण मेरी पत्नी की मौत हुई है, तो मैं दुनिया का सब से बड़ा बेवकूफ़ हूँगा।'

साभार हिंदु
साभार हिंदु


1 जनवरी 2013 को एक भटके हुए जंगली हाथी ने शंकराशान की पत्नी पर हमला किया था। शंकराशान ने वह खौफनाक मंज़र अपनी आँखों से देखा था। दोनों पति पत्नी धेनकेनाल जिले के जोरांडा में मॉर्निंग वॉक पर निकले थे। हाथी के हमले में घायल उनकी पत्नी बच नहीं सकीं। शंकराशान कुछ दिन तक दुखी रहे और फिर उन्होंने हाथियों के संरक्षण लिए काम करना शुरू किया।

अध्यापन के साथ साथ शंकराशान हाथियों के संरक्षण के लिए जागरूकता अभियान चलाते हैं। उनके जोरांडा कॉलेज के छात्रों ने भी अपना नाम नेशनल सर्विस स्कीम(एनएसएएस) में पंजीकृत किया है और अपने गुरू के साथ काम कर रहे हैं।

शंकराशान बताते हैं कि हाथी बहुत सुंदर प्राणी है और यह हमारे धर्म, परंपरा और ऐतिहासिक जीवन का प्रेरक भाग भी है।ओडिशा में हाथी काफी बड़ी संख्या में हैं। हालाँकि पिछले दशक में मानवीय हस्तक्षेप के कारण उन्हें ख़तरा रहा है और हाथियों की हिंसा की घटनाएँ भी सामने आयीं थीं, लेकिन शंकराशान मानते हैं कि मनुष्य हाथी से अधिक हिंसक हैं। हाथी अपने इलाकों से वंचित होने तथा उचित भोजन न मिलने के कारण कुछ हिंसक हो जाते हैं।

शंकराशान के प्रयासों में ओडिशा के इन इलाकों में सरकारी स्तर पर और आम लोगों में भी जागरूकता बढ़ी है। वे कहते हैं, जब मैंने देखा कि हाथी के हमले में पत्नी की मौत के बावजूद मैंने हाथियों की रक्षा के लिए कदम उठाया है तो लोग इससे काफी प्रेरणा ले हरे हैं। शंकराशान गाँव-गाँव जाते हैं, लोगों को हाथियों के संरक्षण के बारे में समझाते हैं।

उल्लेखनीय है कि पीछले 5 वर्षों में जोरांडा में ही हाथियों की हिंसा के कारण 15 लोगों की मौत हुई है, लेकिन दूसरी ओर मानव और हाथी संघर्ष, में हर साल ओडिशा में 60 से 70 हाथी और लोग मारे जाते हैं। 

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