छत्तीसगढ़ के नक्सल प्रभावित इलाकों में वीडियो लेक्चर से संवर रहा बच्चों का भविष्य

छत्तीसगढ़ के वो आधुनिक स्कूल जहां टीचर्स से नहीं वीडियो लेक्चर्स से अपना भविष्य संवार रहे हैं छात्र...

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यह लेख छत्तीसगढ़ स्टोरी सीरीज़ का हिस्सा है...

छत्तीसगढ़ के नक्सल प्रभावित इलाके में वीडियो लेक्चर से बच्चों के भविष्य को काफी खूबसूरती से संवारने का काम किया जा रहा है। यह काम कांकेर जिले के 100 से अधिक स्कूलों में हो रहा है। योरस्टोरी टीम ने जिले के गिरहौला हाई स्कूल का दौरा किया। स्कूल में पहुंचते ही आंखों के सामने एक ऐसा चित्र उभरता है, जो आधुनिक शिक्षा का बेहतरीन उदाहरण प्रस्तुत करता है।

क्लासरूम में पढ़ाई करते बच्चे
क्लासरूम में पढ़ाई करते बच्चे
शिक्षा के क्षेत्र में टेक्नोलॉजी का सही उपयोग कैसे किया जाए ये छत्तीसगढ़ के कांकेर जिले के स्कूलों से सीखा जा सकता है। यहां जिन बच्चों को अच्छी पढ़ाई नसीब नहीं होती थी, वे आज अच्छे भविष्य के सपने देख रहे हैं। इसके लिए वे अधिकारी भी काबिल-ए-तारीफ हैं, जिन्होंने इस बदलाव की जिम्मेदारी उठाई, साथ ही यहां के स्कूल और बच्चे जिन्होंने बढ़-चढ़ कर इसका स्वागत किया और अपनाया।

कितना अच्छा हो कि एक ऐसी रोशनी हो, जिसमें नहा कर देश का हर बच्चा शिक्षा की मशाल जला सके। मौजूदा हालात में पूरे देश की बात करना तो मुश्किल है, लेकिन बात जब छत्तीसगढ़ के एक नक्सल प्रभावित इलाके की हो, तो ये सपना सच होता नज़र आता है। इस नक्सल प्रभावित इलाके में वीडियो लेक्चर से बच्चों के भविष्य को काफी खूबसूरती से संवारने का काम किया जा रहा है। यह काम कांकेर जिले के 100 से अधिक स्कूलों में हो रहा है। योरस्टोरी टीम ने जिले के गिरहौला हाई स्कूल का दौरा किया। स्कूल में पहुंचते ही आंखों के सामने एक सुंदर सा चित्र उभर आता है।

फूलों और हरियाली से घिरे इस सरकारी स्कूल में 9वीं कक्षा के बच्चे काफी ध्यान लगाकर ब्लैक बोर्ड के पास लगे परदे पर पड़ रही लाइट की तरफ देख रहे हैं। इस चमकती लाइट के सहारे बच्चे अपनी जिंदगी को चमकाने के ख्वाब भी देख रहे हैं। ये लाइट दरअसल प्रॉजेक्टर से आ रही है जो उनके मुश्किल विषयों को आसान बनाने के लिए लगाई गई है। कक्षा में अध्यापक भी होते हैं लेकिन वे चुप होकर सिर्फ बच्चों पर नजर रखते हैं और लेक्चर खत्म होने के बाद बच्चों की दुविधाओं को हल करते हैं। कुछ साल पहले तक यहां सरकारी स्कूल में पढ़ने वाले बच्चों के लिए अच्छी शिक्षा हासिल करना नामुमकिन सा लगता था, क्योंकि दूरस्थ इलाकों में अक्सर अच्छे अध्यापकों की कमी रहती थी।

वीडियो के सहारे नक्सल प्रभावित इलाकों के बच्चों को पढ़ाने का सिलसिला यहां की डीएम रह चुकीं शम्मी आबिदी ने प्रयोग के तौर पर 'प्रज्ञा वीडियो लेक्चर' की शुरुआत की थी। उन्होंने कई अच्छे टीचर्स की मदद से महत्वपूर्ण विषयों के लेक्चर तैयार करवाए और उन्हें वीडियो पर रिकॉर्ड करवाया। इन वीडियो को स्कूलों में टीवी और प्रॉजेक्टर के माध्यम से दिखाया जाने लगा। उनकी मंशा थी कि ग्रामीण इलाकों में अच्छे अध्यापकों की कमी को पूरा किया जा सके।

प्यारा और खूबसूरत स्कूल
प्यारा और खूबसूरत स्कूल

यह पहल जिले के सौ से भी ज्यादा स्कूलों में चल रही है। इससे इतना बदलाव आया है कि पहले अच्छी पढ़ाई का सपना देखने वाले बच्चे अब प्रदेश के टॉपर बन रहे हैं और बाकी छात्र उनके जैसा बनने के ख्वाब देख रहे हैं। कांकेर के सौ से अधिक हायर सेकेंड्री व हाई स्कूलों में प्रज्ञा वीडियो लेक्चर का प्रयोग किया जा रहा है। अब तक लगभग 1500 वीडियो तैयार करवाए जा चुके हैं। यह प्रयास इतना सफल हुआ, कि बाकी जिलों के स्कूलों ने भी इसे अपनाना शुरू कर दिया।

ज्ञान से भरा हुआ इंसान हमेशा एक खास तरह के आत्मविश्वास ने लबरेज नज़र आता है और यही बात यहां के बच्चों में देखने को मिलती है। 'प्रज्ञा वीडियो लेक्चर' ने बच्चों के ज्ञान को बढ़ाने के साथ-साथ उनके व्यक्तित्व को भी निखारने का काम किया है। 'प्रॉजेक्ट प्रज्ञा' के तहत 10वीं, 11वीं और 12वीं कक्षा में पढ़ने वाले बच्चों के लिए अंग्रेजी, विज्ञान और गणित जैसे कठिन माने जाने वाले विषयों को अच्छे से समझाने की कोशिश की गई है। कई बच्चे इससे लाभान्वित हुए और अभी भी लाभान्वित हो रहे हैं।

योरस्टोरी से बात करते हुए स्कूल के प्रधानाचार्य ने कहा, कि 'वीडियो को इस तरह से तैयार किया गया है कि उसमें 6ठवीं से लेकर 10वीं और 12वीं तक की सारी जानकारी बच्चों को आसानी से एक ही जगह मिल जाए।'

टॉपर्स की लिस्ट
टॉपर्स की लिस्ट

प्रज्ञा कार्यक्रम के तहत 10वीं से लेकर 12वीं तक के कोर्स डिजाइन किए गए हैं। इसके अलावा जिन बच्चों की विषय पर बुनियादी पकड़ नहीं होती उनके लिए 6ठवीं से लेकर 10वीं तक के सिलेबस को रिकॉर्ड करवाया जाता है। इससे बच्चों का बेस काफी मजबूत हो जाता है। इन वीडियोज़ को यूट्यूब पर भी अपलोड करवा दिया गया है, ताकि बच्चे घर जाकर स्मार्ट फोन पर भी चाहें तो पढ़ाई कर सकें। 

दूसरे जिलों के स्कूलों ने यहां से वीडियो की सीडी या हार्ड डिस्क ले जाकर अपने यहां इसे शुरू किया। इससे बच्चों का भविष्य संवर रहा है। बच्चों का कहना है कि अगर उन्हें वीडियो की सुविधा नहीं मिलती तो उनका भविष्य अंधकार में चला जाता। 

इस स्कूल के प्रधानाचार्य कहते हैं, कि 'कई सारे इलाके ऐसे हैं जहां पर शिक्षक नहीं आना चाहते हैं। उस स्थिति में ये वीडियो काफी लाभदायक साबित हो रहे हैं। ये बहुत अच्छी बात है कि जो इलाका आज से कुछ साल पहले तक पिछड़े इलाकों में गिना जाता था, वहां 2016-17 के हाई स्कूल बोर्ड एग्जाम में गिरहौला स्कूल के तीन बच्चों ने टॉप टेन में अपनी जगह बना ली।'

ब्लैक बोर्ड के पास लगी टीवी स्क्रीन
ब्लैक बोर्ड के पास लगी टीवी स्क्रीन

यहां के टिकेश कुमार देवांगन ने 96.67 प्रतिशत हासिल कर प्रदेश में सातवां स्थान हासिल किया वहीं उदित कुमार देवांगन ने 96.17 प्रतिशत के साथ 10वां स्थान और राहुल कुमार साहू ने 96 प्रतिशत अंक हासिल किए। पूरे प्रदेश में भी रिजल्ट में काफी सुधार आय़ा है। 2017 की परीक्षा में 12वीं का रिजल्ट 85 प्रतिशत हो गया है और यह सबकुछ मुमकिन हो पाया शिक्षा के प्रति जागरुकता की वजह से।

शिक्षा के क्षेत्र में टेक्नोलॉजी का सही उपयोग कैसे किया जाए ये इन स्कूलों से सीखा जा सकता है। जिन बच्चों को अच्छी पढ़ाई नसीब नहीं होती थी वे भी आज अच्छे और सुनहरे भविष्य के सपने देख रहे हैं। इसके लिए वे अधिकारी भी काबिल-ए-तारीफ हैं, जिन्होंने इस बदलाव की जिम्मेदारी उठाई, साथ ही यहां के स्कूल और बच्चे जिन्होंने बढ़-चढ़ कर इसका स्वागत किया और इसे अपनाया। 

उम्मीद की जानी चाहिए कि छत्तीसगढ़ के ये मेहनती बच्चे आने वाले समय में अपना भविष्य संवारने के साथ-साथ अपने समाज, प्रदेश और देश का नाम भी रौशन करेंगे।

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