'लाल सोना' से एक साल में ये गांव कमाता है एक अरब

यूपी के अनोखे गांव की कहानी: टमाटर की खेती से गाँव बन गया अरबपति...

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टमाटर से अमीर हुए सलारपुर खालसा के किसान इसे 'लाल सोना' कहते हैं। वे भला ऐसा कहें भी क्यों नहीं, जबकि इसकी फसल से वह चार-पांच माह में ही एक अरब रुपए तक की कमाई कर लेते हों। यह गांव कभी कुश्ती-पहलवानी के लिए जाना जाता था, अब यहां का 'लाल सोना' ही पूरे बाजार पर छाया हुआ है, जिसकी बदौलत गांव का हर घर कोठी बन चुका है।

सांकेतिक तस्वीर
सांकेतिक तस्वीर
यह गांव निकट अतीत में पांच माह के भीतर टमाटर से 60 करोड़ का कारोबार कर चुका है। यहां टमाटर की खेती की शुरुआत 1998 से हुई थी। उस समय अमरोहा निवासी अब्दुल रऊफ ने सबसे पहले टमाटर की खेती की थी।

इंडिया के अजब-गजब गांवों की भांति-भांति की दास्तानें तो हैरत में डालती ही रहती हैं, मसलन, महाराष्ट्र के जिला अहमदनगर स्थित गांव शनिशिंगनापुर गांव के किसी भी घर या दुकान में ताला-कुण्डी नहीं लगाई जाती है, कर्नाटक के गांव मुत्तुरु भी अपनी भिन्न पहचान को लेकर चर्चाओं में रहता हैं। इस गाँव की मातृभाषा संस्कृत है। एशिया का सबसे साफ़ सुथरा गाँव मेघालय का मावल्यान्नॉंग को भगवान का बगीचा नाम से जाना जाता है। राजस्थान के जैसलमेर जिले का कुलधरा गांव पिछले 170 सालों से वीरान पड़ा है। यहां के हज़ारों लोग एक ही रात में कहीं और चले गए थे और जाते जाते श्राप दे गए थे कि यहाँ फिर कभी कोई नहीं बस पायेगा। तब से गाँव वीरान पड़ा है।

हिमाचल के गांव मलाणा के निवासी खुद को सिकंदर के सैनिकों का वंशज मानते हैं। यहां पर भारतीय क़ानून नहीं चलता है। यहाँ की अपनी संसद है जो सारे फैसले करती है। यहाँ मुग़ल सम्राट अकबर की पूजा की जाती है। झारखंड का एक गांव है मैक्लुस्कीगंज। इसको मिनी लंदन भी कहा जाता है। जालंधर के गांव उप्पलां में अब लोगों की पहचान उनके घरों पर शिप, हवाईजहाज़, घोडा, गुलाब, कार, बस आदि आकरों में बनीं पानी की टंकियों से होती है। इस गांव के अधिकतर लोग विदेशों में रहते है।

इन अदभुत गांवों की पहचान से भिन्न सबसे मजेदार और प्रेरक दास्तान उत्तर प्रदेश के अमरोहा जिले के गांव सलारपुर खालसा की है, जहां के लोग मिलकर टमाटर की खेती से एक साल में एक अरब रुपए की कमाई कर लेते हैं। यहां के लोग टमाटर को 'लाल सोना' कहते हैं। यहां के पहलवान दो दशक पहले कुश्ती-पहलवानी छोडकर टमाटर खेती में कुछ इस कदर जुटे कि उनकी खेतीबाड़ी की पूरी दुनिया में चर्चा होने लगी। इस गांव की आबादी करीब साढ़े तीन हजार है। इस गांव में पिछले करीब बीस वर्षों से बड़े पैमाने पर टमाटर की खेती हो रही है। उसका क्षेत्रफल फैलता ही जा रहा है। आसपास के जमापुर, सूदनपुर तथा अंबेडकरनगर गांवों में भी देखादेखी टमाटर की खेती होने लगी है। एक जमाने में यह गांव पहलवानी में अपना लोहा मनवाता रहा था लेकिन जब कुश्ती और पहलवानी करने के लिए पैसे की जरूरत पड़ी तो अपने पास मौजूद जमीन में ग्रामीण हाथ आजमाने शुरू कर दिए। तभी से इसे टमाटर वाले गांव के नाम से भी जाना जाने लगा है।

देश के कोने-कोने में इस गांव ने अपने झंडे गाड़ दिए हैं। देश का शायद ही कोई कोना होगा, जहां पर सलारपुर खालसा की जमीन पर पैदा हुआ टमाटर न जाता हो। यह गांव निकट अतीत में पांच माह के भीतर टमाटर से 60 करोड़ का कारोबार कर चुका है। यहां टमाटर की खेती की शुरुआत 1998 से हुई थी। उस समय अमरोहा निवासी अब्दुल रऊफ ने सबसे पहले टमाटर की खेती की थी। उसके बाद टमाटर बीज और कीटनाशक बनाने वाली कंपनियों ने इस गांव की ओर रुख किया। कंपनी के अधिकारियों ने किसानों की ललक देखी तो उन्हें टमाटर की खेती के लिए प्रोत्साहित करने लगे। इसके बाद कंपनियों ने कुछ किसानों को राजस्थान और बेंगलुरू में ट्रेनिंग के लिए भेजा। बस उसके बाद से किसान टमाटर की खेती के बदौलत नाम और पैसा दोनों कमाने लगे।

अमरोहा जिले में करीब बारह सौ हेक्टेयर में टमाटर की खेती होती है। सलारपुर खालसा और इसके आसपास बसे तीन अन्य गांव जमापुर, सूदनपुर, अंबेडकरनगर में ही अकेले एक हजार हेक्टेयर में टमाटर की खेती हो रही है। यहां के किसान केवल टमाटर ही नहीं, बीज बेचकर भी कमाते हैं। जब पूरे उत्तर प्रदेश में डेढ़ क्विंटल टमाटर बीज की बिक्री हुई तो, उसमें अकेले सलारपुर खालसा में से ही 80 किलो बीज बिका। टमाटर की खेती करने वाले किसान जुल्फकार खां बताते हैं कि गांव में जब पहलवानी से भला नहीं हुआ और रोजी रोटी का संकट गहरा गया तो ग्रामीणों ने टमाटर की खेती शुरू की थी। आज गांव में चारों ओर खुशहाली है। यहां के हर ग्रामीण की किस्मत चमक उठी है। नासिर खां बताते हैं कि ग्रामीणों ने शरीर स्वस्थ रखने के लिए पहलवानी शुरू की थी। पहलवानी तो खूब हुई लेकिन सिर्फ ताकत से भला नहीं होने पर ग्रामीणों ने खेती करने का स्टाइल बदलकर टमाटर की खेती शुरू कर दी। आज गांव का हर घर पक्का है और एक साल में एक बीघे जमीन से एक लाख रूपये की बचत आसानी हो जाती है। यद्यपि आज भी यहां के लोगों ने पहलवानी नहीं छोड़ी है।

कारोबार के लिहाज से सलारपुर खालसा गांव तेजी से तरक्की कर रहा है। जब टमाटर की फसल पक कर तैयार हो जाती है और इसकी बिक्री शुरू होती है, तो जिले के 30 गांवों के लोग यहां काम करने दौड़ पड़ते हैं। दिहाड़ी पर काम करने वाला किसान, एक दिन में तीन-चार सौ रुपए की मजदूरी कर लेते हैं। बड़े ही नहीं, गांव के बच्चे और बुजुर्ग भी इसी काम में जुट जाते हैं। गौरतलब है कि भारत सब्जी उत्पादन में चीन के बाद दूसरे नंबर पर आता है। हमारे देश में करीब 15 लाख हेक्टेयर भूमि पर टमाटर की खेती की जाती है। सलारपुर खालसा के अलावा देश के अन्य क्षेत्रों में भी बड़े पैमाने पर टमाटर की खेती हो रही है।

जब-तब टमाटर के भाव आसमान छूने लगते हैं, सलारपुर खालसा की कमाई एक अरब रुपए तक पहुंच जाती है। ऐसा पिछले साल भी हो चुका है। वर्ष 2017 में दिल्ली के खुदरा बाजार में जब टमाटर का दाम 80 रुपये प्रति किलोग्राम की ऊंचाई पर पहुंच गया था, इस गांव की बांछें खिल उठी थीं। उस वक्त प्रमुख टमाटर उत्पादक राज्य कर्नाटक के बेंगलुरु में टमाटर का खुदरा दाम 45 से 50 रुपये प्रति किलोग्राम पर पहुंच गया था और मिजोरम के एजल में 95 से 100 रुपये किलो बिक रहा था, इस गांव के टमाटर की बेतहाशा मांग ने हर घर को अचानक अमीर बना दिया। उन दिनो मध्य प्रदेश में टमाटर की 90 प्रतिशत फसल खराब हो चुकी थी। दिल्ली में छह बड़ी मंडियों में रोजाना 225 से 250 टन टमाटर का कारोबार होता है, जिसमें भारी मात्रा में टमाटर सलारपुर खालसा से निर्यात होता है। पिछले साल सितंबर में जब पाकिस्तान अपने घरेलू बाजार में टमाटर की किल्लत झेल रहा था, उस समय भी इस गांव पर देश के कारोबारियों की निगाहें टिक गई थीं। उस समय इस पड़ोसी मुल्क में तीन सौ रुपए प्रति किलो टमाटर बिका था।

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पत्रकार/ लेखक/ साहित्यकार/ कवि/ विचारक/ स्वतंत्र पत्रकार हैं। हिन्दी पत्रकारिता में 35 सालों से सक्रीय हैं। हिन्दी के लीडिंग न्यूज़ पेपर 'अमर उजाला', 'दैनिक जागरण' और 'आज' में 35 वर्षों तक कार्यरत रहे हैं। अब तक हिन्दी की दस किताबें प्रकाशित हो चुकी हैं, जिनमें 6 मीडिया पर और 4 कविता संग्रह हैं।

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