एडवेंचरस ट्रेवेलिंग के दीवानों के लिए खास ‘एल्टीट्यूड सिंड्रोम’

0

एडवेंचर ट्रेवेल कंपनी, एल्टीट्यूड सिन्ड्रोम को इस साल की शुरुआत में 2 उत्साही ट्रेकर्स ने लॉन्च किया था, जिन्होंने अपने लक्ष्य के लिए कॉरपोरेट नौकरी छोड़ दी। इसके जरिए ये लोग उस तरह के ट्रेकिंग अनुभव को लोगों के लिए पेश करना चाहते हैं, जिसका उन्होंने खुद एहसास किया है।

व्यापार के लिए शुरुआती प्रतिक्रिया देखते हुए, उनकी नज़र अनुभवी और सामान्य दोनों किस्म के ट्रेकर्स पर थी। साल के पहले 6 महीनों मे, एल्टीट्यूड सिन्ड्रोम ने उत्तराखंड में 6 ट्रेक्स आयोजित किए और भूटान, उत्तराखंड और नेपाल में अगले सात प्रस्तावित हैं।

ये सब एक नाम के साथ शुरू हुआ

पिछले साल के अंत तक साजिश जीपी, जो कि एक ट्रेकर, ब्लॉगर और ट्रेनिंग कंपनी प्रॉमेटिस के सह-संस्थापक हैं, अपने छोटे से ऑफिस में काम कर रहे थे। उसी दौरान, उनके दिमाग में अचानक एल्टीट्यूड सिन्ड्रोम नाम बिजली की तरह चमका। वो कहते हैं, “ट्रेकिंग/एडवेंचर ट्रेवेल के क्षेत्र में कुछ करने की मैं सोच रहा था, तब तक मैं इसको लेकर गंभीर नहीं था। लेकिन जब उस शाम मुझे ये नाम सूझा, मुझे लगने लगा कि अब मुझे इसी नाम के साथ कुछ करना है और अपने सपनों का पीछा करना है। साजिश ने उसी वक्त ऑनलाइन चेक किया और ये देखकर हैरान रह गए कि डोमेन नेम मौजूद था। उन्होंने ये नाम एक बार में ही बुक कर लिया और उसके बाद पीछे मुड़कर नहीं देखा।

साजिश को एल्टीट्यूड सिन्ड्रोम के लिए एक उत्साही साझीदार अपने पुराने कॉलेज और ट्रेकिंग के साथी और प्रॉमेटिस के सह-संस्थापक रणदीप हरि के तौर पर मिल गया। रणदीप ने भी कॉरपोरेट की नौकरी छोड़ी थी और साजिश के साथ कई मौकों पर ट्रेकिंग कर चुका था, जिसका अनुभव भी अच्छा रहा था। उसने इस बात का भी ध्यान दिया कि जो लोग उनके साथ ट्रेकिंग कर चुके हैं, वो वापस आकर पूछते थे कि वे लोग फिर से कब एक साथ ट्रेकिंग कर सकते हैं। रणदीप कहते हैं, ‘इसलिए जब साजिश इस विचार के साथ सामने आया, मैं तुरंत इसमें शामिल हो गया। मैंने इसे एक मौके तौर पर देखा जिसमें मैं अपनी पंसद की चीज़ करते हुए नौकरी कर सकता हूं।’

सह संस्थापक साजिश सिंह और रणदीप हरि (बाएं से दाएं)
सह संस्थापक साजिश सिंह और रणदीप हरि (बाएं से दाएं)

पैसा वसूल प्रस्ताव – एक मजेदार, जिंदगी बदलने वाला अनुभव

साजिश के मुताबिक़, एल्टीट्यूड सिन्ड्रोम का व्यापार मॉडल विशुद्ध रूप से पहाड़ों के शौकीन ज्यादा से ज्यादा लोगों से जुड़ने के कंपनी के लक्ष्य पर आधारित है। कंपनी इस लक्ष्य को अपनी उस ड्राइविंग फिलॉस्फी के साथ प्राप्त करना चाहती हैं, जिसके मुताबिक़ ट्रेकिंग का मतलब अपनी सूची में महज एक गंतव्य स्थान दर्ज कर लेना नहीं है।

उनकी कुछ ख़ास बातें...

• लंबे यात्रा मार्ग जो खराब मौसम और अनुभवहीन ट्रेकर्स को भी मौका देते हैं: रणदीप कहते हैं, “हम सुनिश्चित करना चाहते हैं कि धीरे चलने वाला व्यक्ति भी ट्रेक का आनंद ले सके और इसे अपना गंतव्य बना सके। कई लोग सोचते हैं कि वो ट्रेकिंग पर नहीं जा सकते क्योंकि वो एक ख़ास आयु वर्ग में नहीं हैं या फिर वो उतने फिट नहीं हैं, जितना कि सामने वाला। जबकि, ट्रेक लकड़ियों पर एक पैदल यात्रा है और हम सबको ये महसूस कराना चाहते हैं कि अगर वो चाहें तो ट्रेकिंग कर सकते हैं।”

• छोटे आकार के समूह: साजिश कहते हैं, अपने अनुभव से हमने पाया है कि ज्यादातर ट्रेक के लिए 12 एक आदर्श संख्या है। हालांकि, हम ट्रेक के लिए कम-से-कम 5 और ज्यादा से ज्यादा 15 लोगों के समूह को लेते हैं। कंपनी का मानना है कि समूह का आकार छोटा करने से ट्रेकिंग का अनुभव ज्यादा मजेदार होता है (कल्पना कीजिए टॉयलेट टेंट के सामने 20 से 30 लोगों का लाइन लगाकर ठंड में खड़े होने पर कैसा लगेगा) और पर्यावरण के प्रभाव को भी कम करता है।

• सांस्कृतिक अनुभव: ज्यादातर ट्रेक की योजना स्थानीय उत्सवों के दौरान बनाई जाती है, या फिर ऐसी व्यवस्था की जाती है कि समूहों को स्थानीय लोगों के क़रीब जाने और उन्हें समझने का मौका मिल सके। .

• सहयोगी स्टाफ़ की चुनीं टीमें (गाइड, कुली, रसोइए आदि): एल्टीट्यूड सिन्ड्रोम ने हिमालय के विविध क्षेत्रों में सहयोगी टीमों के साथ करार किया है और दुनिया भर में नए गंतव्यों को खोजने के लिए रणनीतिक साझीदार की प्रक्रिया में है।

• विविध प्रकार के भोजन (ज्यादातर ट्रेक में मौजूद)

संस्थापक इस बात से सहमत हैं कि ये बातें एल्टीट्यूड सिन्ड्रोम की कीमत पर असर डालती हैं, लेकिन उनका कहना है कि उनके टूर एक औसत टूर ऑपरेटर से थोडे ही ज्यादा हैं, जबकि यूजर को ट्रेकिंग का एक बेहतरीन अनुभव प्रदान करते हैं। साजिश कहते हैं, “मौजूदा विकल्प या तो अत्यंत प्रीमियम हैं या फिर बजट, हम इन दोनों के बीच का विकल्प देते हैं, जिसमें 25 से 50 साल के प्रोफेशनल को एक आरामदेह और अत्यंत वास्तविक अनुभव मिल सके।”

एल्टीट्यूड सिन्ड्रोम पूर्व निर्धारित और अनुकूलित, दोनों तरह के ट्रेक व्यक्तियों, निजी समूहों या कंपनियों को ऑफर करता है।

शब्दों से बाहर निकल पाना

एल्टीट्यूड सिन्ड्रोम वर्तमान में अपनी वेबसाइट और फेसबुक पेज का मार्केटिग के लिए इस्तेमाल कर रही है। ये मौखिक प्रचार और उपभोक्ताओं से दोबारा मिलने वाले व्यापार पर भी आधारित है।

रोडमैप

साजिश और रणदीप अपने मॉडल को विदेशों के गंतव्य स्थलों में दोहराने पर काम कर रहे हैं। हालांकि, वर्तमान में उनकी नज़र हिमालय पर है। कंपनी भारत और इसके बाहर विभिन्न स्थानों पर अपनी टीम और नेटवर्क तैयार कर रही है और ज्यादा-से-ज्यादा सांस्कृतिक अनुभवों को लाने की योजना बना रही है। उदाहरण के लिए, उनका ये नया ऑफर है उत्तराखंड के दयारा बुग्याल में एक योगा ट्रेक। हालांकि, वो लोग व्यापार को एक निश्चित बिंदु से ऊपर बढ़ने को लेकर सावधान हैं। “हम एक बुटीक बिजनेस बने रहने का लक्ष्य रखते हैं। निजी ध्यान और अनुकूलन हमारे मुख्य पैसा वसूल प्रस्ताव हैं और अगर हम बहुत जल्द बहुत ज्यादा विस्तार करेंगे तो इनके खत्म होने का जोखिम रहेगा।”

फंडिंग: जहां दिल करे, वहां पैसा लगाना

एल्टीट्यूड सिन्ड्रोम वर्तमान में अपने निजी फंड और परिवार और मित्रों के सहयोग से वित्तपोषित है। साजिश कहते हैं, हमें खुशी है कि बहुत सारे लोग- दोस्त, परिवार और समर्थ उपभोक्ताओं ने कन्सेप्ट में विश्वास किया और सहयोग करना चाहते थे। कुछ निवेशक बोर्ड में भविष्य में कुछ फ्री ट्रेक्स के वादे के साथ शामिल हुए हैं, जबकि कुछ अन्य इस उद्यम का हिस्सा बनना चाहते थे क्योंकि उन्हे ये विचार पसंद था।

जहां तक भविष्य में फंडिंग की योजना है, रणदीप कहते हैं, “हम देखेंगे। हम सिर्फ इसलिए फंड नहीं जुटाना चाहते क्योंकि फंड मौजूद होना चाहिए। अगर किसी समय हमें बाहरी फंडिंग की ज़रूरत मालूम पड़ती है तो हम किसी ऐसे व्यक्ति की ओर देखेंगे जो ट्रवेलिंग में दिलचस्पी रखता हो। हम अब तक इस इंडस्ट्री मे रस्सी के सहारे आगे बढ़ना सीख रहे हैं और ये देखने के लिए कम-से-कम एक साल और लेना चाहते हैं कि हम किधर जा रहे हैं।” साजिश मुस्कान के साथ कहते हैं कि हम सही दिशा में जा रहे हैं, ये पक्का है।

यदि आपके पास है कोई दिलचस्प कहानी या फिर कोई ऐसी कहानी जिसे दूसरों तक पहुंचना चाहिए, तो आप हमें लिख भेजें editor_hindi@yourstory.com पर। साथ ही सकारात्मक, दिलचस्प और प्रेरणात्मक कहानियों के लिए हमसे फेसबुक और ट्विटर पर भी जुड़ें...