सिर्फ दो रुपए में पूरा महीना बिताते थे मुंशी प्रेमचंद

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मुंशी प्रेमचंद अपने जीवन और सृजन, दोनो में एक जैसे रहे। कथनी-करनी में कोई फर्क नहीं। उनके जीवन पर महात्मा गांधी के भाषणों का अमिट प्रभाव रहा। बचपन में ही गरीबी ने उनके पांव जकड़ लिए थे लेकिन उन्होंने कभी हार नहीं मानी। पांच रुपए की कमाई में तीन रुपए घर वालों को दे देते, दो रुपए में महीने भर अपनी गाड़ी खींचते थे।

मुंशी प्रेमचंद
मुंशी प्रेमचंद
मुंशी प्रेमचंद का साहित्य जीवन एवं समाज के विविध पक्षों को बड़ी बेबाकी से रेखांकित करता है। उन्होंने जिस सामाजिक-धार्मिक रूढ़िवाद, किसानों की दुर्दशा, दलितों एवं स्त्रियों के शोषण का जिक्र अपनी लेखनी से किया, वे सारे सवाल आज भी जिंदा हैं।

विश्व विख्यात हिंदी कथाकार मुंशी प्रेमचंद की आज (8 अक्टूबर) पुण्यतिथि है। मुंशीजी जिस तरह अपने सृजन में पीड़ित मनुष्यता का स्वर बने, उसी तरह अपने जीवन के मोरचे पर भी बचपन से ही जूझते ही रहे। गरीबी से लड़ते हुए उन्होंने जैसे-तैसे मैट्रिक तक पढ़ाई-लिखाई की। जीवन के आरंभ में वह अपने गाँव लमही से दूर बनारस पढ़ने के लिए नंगे पाँव जाया करते थे। इसी बीच पिता का देहान्त हो गया। पढ़ने का शौक था, आगे चलकर वकील बनना चाहते थे, मगर गरीबी ने तोड़ कर रख दिया। स्कूल आने-जाने के झंझट से बचने के लिए एक वकील के यहाँ ट्यूशन करने लगे और उसी के घर एक कमरा लेकर वहीं रहने लगे। ट्यूशन के पाँच रुपये मिलते थे। इसमें से तीन रुपये घर वालों को दे देते और दो रुपये से अपनी जिन्दगी की गाड़ी खींचने लगे। इससे उन्हें महीने भर तंगी और अभाव का जीवन बिताते रहना पड़ता। जीवन की इन्हीं प्रतिकूल परिस्थितियों से उन्हें रचनात्मक ऊर्जा मिली। 

वह लिखते भी हैं - 'यश त्याग से मिलता है, धोखे से नहीं। विचार और व्यवहार में सामंजस्य न होना ही धूर्तता है, मक्कारी है। क्रांति बैठे-ठालों का खेल नहीं है। वह नई सभ्यता को जन्म देती है। जो शिक्षा हमें निर्बलों को सताने के लिए तैयार करे, जो हमें धरती और धन का ग़ुलाम बनाए, जो हमें भोग-विलास में डुबाए, जो हमें दूसरों का ख़ून पीकर मोटा होने का इच्छुक बनाए, वह शिक्षा नहीं भ्रष्टता है। समानता की बात तो बहुत से लोग करते हैं, लेकिन जब उसका अवसर आता है तो खामोश रह जाते हैं।'

मुंशी जी जब मिडिल क्लास में थे, तभी से उपन्यासों का अध्ययन करने लगे था। उनकी पहली अभिरुचि साहित्य था। खोज-खोजकर किताबें पढ़ते और उन पर चिंतन-मनन के साथ टिप्पणियां भी लिखा करते। उनको बचपन से ही उर्दू आती थी। उन पर नॉवल और उर्दू उपन्यासों का ऐसा उन्माद छाया कि बुकसेलर की दुकान पर बैठकर ही उपलब्ध समस्त कथात्मक पुस्तकें पढ़ गए। वह दो-तीन साल के अन्दर ही सैकड़ों उपन्यासों का अध्ययन कर गए। उसी दौरान वह उर्दू के समकालीन उपन्यासकार सरुर मोलमा शार, रतन नाथ सरशार आदि के दीवाने हो गये। जहाँ भी इन लेखकों की किताब मिलतीं, उसे पढ़ने का हर संभव प्रयास करते। उनकी रुचि इस बात से साफ झलकती है कि एक किताब को पढ़ने के लिए उन्होंने एक तम्बाकू वाले से दोस्ती कर ली और उसकी दुकान पर मौजूद 'तिलस्मे-होशरुबा' पढ़ डाली। उन्होंने मशहूर इंग्लिश उपन्यासकार रोनाल्ड की किताबों के उर्दू तर्जुमा को कम उम्र में ही पढ़ लिया था। तेरह वर्ष की उम्र से ही वह लिखने लगे। शुरू में उन्होंने कुछ नाटक लिखे, बाद में उर्दू में उपन्यास लिखने लगे।

कुछ समय बाद उन्होंने बनारस के बाद चुनार के स्कूल में शिक्षक की नौकरी कर ली, साथ ही बीए की पढ़ाई भी। बाद में उन्होंने एक बाल विधवा शिवरानी देवी से विवाह किया, जिन्होंने उनकी जीवनी भी लिखी थी। सोज-ए-वतन उनकी पहली रचना थी। जिस रावत पाठशाला में उन्होंने प्राथमिक शिक्षा ली थी, वहीं पर उनकी पहली पोस्टिंग शिक्षक के रूप में हुई। उसी दौरान वह बालेमियां मैदान में महात्‍मा गांधी के ओजस्‍वी भाषण का उन पर ऐसा प्रभाव पड़ा कि उन्‍होंने अंग्रेजी हुकूमत में सरकारी नौकरी से त्‍यागपत्र दे दिया और स्‍वतंत्र लेखन करने लगे।

मुंशी प्रेमचंद का साहित्य जीवन एवं समाज के विविध पक्षों को बड़ी बेबाकी से रेखांकित करता है। उन्होंने जिस सामाजिक-धार्मिक रूढ़िवाद, किसानों की दुर्दशा, दलितों एवं स्त्रियों के शोषण का जिक्र अपनी लेखनी से किया, वे सारे सवाल आज भी जिंदा हैं। वह शाश्वत जीवन मूल्यों के लेखक थे। उनकी धारदार दृष्टि ने सामाजिक वास्तविकताओं को बारीकी से देखा और परखा। उन्होंने पराधीनता की कठोरता को देखा और भोगा। उनका साहित्य जीवन की परिस्थितियों और अनुभवों का सच्चा दस्तावेज है। उनके कथा-साहित्य में विषय की विविधता है। वह कहानी को मानव-जीवन का चित्र मानते थे। इसलिए उनकी कहानियों और उपन्यासों में जीवन के विविध मार्मिक पक्षों का उद्घाटन हुआ है। देश की निर्धनता और शोषित वर्ग की उन्नति के लिए वे निरंतर संघर्षरत रहे।

मुंशी प्रेमचंद के शब्द आज भी हिंदी साहित्य और भारतीय समाज की अमूल्य धरोहर हैं। वह लिखते हैं - 'कुल की प्रतिष्ठा भी विनम्रता और सदव्यवहार से होती है, हेकड़ी और रुआब दिखाने से नहीं। दुखियारों को हमदर्दी के आँसू भी कम प्यारे नहीं होते। अनाथ बच्चों का हृदय उस चित्र की भांति होता है जिस पर एक बहुत ही साधारण परदा पड़ा हुआ हो। पवन का साधारण झकोरा भी उसे हटा देता है। आलस्य वह राजरोग है जिसका रोगी कभी संभल नहीं पाता। आलोचना और दूसरों की बुराइयां करने में बहुत फ़र्क़ है। आलोचना क़रीब लाती है और बुराई दूर करती है। आशा उत्साह की जननी है। आशा में तेज है, बल है, जीवन है। आशा ही संसार की संचालक शक्ति है। अगर मूर्ख, लोभ और मोह के पंजे में फंस जाएं तो वे क्षम्य हैं, परंतु विद्या और सभ्यता के उपासकों की स्वार्थांधता अत्यंत लज्जाजनक है। अपमान का भय क़ानून के भय से किसी तरह कम क्रियाशील नहीं होता। कोई वाद जब विवाद का रूप धारण कर लेता है तो वह अपने लक्ष्य से दूर हो जाता है। कभी-कभी हमें उन लोगों से शिक्षा मिलती है, जिन्हें हम अभिमानवश अज्ञानी समझते हैं। क्रोध और ग्लानि से सद्भावनाएं विकृत हो जाती हैं। जैसे कोई मैली वस्तु निर्मल वस्तु को दूषित कर देती है। कायरता की भांति वीरता भी संक्रामक होती है। जीवन का सुख दूसरों को सुखी करने में है, उनको लूटने में नहीं। जवानी जोश है, बल है, साहस है, दया है, आत्मविश्वास है, गौरव है और वह सब कुछ है जो जीवन को पवित्र, उज्ज्वल बना देता है। जब दूसरों के पांवों तले अपनी गर्दन दबी हुई हो, तो उन पांवों को सहलाने में ही कुशल है। सफलता में अनंत सजीवता होती है, विफलता में असह्य अशक्ति। स्वार्थ में मनुष्य बावला हो जाता है। प्रेम एक बीज है, जो एक बार जमकर फिर बड़ी मुश्किल से उखड़ता है। प्रेम की रोटियों में अमृत रहता है, चाहे वह गेहूं की हों या बाजरे की। हिम्मत और हौसला मुश्किल को आसान कर सकते हैं, आंधी और तूफ़ान से बचा सकते हैं, मगर चेहरे को खिला सकना उनके सार्मथ्य से बाहर है। घर सेवा की सीढ़ी का पहला डंडा है। इसे छोड़कर तुम ऊपर नहीं जा सकते।'

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पत्रकार/ लेखक/ साहित्यकार/ कवि/ विचारक/ स्वतंत्र पत्रकार हैं। हिन्दी पत्रकारिता में 35 सालों से सक्रीय हैं। हिन्दी के लीडिंग न्यूज़ पेपर 'अमर उजाला', 'दैनिक जागरण' और 'आज' में 35 वर्षों तक कार्यरत रहे हैं। अब तक हिन्दी की दस किताबें प्रकाशित हो चुकी हैं, जिनमें 6 मीडिया पर और 4 कविता संग्रह हैं।

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