छत्तीसगढ़ की बहुमूल्य आदिवासी कलाओं का संरक्षण कर ग्रामीणों को रोजगार दे रहा शिल्पग्राम

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आदिवासी ग्रामीण शिल्पकारों की कला को प्रोत्साहित करने के लिए छत्तीसगढ़ में शिल्पग्राम स्थापित किए गए ताकि शिल्पकारों को प्रोत्साहन के साथ-साथ वो सारी सुविधाएं मिल सकें जिनसे वे अपनी आजीविका चला सकें और इस कला को जीवित भी रख सकें।

शिल्पग्राम में सामान बनाती आदिवासी महिला
शिल्पग्राम में सामान बनाती आदिवासी महिला
 बस्तर के परचनपाल में शिल्पग्राम की स्थापना छत्तीसगढ़ हैंडीक्राफ्ट डेवलपमेंट बोर्ड द्वारा 1988 में की गई थी। मकसद था सांस्कृतिक रूप से संपन्न इलाके के शिल्पकारों को आजीविका मुहैया कराई जा सके। 

छत्तीसगढ़ का बस्तर इलाका नक्सल प्रभावित क्षेत्रों में से एक माना जाता है। नक्सलवाद ने यहां रहने वाले लोगों की जिंदगियों को नकारात्मक रूप से प्रभावित किया है। लेकिन इस इलाके में ऐसा बहुत कुछ अच्छा हो रहा है, जिसके बारे में शायद कम या कहें बहुत कम ही बात होती है। छत्तीसगढ़ लोक संस्कृति और परंपराओं के साथ-साथ अपने अनूठे शिल्प के लिए भी प्रसिद्ध है। लेकिन बदलते वक्त की मार से शिल्पकारों को काफी नुकसान उठाना पड़ा और उनके उद्योग धंधों पर विराम लग गया। लेकिन आदिवासी ग्रामीण शिल्पकारों की कला को प्रोत्साहित करने के लिए छत्तीसगढ़ में शिल्पग्राम स्थापित किए गए ताकि शिल्पकारों को प्रोत्साहन के साथ-साथ वो सारी सुविधाएं मिल सकें जिनसे वे अपनी आजीविका चला सकें और इस कला को जीवित भी रख सकें।

छत्तीसगढ़ का एक महत्वपूर्ण जिला है बस्तर। खनिज संपदा एवं बीहड़ वनों से समृद्ध इस क्षेत्र में देश के कुछ सर्वधिक महत्वपूर्ण आदिम समूह निवास करते हैं। यहां के वनों में साल, सागौन और बीजा की लकड़ी बहुतायत में मिलती है। यही वजह है कि यहां लकड़ी से बनने वाले शिल्प का प्रचलन काफी पुराना है। लेकिन वक्त के साथ इन कलाओं के विलुप्त हो जाने का खतरा मंडराने लगा। इसे बचाने के लिए बस्तर के परचनपाल में शिल्पग्राम की स्थापना छत्तीसगढ़ हैंडीक्राफ्ट डेवलपमेंट बोर्ड द्वारा 1988 में की गई थी। मकसद था सांस्कृतिक रूप से संपन्न इलाके के शिल्पकारों को आजीविका मुहैया कराई जा सके। अभी इस शिल्पग्राम में 500 शिल्पकार काम करते हैं जिनमें से 10 परिवारों के यहीं रहने का इंतजाम किया गया है। ये शिल्पकार बांस, लोहे, पत्थर, मिट्टी और सीशल क्राफ्ट से जुड़े काम करते हैं। आसपास के ग्रामीणों को रोजी-रोटी मुहैया कराने के लिए उन्हें ट्रेनिंग देने की भी व्यवस्था की जाती है।

शिल्पग्राम में बीते 15 सालों से रहकर काम करने वाली शोभा बघेल बताती हैं कि पहले उनके पास आजीविका चलाने का कोई साधन नहीं हुआ करता था, लेकिन अब वे हर महीने 15 से 20 हजार रुपये का काम कर लेती हैं। इतना ही नहीं शोभा शिल्प का काम सीखने आने वाले नए लोगों को ट्रेनिंग भी देती हैं। वह बताती हैं कि अब तक उन्होंने 300 से भी अधिक लोगों को काम सिखाया है। इस काम की शुरुआते के पीछे की मंशा को बताते हुए शोभा कहती हैं, 'मेरा गांव यहां से पास में ही है। जब ये शिल्पग्राम शुरू हुआ था तो यहां बेरोजगारों को ट्रेनिंग दी जाती थी। मुझे लगा कि अगर मैं भी काम सीख लूं तो घर का गुजारा अच्छे से हो जाएगा। मैंने यहां से ट्रेनिंग ली और जब पूरी तरह से काम सीख लिया तो पैसे भी मिलने लगे।' आज शोभा अपनी जिंदगी अच्छे से गुजार रही हैं और साथ ही उनके बच्चे बेहतर शिक्षा हासिल कर रहे हैं।

यहां के शिल्पकार अपनी बनाई हुई कलाकृतियों को लेकर देश के कोने-कोने में लगने वाले शिल्प मेलों में लेकर जाते हैं। शोभा बताती हैं कि वह दिल्ली, सूरजकुंड, रायपुर, भोपाल, जगदलपुर जैसी जगहों पर लगने वाले प्रसिद्ध मेलों में जा चुकी हैं। शिल्पग्राम का जिम्मा संभालने और उसकी पूरी देखरेख करने वाले रीजनल मैनेजर बी.के. साहू बताते हैं कि शिल्पकारों के लिए मशीनें, बिजली, पानी सारी सुविधाएं मुहैया कराई जाती हैं। इसके साथ-साथ उन्हें नई तकनीक और डिजाइन से भी परिचित कराया जाता रहता है। वह कहते हैं, 'इस क्षेत्र में कई सारी ऐसी आदिवासी कलाएं थी जो धीरे-धीरे विलुप्त होने की तरफ बढ़ रही थीं, लेकिन उन्हें फिर से जीवित करने का प्रयास शिल्पग्राम में हुआ और अब वे अच्छे से फल-फूल रही हैं।'

बी.के. साहू ने बताया कि यहां बांस शिल्प, लकड़ी शिल्प, शिशल शिल्प और पत्थर शिल्प का निर्माण किया जाता है। शिल्पग्राम में कई ऐसे परिवारों को रोजगार मिल रहा है जिनकी जिंदगी नक्सलवाद की वजह से तबाह हो गई थी। ऐसी ही एक महिला हैं सीताबाई जिनके बेटे को दस साल पहले नक्सलियों ने मार दिया था और उनके पति को उठा ले गए। वे कहती हैं, 'मेरी जिंदगी बर्बाद हो चुकी थी, कुछ समझ नहीं आ रहा था जीवन का गुजारा कैसे होगा। मेरा कोई सहारा नहीं था। इसीलिए मैं यहां आ गई।' सीताबाई यहां बांस का काम करती हैं और प्रदर्शनियों में हिस्सा लेने भी जाती हैं।

बी. के. साहू बताते हैं कि अब बस्तर के हस्त शिल्पियों के द्वारा बनाई गई कलाकृतियों की मांग देश के साथ विदेश में भी बड़े पैमाने पर हो रही है। आने वाले दिनों में इस कला को विकसित करने की पूरी कोशिश की जाएगी। जिसके तहत लोगों को प्रशिक्षण देना और नई कलाओं के बारे में बताना शामिल है। यही नहीं बस्तर के शिल्पकारों को नई पहचान दिलाने के लिए शिल्पग्राम परचनपाल को जिला प्रशासन द्वारा विशेष रूप से विकसित एवं संरक्षित किया जा रहा है। बाजार में जिस तरह के सामानों की अधिक मांग होती है उन्हें तैयार किया जाता है और उसे उचित मूल्य पर विभिन्न प्लेटफॉर्म के जरिए बेचा जाता है। शिल्पग्राम का यह अनूठा प्रयास न जाने कितने आदिवासियों की जिंदगी में परिवर्तन ला रहा है। ग्रामीण शिल्पकारों को भी उम्मीद है कि आने वाले समय में इस काम से उन्हें और बेहतर जीवन जीने को मिलेगा।

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