प्यासे को पानी पिलाने की अनोखी पहल-अमृतधारा

सार्वजनिक जगहों पर मशीन से बिना सीलबंद पेयजल मुहैया कराने को बहेगी अमृतधारा...प्यासे को पानी पिलाने की अनोखी पहल ...पर्यावरण को ध्यान में रखकर की गई शुरुआत...अमृतधारा का लक्ष्य देश के सभी शहरों तक पहुंचना है...

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कहते हैं आइडिया कहीं से और कभी भी मिल सकता है। कुछ ऐसा ही हुआ मिन अमीन के साथ। अमीन को एक बार ट्रेन में सफर के दौरान डिब्बे में प्लास्टिक की इस्तेमाल कर फेंकी गई मुड़ी तुड़ी खाली बोतलें दिखीं। ये देखकर उन्हें एक आइडिया आया। उन्हें लगा कि अगर ऐसा हो कि आप प्यासे हों और पीने का पानी प्लास्टिक की बंद बोतलों के अलावा उसी गुणवत्ता के साथ आप को मिल जाए तो कितना अच्छा होगा। इससे पर्यावरण की भी रक्षा होगी और पीने वाले को पानी भी मिल जाएगा। ट्रेन के डिब्बे से मिली प्रेरणा ने अमीन को अमृतधारा शुरू करने के लिए प्रेरित किया। अमृतधारा यानी एक ऐसी योजना जिसका लक्ष्य है सार्वजनिक जगहों पर मशीनों के जरिए बिना प्लास्टिक की बोतलों के पीने का पानी उपलब्ध कराना।

अमृतधारा के साथ आगे चलकर आमीन के साथ उनके दोस्त और सह-संस्थापक अक्षय रुंगटा जुड़े। हालांकि दोनों अलग-अलग पृष्ठभूमि से आते हैं। अमीन वित्तीय क्षेत्र हैं तो अक्षय इंडस्ट्रियल डिजाइन से, लेकिन दोनों ने सस्टैनबिलिटी प्रोजेक्ट्स (लंबे समय तक चल सकने वाली परियोजनाओं) के लिए काम किया था। ऑरोविल्ले के अनुभव के सहारे, उन्होंने बोतलबंद पानी के इस्तेमाल को कम करने के उपायों की तलाश में 2013 में अमृतधारा पर काम करना शुरु किया। अक्षय बताते हैं, ‘‘पहले साल में हमने सहज प्रयोग किए। हमने पांडिचेरी में अलग-अलग जगहों पर बिना सीलबंद पानी बेचने के लिए स्टाॅल लगाए। ऐसा कर हम यह समझना चाहते थे कि लोग ऐसा पानी खरीदने को लेकर क्या राय रखते हैं जो सीलबंद न हो। साथ ही हम हाइजीन और साफ-सफाई के बारे में उनके नजरिए को भी समझना चाहते थे’’

कई यात्राओं और ढ़ेर सारी बातचीत और साथ ही आॅन और आॅफलाइन अभियानों के बाद हमारी टीम अपने सबसे अहम नतीजे पर पहुंची। इसके मुताबिक लोग जब प्यासे होते हैं तो उनके लिए स्रोत का नजदीक होना सबसे अहम होता है। अक्षय कहते हैं, ‘‘बहुत मुमकिन है कि वे अमृतधारा रिफिल स्टेशन से पानी खरीदें अगर इन तक पहुंचना बहुत आसान हो.’’ वे आगे बताते हैं कि यही प्रमुख वजह थी कि उन्होंने नये बूथ बैठाने की जगह मौजूदा दुकानों में अपनी पानी की मशीनें लगाने का विकल्प चुना।

अभी वे टोकन मशीन से पानी बेच रहे हैं जहां पानी की मात्रा के अनुसार कीमत चुकानी पड़ती है. अक्षय बताते हैं, ‘‘प्लास्टिक पैकेजिंग का खर्च हटाकर प्रति लीटर पानी की कीमत हम बोतलबंद पानी से आधी रख पाए हैं.’’

पानी की सरलता-सहजता कंपनी की सबसे खास पहचान बन गई है जिसने बिना सीलबंद पानी को उपलब्ध कराने के लिए बहुत ही कम खर्चीला तरीका चुना। अमृतधारा ने न केवल मौजूदा दुकानों के नेटवर्क को अपनी सेवा से जोड़ा बल्कि बहुत ही सरल तकनीक भी अपनाई है। अक्षय कहते हैं, ‘‘हम उपलब्ध उपकरणों का ही प्रयोग कर रहे हैं जिन्हें नए ढंग से आपस में जोड़ा गया है.’’ यह बताते हुए वे इस बात का जिक्र करना नहीं भूलते कि उनकी वेंडिंग मशीन या सप्लाई सिस्टम में कुछ भी नया नहीं है. वे आगे बताते हैं, ‘‘सामने का हिस्सा एक गुब्बारे से जुड़ा होता है जो पानी की गुणवत्ता की जांच करता है, इसके बारे में जानकारी देता है, भुगतान स्वीकार करता है और पानी देता है. मशीन तक पानी या तो बबल टाॅप डिस्पेंसर या वहां लगे आरओ फिल्टरेशन यूनिट से पहुंचाया जाता है.’’

अमृतधारा ने अपनी यह सेवा कुछ महीने पहले ही शुरू की है. चेन्नई के एक स्टोर में इसका परीक्षण चल रहा है. परीक्षण से इस योजना के मुनाफे के संबंध में बहुत सकारात्मक फीडबैक मिले हैं. हालांकि, दुकानदार ने मशीन की कार्यक्षमता को लेकर कुछ छोटी-मोटी चिंताएं जाहिर की हैं. ऐसे में टीम अब अपनी तकनीक को दोषरहित बनाने पर काम कर रही है. तकनीक आगे बढ़ेगी, लेकिन हमेशा सरल-सहज ही रहेगी.

जहां तक राजस्व जुटाने की बात है, पानी बेचने से होने वाला मुनाफा नाकाफी है. अक्षय कहते हैं, ‘‘हम राजस्व मुख्यतः मशीनों की बिक्री और वार्षिक गुणवत्ता ठेकों से जुटाएंगे. इसके अलावा, बड़े बीटूबी कार्यक्रमों के लिए परामर्श उपलब्ध कराकर भी कुछ राजस्व जुटाया जाएगा.’’ वे आगे कहते हैं, ‘‘ऑरोविल्ले से जुड़ा होना अब तक फायदेमंद रहा है क्योंकि समुदाय आम तौर पर बहुत सहायक और सहयोगी है.’’ हालांकि, वे आगे कहते हैं कि योजना आगे बढ़ने की है. टीम का अंतिम लक्ष्य देश के सभी शहरी क्षेत्रों तक पहुंचना है. वे जल्द ही बंगलुरु में भी काम शुरु करने की सोच रहे हैं क्योंकि भौगोलिक रूप से इस मेट्रो शहर से शुरुआत करना सबसे आसान है.

अक्षय कहते हैं, ‘‘चुनौतियां कई हैं, लेकिन सबसे कठिन चुनौती है आलोचकों की नजर में अपना हौसला बनाएं रखना. साथ ही यह भी एक कठिन चुनौती है कि यह सोच कर दूसरों का हममें यकीन कम नहीं हो कि हम उनके साथ साझेदारी करना चाहते हें या उनका निवेश चाहते हैं. अक्षय ने अमृतधारा को अपना पूरा वक्त देने के लिए हेलसिंकी में अपनी स्नातकोत्तर (मास्टर्स) की पढ़ाई बीच में ही छोड़ दी थी. वे कुछ इस तरह से अपनी बात खत्म करते हैं, ‘‘समस्या की ओर वापस लौटना, यह याद करना कि हम यह काम क्यों कर रहे हैं, क्या कर रहे हैं; ये सब हमारे लिए अकसर मददगार साबित होता है. और फिर हम गर्द झाड़कर नई शुरुआत करते हैं और आगे बढ़ते रहते हैं.’’

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