मुनव्वर राना की आंखों से उमड़े दरिया-समंदर

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देश के मशहूर शायर मुनव्वर राना इन दिनो दिल्ली के एम्स अस्पताल में हैं। जिस मर्ज के इलाज के लिए वह यहां भर्ती हैं, उसका सिलसिला लंबा है। मध्य प्रदेश के किसी डॉक्टर ने उनके घुटने का ऑपरेशन क्या किया, दवा-इलाज का एक अंतहीन दौर सा उनके जीवन में शामिल हो गया। पहले तो वह इलाज को इलाज समझते चले गए, बर्दाश्त करते रहे लेकिन पिछले दिनो हुई एक मुलाकात में उन्होंने अपना जो दुख-दर्द साझा किया, किसी भी नामवर, लिक्खाड़ साहित्यकार के लिए सचमुच एक बड़ी चिंता का विषय लगता है। जितनी घड़ी हम उनके पास रहे, सामने रहे, उनकी आंखों से सौ-सौ दरिया-समंदर उमड़ते रहे। सामने बैठे हर शख्स की आंखें उमड़ आईं इस मशहूर शख्सियत की आंखों में इतने आंसू देखकर...

मुनव्वर राणा
मुनव्वर राणा
राना साहब कहते हैं कि मंच कविता को बाजारू बना देता है। जब तक गायक मंदिर के अहाते में होता है, कलाकार कहलाता है, कोठे पर चला जाता है, कुछ और कहा जाने लगता है। यही हाल कविता का माना जाए।

देश के मशहूर शायर मुनव्वर राना इन दिनो दिल्ली के एम्स अस्पताल में हैं। जिस मर्ज के इलाज के लिए वह यहां भर्ती हैं, उसका सिलसिला लंबा है। मध्य प्रदेश के किसी डॉक्टर ने उनके घुटने का ऑपरेशन क्या किया, दवा-इलाज का एक अंतहीन दौर सा उनके जीवन में शामिल हो गया। पहले तो वह इलाज को इलाज समझते चले गए, बर्दाश्त करते रहे लेकिन पिछले दिनो हुई एक मुलाकात में उन्होंने अपना जो दुख-दर्द साझा किया, किसी भी नामवर, लिक्खाड़ साहित्यकार के लिए सचमुच एक बड़ी चिंता का विषय लगता है। जितनी घड़ी हम उनके पास रहे, सामने रहे, उनकी आंखों से सौ-सौ दरिया-समंदर उमड़ते रहे। सामने बैठे हर शख्स की आंखें उमड़ आईं इस मशहूर शख्सियत की आंखों में इतने आंसू देखकर।

एम्स में मुलाकात के दौरान मुनव्वर राना कहने लगे - 'यही उम्र तो किसी कवि-लेखक के लिए सबसे अधिक काम की होती है, जब उसके जीवन के पके-पकाए अनुभव शब्दों में उतारने का वक्त आता है और मेरा यही वक्त मुझे ये दिन दिखा रहा है। इलाज कराते-कराते अब तंग आ गया हूं। इस वक्त के सबसे बेहतर इस्तेमाल का, कलम की सबसे उम्दा साधना के लिए सोच रखा था लेकिन आज अस्पतालों की खाक छानता फिर रहा। घुटना साथ नहीं दे रहा, पता नहीं कैसा ऑपरेशन उस डॉक्टर ने कर डाला कि बेड़ा गर्क हुआ जा रहा है।'

राना कहते हैं कि 'गलती मेरी भी है। ऑपरेशन के बाद के दिनो में सिर पर सवार लेखन के भूत ने भी कुछ कम सांसत नहीं कराई है। लिखता गया, लिखता गया बिना घुटने का खयाल किए हुए और उसके बाद तो जो दुर्गति शुरू हुई, सो आज इस अंजाम तक मुझे पहुंचा गई है। अब इस बारे में क्या घर, क्या बाहर, क्या दोस्त-मित्र, क्या डॉक्टर-वैद्य, किसे क्या बताएं। खुद देख लीजिए, एम्स के इस बिस्तर से बगल के पार्क तक और कभी डॉक्टरों की चेयर सामने, बस इतनी भर मेरी दुनिया होकर रह गई है।' यह सब बताते हुए उनके चेहरे में ऐसे ऐसे भाव-मुद्राएं सामने आती हैं जो किसी को भी रोने पर विवश कर दें। अन्य मुलाकातियों, कवि-शायरों, तीमारदारों के बीच बिस्तर पर पड़े मुनव्वर राना रो रहे हैं, आंखों से गंगा-यमुना न थमने का नाम ले रहीं, न सामने बैठे लोगों के गले रुंआसे होने से थम पा रहे। इतने बड़े शायर को इतने दुख में देखते हुए सचमुच कुछ पल के लिए तो असहनीय सा हो जाता है लेकिन किया क्या जा सकता है।

मुनव्वर राना से इस मुलाकात के दौरान देश-दुनिया की, साहित्य की, कवि-सम्मेलनों और मुशायरो की दुनिया की ढेर सारी बाते होती रहती हैं, बाकी लोग तो उसे किसी मरीज का आलाप मानकर मन मारे सुनते जा रहे हैं और मैं, उससे अंदर कहीं सहेजता जा रहा कि यह सब अपने पाठकों से साझा करूंगा। बात अभी इसी सप्ताह की है, जब राना साहब से यह न भुलाने वाली मुलाकात हुई। तो बातें कुछ इस तरह की होती रहीं.......वह कहते जा रहे थे, हम सुनते जा रहे।

तो राना साहब बोले - पिछले दिनो इंडिया टुडे वालो ने मुझसे पूछा कि आपके पसंदीदा शायर कौन हैं। मैंने कहा, मेरा कोई ऐसा पसंदीदा शायर नहीं है। कवि और शायरों की पूरी जमात को हम एक परिवार मानते हैं। जिस तरह एक परिवार में एक गवर्नर भी होता है, एक बस कंडक्टर भी होता है, लेकिन जब भी कोई जश्न या शादी-ब्याह होता है, तो दोनो को बराबर इज्जत से बुलाया जाता है। कवि और शायर में लोगों की नजर में कोई बड़ा या छोटा हो सकता है। मेरी पसंद के गालिब और तुलसी दोनो हैं। मैंने ऐसा कोई फर्क नहीं किया है। मैंने मामूली से मामूली कवि या शायर की किताब को गौर से पढ़ा है। ऐसा नहीं कि हमने बड़े नाम ढूंढे हों, बड़ा कलाम पढ़ा हो, सब पढ़ा है। दूसरी बात ये है कि उर्दू शायरी में हिंदी को माइनस करने के बाद कुछ बचता ही नहीं है। उर्दू में ज्यादातर शब्द हिंदी के हैं।

वह बताने लगे कि पिछले दिनो एक लेख पढ़ रहा था, उसमें मैंने एक मुहावरा पढ़ा- हुन बरसना। तो मैं समझा कि हुन बरसना हिंदी का मुहावरा होगा, ज्यादातर ऐसे शब्द हिंदी से आए हैं। लेकिन जब डिक्शनरी में देखा तो उसमें लिखा था कि ये तेलुगु का शब्द है। तो मुझे आश्चर्य हुआ कि तेलुगु कैसे हो सकता है! ये दक्खन की जुबान थी तो शायद ये शब्द वहां आया होगा। शब्दकोश में रिफरेंस होता है, जिसमें लिखा होता है कि ये किस भाषा का शब्द है। तो पता चला कि तेलुगु का है। उस जमाने की एक कहानी है कि लोग जब भूखो मर रहे थे, तो उन्होंने इबादतगाह में दुआ की कि वे भूखे मर रहे हैं, उन्हें अल्लाह बचाए, तो भगवान ने बारिश के साथ सोने के पत्तर बरसाए, सोने की पत्तियां। इसी को हुन बरसना कहा जाता था। हुन बरसना यानी दौलत बरसना। इस 'हुन' शब्द के साथ एक दिलचस्प शेर है- गर्दन-ए-शीशा झुका दे मेरे पैमाने में।

हुन बरसता रहे साकी तेरे मयखाने में। इसी तरह हमारे यहां जो पेशतर शब्द हैं, वो हिंदी से आए हैं। हमारे यहां उर्दू वालो ने खासकर उर्दू को हिंदी से अलग करके देखा ही नहीं। हमने कभी ऐतराज नहीं किया, लोग कहते हैं हिंदी ग़ज़ल। हम कहते हैं, हिंदी ग़ज़ल क्या होती है। ग़ज़ल के मायने महबूब से बातें करना होता है। जो जुबान महबूब को आती हो, हम उसी जुबान में बात करेंगे। लेकिन हम ये किसी को नहीं बताएंगे कि हम अपनी महबूबा से बंगाली, तेलुगु, मराठी किस भाषा में बात करके आ रहे हैं। सिर्फ इतना कहेंगे कि हमने अपनी महबूबा से बात की। इसी तरह से जब हिंदी ग़ज़ल कही जाती है, तब हिंदी ग़ज़ल का क्या मतलब है! एक तो माफ कीजिएगा, हिंदी में उस्ताद-शागिर्द की परंपरा नहीं है। तो वो जो हमारे यहां डांट के, फटकार के सिखाया जाता है कि ये ठीक नहीं है, वो ठीक नहीं है, उसमें सिर्फ मीटर और बहर की बात नहीं होती, उसमें तालीम की बात होती है।

वह कहते हैं कि किसी शब्द की अपनी जो खनखनाहट है, कि कहीं इस्तेमाल करिए तो बुरा लगता है कानो को, कहीं बहुत अच्छा लगता है, तो इस्तेमाल का सलीका भी इस तालीम का हिस्सा होता है। 'तकव्वुर' उर्दू का मशहूर शब्द माना जाता है, जिसका मतलब प्राउड-गर्व। लेकिन बहुत कम लोग इसका बखूबी इस्तेमाल कर पाते हैं। हमारे यहां लखनऊ की शायरी में कई लोग 'तकव्वुर' का ठीक से उच्चारण नहीं कर पाते हैं। हमारे देश में एक समय था, जब अंग्रेजों के जमाने में आम लोगों की जुबान हिंदी-उर्दू मिश्रित थी और लोग अपनी सहूलियत से ज्यादा या कम इस्तेमाल करते थे। तकरीबन ये दोनो जुबानें लोगों को मालूम थीं। हिंदी वालों ने ये लिबर्टी ले ली साहब कि ये हिंदी ग़ज़ल है, उसमें वो कई ऐसे खराब शब्द भी ठूंस देते हैं, जो ग़ज़ल के हिसाब से सही नहीं होते, कई बार शब्द मीटर के बाहर भाग जाते हैं।

राना साहब बताने लगे कि ग़ज़ल मीर की तहजीब से आई है, हम अगर ग़ज़ल लिखते हैं तो हमारी लिबर्टी में यही है, जिम्मेदारी भी यही है कि ये मीर की ग़ज़ल है, जिसे हम लिख रहे हैं। हम अपनी तहजीब से बावस्ता रहें, अपने संस्कारों से बावस्ता रहें। अब बात अगर रामायण या रामचरित मानस की हो तो वाल्मीकि की रामायण उतनी चर्चित नहीं हुई, जितनी तुलसीदास की, क्योंकि तुलसीदास ने न सिर्फ रामायण को अवधी में लिखा, बल्कि उसमें उस वक्त की कई भाषाओं के शब्दों का बहुलता से इस्तेमाल किया। वाल्मीकि ने भी लिखा कि रामचंद्र राजा थे पर जब तुलसी ने लिखा तो पूरी दुनिया ने मान लिया कि राजा रामचंद्र भगवान थे।

तुलसी के रामायण में शब्दों का जो प्रयोग था, उसमें उर्दू, फारसी, अवधी, संस्कृत के शब्द आए, जो लोगों की जुबान में उनकी रचना को आसान और खूबसूरत करते चले गए। कोई भी रचना जब भाषागत रूप में आसान हो जाती है तो वह ज्यादा अच्छी लगने लगती है और समझ में भी आती है। तो इसी तरह से मेरा भी कहने का मतलब ये है कि उर्दू और हिंदी के जो शब्द हैं, उनकी लिखावट तो अलग हो सकती है लेकिन ज्यादातर शब्द ऐसे ही हैं, जो एक जैसे हैं। जैसे हम-आप इतनी देर से बात कर रहे हैं, तो इसमें कौन सा शब्द हिंदी का, कौन सा उर्दू का आया, ये फर्क करना जरा मुश्किल होता है। एक शेर है...उसने भीगे हुए बालो से झटका पानी झूम के आई घटा, टूट के बरसा पानी।

वह कहते हैं, इसमें उर्दू का एक भी शब्द नहीं। एक बहुत मामूली शब्द है यूं, अगर इसे समझना चाहें तो इसका मतलब ही समझ में नहीं आता। इसे आप अंग्रेजी में डिफाइन करना चाहें तो यू कांट डिफाइन, अब इस शब्द का प्रयोग शायरी में देखिए... पूछा जो उनसे चांद निकलता है किस तरह, जुल्फों को रुख पे डाल के झटका दिया कि यूं......पूछा जो आशिकों को जलाते हैं किस तरह, दामन पकड़ के गैर का बतला दिया कि यूं....... अब यूं का इस्तेमाल देखिए आप कि कहने का ये मतलब है, उर्दू की खूबी है, ये कहना कि उर्दू मुसलमान की जुबान है, गलत है, लेकिन ये हमारी कल्चर की जुबान है।

अगर ये तुर्कियों की जुबान होती तो तुर्की बोल रहे होते, वो फारसी बोलते हुए आए थे, अरबी बोलते हुए आए थे, उर्दू हमारी अपनी जुबान थी, हमारी तकरीर, हमारे संस्कार, हिंदुस्तानी लोग और बादशाह, सबकी जुबान के रूप में उर्दू मौजूद थी। उर्दू को धोया गया, मांजा गया। कहने का मतलब ये है कि उर्दू जुबान खूबसूरत होती चली गई। आज भी हमारे यहां बताया जाता है कि अगर आप हिंदी के पूरे दौर को नहीं पढ़ लेते हैं तो ग़ज़ल को सही सही शब्द नहीं दे पाएंगे। उर्दू मुशायरा हो या हिंदी कवि सम्मेलन हो, इन दोनो के बीच में जो लहर बैठती है, शब्दों की, संस्कारों की, उसे आप उर्दू कह लीजिए, हिंदी कहिए। मुशायरों, कविसम्मेलनों के बीच में चलती है एक हिंदुस्तानी जुबान। चाहें तो उसे हिंदुस्तानी जुबान कह लीजिए।

राना साहब कहते हैं कि मंच कविता को बाजारू बना देता है। जब तक गायक मंदिर के अहाते में होता है, कलाकार कहलाता है, कोठे पर चला जाता है, कुछ और कहा जाने लगता है। यही हाल कविता का माना जाए। मंचों पर आजकल खराब शब्दावलियों का प्रयोग किया जाता है। अब मंच पर 10 प्रतिशत ही लोग अच्छे बचे हुए हैं। आज जरूरत है कि मंच से कविता को बचाया जाए, संतुलन रखा जाए। उन्हीं रचनाओं को तवज्जो दी जाए, जो पढ़ने लायक ही नहीं, छपने लायक भी हो। आज कितना खराब समय है कि हम कविसम्मेलनों, मुशायरों के मंचों से दलों, नेताओं को गाली दे रहे हैं। इस तरह हिंदी-उर्दू, कवि-सम्मेलन-मुशायरे की बातें करते करते राना साहब ने जैसे हमे पूरी साहित्यिक विरासत की ही सैर करा डाली।

उस वक्त एम्स अस्पताल से बाहर आते समय मन उनके दुख-दर्द से इतना भारी हो चुका था कि उसे किससे साझा कर हल्का हुआ जा सके, कुछ समझ में नहीं आ रहा था। और आज सुबह सूझा कि क्यों न राना साहब से मिली जानकारियों को उनके इन अनमोल शब्दों के साथ साझा कर लिया जाए। मुनव्वर राना कहते हैं- मामूली एक कलम से कहां तक घसीट लाए, हम इस ग़ज़ल को कोठे से मां तक घसीट लाए। मां पर राना साहब ने अनमोल शायरी की है। मां के लिए उनकी आंखों में जैसे सातो समंदर लहराने लगते हैं। एक ऐसा दरिया फूट पड़ता है, जो अपने किनारों को तोड़ते-ढहाते हुए जाने कैसे कैसे मंजर सामने ला खड़ा करता है। तो आइए, जरा सा उनके उस शब्द-सफर पर हो लेते हैं -

हो चाहे जिस इलाक़े की ज़बाँ बच्चे समझते हैं
सगी है या कि सौतेली है माँ बच्चे समझते हैं
हवा दुखों की जब आई कभी ख़िज़ाँ की तरह
मुझे छुपा लिया मिट्टी ने मेरी माँ की तरह
सर फिरे लोग हमें दुश्मन-ए-जाँ कहते हैं
हम जो इस मुल्क की मिट्टी को भी माँ कहते हैं
मैंने रोते हुए पोंछे थे किसी दिन आँसू
मुद्दतों माँ ने नहीं धोया दुपट्टा अपना
भेजे गए फ़रिश्ते हमारे बचाव को
जब हादसात माँ की दुआ से उलझ पड़े
लबों पे उसके कभी बद्दुआ नहीं होती
बस एक माँ है जो मुझसे ख़फ़ा नहीं होती
अब भी चलती है जब आँधी कभी ग़म की ‘राना’
माँ की ममता मुझे बाहों में छुपा लेती है
जब तक रहा हूँ धूप में चादर बना रहा
मैं अपनी माँ का आखिरी ज़ेवर बना रहा
देख ले ज़ालिम शिकारी ! माँ की ममता देख ले
देख ले चिड़िया तेरे दाने तलक तो आ गई
गले मिलने को आपस में दुआयें रोज़ आती हैं
अभी मस्जिद के दरवाज़े पे माएँ रोज़ आती हैं
कभी —कभी मुझे यूँ भी अज़ाँ बुलाती है
शरीर बच्चे को जिस तरह माँ बुलाती है
किसी को घर मिला हिस्से में या कोई दुकाँ आई
मैं घर में सब से छोटा था मेरे हिस्से में माँ आई
ऐ अँधेरे! देख ले मुँह तेरा काला हो गया
माँ ने आँखें खोल दीं घर में उजाला हो गया
इस तरह मेरे गुनाहों को वो धो देती है
माँ बहुत ग़ुस्से में होती है तो रो देती है
मेरी ख़्वाहिश है कि मैं फिर से फ़रिश्ता हो जाऊँ
माँ से इस तरह लिपट जाऊँ कि बच्चा हो जाऊँ

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पत्रकार/ लेखक/ साहित्यकार/ कवि/ विचारक/ स्वतंत्र पत्रकार हैं। हिन्दी पत्रकारिता में 35 सालों से सक्रीय हैं। हिन्दी के लीडिंग न्यूज़ पेपर 'अमर उजाला', 'दैनिक जागरण' और 'आज' में 35 वर्षों तक कार्यरत रहे हैं। अब तक हिन्दी की दस किताबें प्रकाशित हो चुकी हैं, जिनमें 6 मीडिया पर और 4 कविता संग्रह हैं।

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