कठिन परिस्थितियों से लड़कर इन अरबपतियों ने दुनिया में बनाया अपना मुकाम

हार नहीं मानी तो बन गए बिजनेस टायकून...

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किसी के हंसने और रोने पर न जाएं। अपनी सफलता, और असफलता की भी इबारत व्यक्ति खुद लिखता है। अपने कर्मों से। कोई अर्श पर पहुंच जाता है तो कोई जीवन भर फर्श पर लुढ़कता रहता है। कामयाबी किसी स्टॉर्टअप की हो या एंटरप्रेन्योर की, आधुनिक देश-दुनिया में वे नजीरें हमें प्रेरणा देती हैं, जिनकी महारत रेत से तेल बनाने या ग्लेशियर से लपटें उठाने जैसे हैरतअंगेज कारनामे कर चुकी हो, फिर वह अमेरिकी अरबपति रोज पेरॉट, ली मेयर हों या फिर भारत के धीरूभाई अंबानी...

धीरूभाई अंबानी और रोज पेटॉर
धीरूभाई अंबानी और रोज पेटॉर
हमारे देश में भी ऐसे कई सफल उद्यमी हुए हैं, जिनके कारनामे हमे आज भी प्रेरणा देते हैं। एक ऐसे ही कामयाब मीडिया मैन हुए डोरीलाल अग्रवाल। आगरा (उत्तर प्रदेश) के रहने वाले अग्रवाल शुरू में अपनी ताजनगरी में एक छोटे से अखबार में काम करते थे। एक दिन उन्होंने सोचा कि क्या वह जो कुछ इस अखबार के लिए करते हैं, खुद का ऐसा काम शुरू नहीं कर सकते हैं। यह धुन मन में समाई और वह भी चल पड़े जीवन के कठिन लेकिन बेहतर भविष्य की राहों पर।

किसी के हंसने और रोने पर न जाएं। अपनी सफलता, और असफलता की भी इबारत व्यक्ति खुद लिखता है। अपने कर्मों से। कोई अर्श पर पहुंच जाता है तो कोई जीवन भर फर्श पर लुढ़कता रहता है। कामयाबी किसी स्टॉर्टअप की हो या एंटरप्रेन्योर की, आधुनिक देश-दुनिया में वे नजीरें हमें प्रेरणा देती हैं, जिनकी महारत रेत से तेल बनाने या ग्लेशियर से लपटें उठाने जैसे हैरतअंगेज कारनामे कर चुकी हो। वह अमेरिकी अरबपति रोज पेरॉट, ली मेयर हों, भारत के धीरूभाई अंबानी।

आइए, सबसे पहले जानते हैं सफल अमेरिकी बिजनेसमैन रोज पेरॉट को। वह किस तरह फर्श से अर्श तक पहुंचे और दुनिया पर छा गए। इसके लिए उन्हें तमाम तरह के कठिन अनुभवों से गुजरना पड़ा। स्कूली शिक्षा के बाद आईबीएम में उन्हें काम का मौका तो आसानी से मिल गया, वहां भी वह अव्वल ही रहे लेकिन उन्हें हमेशा ये लगता रहा कि जीवन कुछ बड़ा कर दिखाने के लिए मिला है तो वह क्यों नहीं ऐसा कर दिखाएं। यहां रहते हुए तो वह ऐसा कुछ करने से रहे। वह इतने परिश्रमी और कुशाग्र थे कि आईबीएम का महीनो का टारगेट वह हफ्तों में पूरा कर डालते लेकिन निगाहें किसी और लक्ष्य की तलाश पर टिकी रहीं।

अपने भविष्य के कारनामों पर साथी कर्मियों और सीनीयर्स से भी समय-समय पर शेयर करते रहते लेकिन उन्हें कोई गंभीरता से नहीं लेता था। यह सब उन्हें बड़ा कड़वा-कड़वा सा लगता, लेकिन वह ऐसे विषघूंट चुपचाप मुद्दत तक पीते रहे। एक दिन यह सब बर्दाश्त बाहर हो चला और उन्नीस सौ साठ-सत्तर के दशक में वह आईबीएम की नौकरी को ठोकर मार वहां से भविष्य की ओर निकल पड़े। ज्यादा समय नहीं गुजरा होगा, जब उन्होंने अपनी कंपनी बनाई - इलेक्ट्रॉनिक डॉटा सिस्टम। यह काम भी उनका कड़ा इम्तिहान लेने लगा। बार-बार की असफलताएं उनका माथा धुनती रहीं लेकिन उन्होंने हार नहीं मानी। बताते हैं कि अपनी कंपनी की सेवाएं देने के लिए वह कमोबेश रोजाना ही सम्बंधित लोगों तक पहुंचते।

महीनो ऐसा चलता रहा। कोई सेवा लेने को तैयार नहीं लेकिन ऐसे जुझारू व्यक्ति को कभी न कभी तो कामयाब होना ही था, एक अदद पहली कामयाबी जब उन्हें मिली, उसके बाद उन्होंने फिर कभी पीछे मुड़ कर नहीं देखा। और एक दिन वह अमेरिका सुपर बिजनेस मैन में शुमार हुए। ऐसी ही एक कामयाब अरबति अमेरिका की ही सॉफ्टवेयर इंजीनियरिंग हैं ली मेयर। वह पहले नौकरी करती थीं, जबकि मन में दुनिया भर के आइडिया दिमाग ठकठकाते रहते। एक दिन उन्होंने आईटी सेक्टर में लगी लगाई नौकरी छोड़ दी। वह भी रोज पेरॉट की तरह चल पड़ीं जीवन के नए भविष्य की ओर, पूरी हिम्मत और समझदारी के साथ। उन्होंने खुद की इंटीरियर डिजाइनिंग कंपनी बनाई- हैवेन्ली।

सबसे पहले उन्होंने न्‍यूयॉर्क सिटी में घर खरीदकर उनके पांच कमरों का सजाया-धजाया। उस खूबसूरती को ललचायी निगाहों से लोग सराहने लगे। सजावट की चर्चाएं कानोकान पूरे शहर में पहुंचने लगीं। कई लोग उन्हें अपने घर की सजावटों के लिए बुलाने लगे। वह जाने लगीं। कमाई चल पड़ी। आइडिया बड़े बिजनेस का आकार लेने लगा। इस काम में उन्होंने अपनी बहन को भी साथ ले लिया। उनकी कंपनी के इंटीरियर डिजाइनिंग का काम अब ऑनलाइन चल पड़ा और देखते ही देखते वह अमेरिका की सौ करोड़ से ज्यादा के कारोबारियों में शुमार हो गई। उनका ऊंचा नाम फोर्ब्स मैग्जीन में आ गया।

हमारे देश में भी ऐसे कई सफल उद्यमी हुए हैं, जिनके कारनामे हमे आज भी प्रेरणा देते हैं। एक ऐसे ही कामयाब मीडिया मैन हुए डोरीलाल अग्रवाल। आगरा (उत्तर प्रदेश) के रहने वाले अग्रवाल शुरू में अपनी ताजनगरी में एक छोटे से अखबार में काम करते थे। एक दिन उन्होंने सोचा कि क्या वह जो कुछ इस अखबार के लिए करते हैं, खुद का ऐसा काम शुरू नहीं कर सकते हैं। यह धुन मन में समाई और वह भी चल पड़े जीवन के कठिन लेकिन बेहतर भविष्य की राहों पर। दैनिक 'उजाला' की नौकरी छोड़ वह अपने दोस्त माहेश्वरी के साथ अपना अखबार 'अमर उजाला' निकालने लगे। दोनो दोस्तों के छह बेटे भी एक-एक कर उनके काम में जुटते गए।

डोरीलाल की कठिन दिनचर्या होती। सुबह उठकर साइकिल पर अखबार लादते और निकल पड़ते आसपास के कस्बों की ओर दूर-दूर तक। गांव-गांव जाते। लौटकर अगले दिन के अखबार की तैयारी में लग जाते। दोस्त के साथ खबरें जुटाते, पेपर, मशीन आदि व्यस्थित करते। छोटे से दफ्तर में देर शाम तक खबरें, लेख आदि तैयार करते, मोनो कम्पोजिंग करते-कराते, अखबार छापते और अगली सुबह फिर उसी काम पर निकल पड़ते। चौबीस घंटे के दिन में लगभग अठारह से बीस घंटे अखबार के लिए। कानूनी पचड़ों में फंसकर आज 'अमर उजाला' अखबार तो डोरीलाल अखबार परिवार के पास नहीं रहा, लेकिन माहेश्वरी के पुत्र राजुल माहेश्वरी के नेतृत्व में वह आज उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड, दिल्ली, हिमाचल, हरियाणा आदि राज्यों में करोड़ों पाठकों तक पहुंच रहा है। उसका नाम देश के बड़े मीडिया घरानों में शुमार है।

औरों की तो बात छोड़िए, हमारे देश में एक थे धीरजलाल हीराचंद अंबानी, जिन्हें धीरुभाई भी कहा जाता है। रिलायंस उद्योग वाले आज के अंबानी बंधुओं के संघर्षशील पिता धीरुभाई का आज का विशाल अम्पायर कोई ऐसे ही नहीं खड़ा हो गया था। एक जमाने में वह भी पकौड़े बेंचा करते थे। उनका बचपन कठिन संघर्षों में गुजरा। उनके पिता टीचर थे। उनके गुजर जाने के बाद पूरे परिवार की जिम्मेदारी धीरजलाल पर आ गई। हाईस्कूल के बाद पढ़ाई छूट गई। उसके बाद वह हर शनिवार और रविवार को गिरनार पर्वत के पास चाट-पकौड़ी बेचने लगे।

उसकी आमदनी से घर-बार न संभलते देख 1949 में वह काबोटा नाम की शिप पर नौकरी करने निकल पड़े और दस साल बाद वहां से पचास हजार रुपये लेकर वतन लौटे। मसाले बेचने लगे। एक दिन वह फर्श छोड़ अर्श छूने लगे। 6 जुलाई 2002 को जब उनका देहावसान हुआ, उनकी रिलायंस कंपनी का सालाना टर्नओवर 62 हजार करोड़ तक पहुंच चुका था। आज उनकी कंपनी संभाल रहे पुत्र मुकेश अंबानी देश दुनिया के सबसे बड़े उद्योगपतियों में शुमार हैं। मुंबई में महल जैसा उनका सत्ताईस मंजिला घर एंटीलिया भी दुनिया के सबसे महंगे मकानों में एक है। औरो की तो छोड़िए, आज उनके घर के नौकरों की मासिक सेलरी दो-दो लाख रुपए है।

आज के ऐसे तमाम कामयाब नाम सुर्खियों में आते रहते हैं। पिछले दिनो फोर्ब्स इंडिया ने जब 30 अंडर-30 लिस्ट जारी की तो उनमें एक नाम आया हरियाणा की हॉकी खिलाड़ी सविता पूनिया का। भारतीय महिला हॉकी टीम की गोलकीपर सविता एशिया कप में बेस्ट प्ले प्रदर्शित कर चुकी हैं। लगभग डेढ़ सौ इंटरनेशनल मैच खेल चुकीं सविता के पिता महेन्द्र कुमार कहते हैं कि उन्हें बेटी का नाम इतना रोशन होने पर गर्व है। वह सपना देख रहे हैं कि बेटी किसी दिन गोल्डकप ले आए। और भी क्षेत्रों में भारतीय होनहार हुनर दिखा रहे हैं। छात्रों का एक समूह पहली बार संयुक्त राष्ट्र मुख्यालय में दुनिया भर के अंतरराष्ट्रीय राजनयिकों और नीति निर्माताओं के समक्ष कार्यक्रम की रूपरेखा पेश करने वाला है।

अगले महीने की 19 तारीख को न्यूयार्क स्थित संयुक्त राष्ट्र मुख्यालय में इस टीम के तीन छात्र अपनी परियोजनाओं से राजनयिकों और संस्थानों को अवगत कराएंगे। इसी तरह की एक अन्य कृषक-प्रतिभावान हैं राज पढियार, जिन्हें राष्ट्रीय स्तर पर 'यंग आंत्रप्रेन्योर ऑफ द ईयर-2017' का पुरस्कार मिला है। वह कहते हैं कि इंदौर शहर संभावनाओं से भरपूर है। यह एक स्टार्टअप हब होने के साथ ही एजुकेशन के स्तर पर भी अग्रणी है। यही कारण है कि मैंने इस जगह को अपने काम के लिए चुना और इस तरह करीब ढाई साल पहले 'डिजिटल गुरुकुल' की स्थापना हुई। मैं इस फील्ड से वर्षों से जुड़ा हूं। मैंने अपने काम के लिए अपनों से कोई मदद नहीं ली।

'डिजिटल गुरुकुल' एक एजुकेशनल इंस्टीट्यूट है। इसमें आजतक पांच हजार से अधिक लोग प्रशिक्षित हो चुके हैं। इसी तरह के आज के कामयाब युवा हैं बॉलीवुड एक्टर राजकुमार राव, क्रिकेटर हार्दिक पांड्या, सबसे कामयाब युवा प्रोड्यूसर प्रेरणा अरोड़ा आदि। नई पीढ़ी नए तरीके से तरक्की करती है। ये बदलाव कई बार बहुत सफल रहते हैं तो कई बार इनसे घाटा भी होता है। ऐसा भी हुआ है कि पुत्र की आइडियोलॉजी शुरुआत में सही नहीं होती, लेकिन बाद में उसके निर्णय सही लगने लगते हैं। अगर घर-परिवार के बड़े लोग नई उमर पर भरोसा कर उन्हें मौका दें और नई पीढ़ी अनुभवों का सम्मान कर पुराने तरीकों को बदलने के बजाय अपनी आइडियोलॉजी पर चले तो वह भी बिजनेस टायकून बन सकती है।

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पत्रकार/ लेखक/ साहित्यकार/ कवि/ विचारक/ स्वतंत्र पत्रकार हैं। हिन्दी पत्रकारिता में 35 सालों से सक्रीय हैं। हिन्दी के लीडिंग न्यूज़ पेपर 'अमर उजाला', 'दैनिक जागरण' और 'आज' में 35 वर्षों तक कार्यरत रहे हैं। अब तक हिन्दी की दस किताबें प्रकाशित हो चुकी हैं, जिनमें 6 मीडिया पर और 4 कविता संग्रह हैं।

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