धरती को बचाने वाली शख्सियत हैं जल-पुरुष राजेंद्र सिंह

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मैग्सेसे सम्मान से समादृत जल-पुरुष राजेंद्र सिंह दुनिया के उन पचास लोगों में शुमार हैं, जिनके भरोसे धरती को बचाया जा सकता है। वर्ष 1981 में अपनी शादी के कुछ समय बाद घर का सारा सामान बेचकर वह पानी की लड़ाई लड़ने निकल पड़े। आज उनके अनथक प्रयासों से करीब सात हजार जोहड़ों के निर्माण से राजस्थान के एक हजार गांव पानी के मामले में खुशहाल हो उठे हैं।

 पहले लोगों की पानी संबंधी जरूरतों की नदियों और तालाबों से भी आपूर्ति हो जाती थी लेकिन जब से ये जलस्रोत प्रदूषित हुए हैं, जीवन रक्षा के लिए भू-जल पर निर्भरता लोगों की पहली जरूरत बन गई है। भू-जल स्तर पिछले कुछ दशकों से तेजी नीचे जा रहा है। 

बारिश के दिनों की बात न करें, हर साल की गर्मियों या शुष्क-निठल्ले जाड़े के मौसम में लौट जाएं तो यह आकड़ा विचलित करता है कि हमारे देश में आज भी ढाई लाख गांव पानी के संकट से जूझ रहे हैं। मुद्दत से ऐसे पीड़ितों के साथ खड़े जल-पुरुष राजेंद्र सिंह अब तक देश की ऐसी दर्जनभर नदियों को पुनर्जीवित कर चुके हैं, जो उन क्षेत्रों के लोगों की लाइफ लाइन मानी जाती हैं। जल-पुरुष के अनथक श्रम और गहरे सामाजिक सरोकारों के चलते सूख चुकीं वे नदियां अब साल भर पानी से लबालब रहती हैं। गौरतलब है कि समुदायिक जल प्रबंधन के लिए ख्यात रहे राजेंद्र सिंह को मैग्सेसे पुरस्कार से सम्मानित किया जा चुका है।

पानी हमारे जीवन की मूलभूत अवश्यकता है। बारिश के दिनो को छोड़ बाकी आठो मास देश के कई इलाके पानी के ही संकट से सबसे ज्यादा जूझ रहे हैं। इस संकट को खत्म करने की ढेर सारी कोशिशें हुईं लेकिन जिस व्यक्ति की पहल को क्रांतिकारी कदम माना जाता है, वह हैं जल-पुरुष राजेंद्र सिंह। उन्होंने सबसे पहले राजस्थान में 1980 के दशक में पानी के संकट पर काम करना शुरु किया था। उन्होंने बारिश के पानी को धरती के भीतर पहुंचाने की प्राचीन भारतीय पद्धति को ही आधुनिक तरीके से अपनाया। इसमें छोटे-छोटे तालाबों का निर्माण किया जाता है, जो बारिश के पानी से लबालब भर जाते हैं और फिर इस पानी को धरती धीरे-धीरे सोख लेती है। शुरू में इस मुहीम में राजेंद्र सिंह अकेले थे, लेकिन उनकी मेहनत और लगन को देखते हुए धीरे-धीरे खासकर गांवों के लोग उनके साथ आते गए और कारवां बढ़ता गया। आज इस कारवां का नाम है - 'तरुण भारत संघ'। राजेंद्र सिंह के प्रयासों से पूरे राजस्थान में जोहड़ बनाकर बंजर धरती को हरियाली से लहलहाने की होड़ से लग गई।

जल-पुरुष राजेंद्र सिंह के प्रयासों से अब तक करीब सात हजार जोहड़ों का निर्माण हो चुका है, जिससे राजस्थान के एक हजार गांव पानी के मामले में खुशहाल हो उठे हैं। एक रिपोर्ट के मुताबिक हमारे देश में हर साल दो लाख से अधिक लोग शुद्ध पेयजल के अभाव में मर जाते हैं। हर साल गर्मियों में देश की आधी आबादी साफ पानी किल्लत का सामना करती है। पहले लोगों की पानी संबंधी जरूरतों की नदियों और तालाबों से भी आपूर्ति हो जाती थी लेकिन जब से ये जलस्रोत प्रदूषित हुए हैं, जीवन रक्षा के लिए भू-जल पर निर्भरता लोगों की पहली जरूरत बन गई है। भू-जल स्तर पिछले कुछ दशकों से तेजी नीचे जा रहा है। लाखों गांव-शहर पानी की किल्लत से जूझ रहे हैं। जिस वक्त देश का बंटवारा हुआ था, देश के 292 गांव पेयजल संकट से ग्रस्त थे, लेकिन आज उनकी संख्या लाखों में पहुंच चुकी है।

जल-पुरुष राजेंद्र सिंह की मुहिम आज समूचे भारत में फ़ैल चुकी है। दुनिया भर के लोग उनके काम को सराह रहे हैं। उनको स्टाकहोम में पानी का नोबेल पुरस्कार माने जाने वाले स्टॉकहोम वाटर प्राइज से भी नवाजा जा चुका है। इसके आलावा वर्ष 2008 में गार्डियन ने उन्हें 50 ऐसे लोगों की सूची में शामिल किया था, जो पृथ्वी को बचा सकते हैं। राजेन्द्र सिंह का जन्म 6 अगस्त 1959 को, उत्तर प्रदेश के बागपत जिले के डौला गाँव में हुआ था। हाई स्कूल पास करने के बाद उन्होंने आयुर्विज्ञान में डिग्री हासिल की। उसके बाद जनता की सेवा के भाव से गाँव में ही प्रेक्टिस, साथ ही जेपी आंदोलन में सक्रिय हो गए।

वर्ष 1981 में उनका विवाह हुए बस डेढ़ बरस ही बीते होंगे कि घर का सारा सामान बेचकर मिले कुल तेईस हजार रुपए लेकर पानी की लड़ाई लड़ने चल पड़े। उन्होंने ठान लिया कि वह पानी की समस्या का कुछ ठोस हल निकालेंगे। आठ हजार रुपये बैंक में डालकर शेष पैसा उनके हाथ में इस काम के लिए था। बाद में उनके चार और लोग आ जुटे- नरेन्द्र, सतेन्द्र, केदार और हनुमान। इन्ही पाँचों लोगों ने बाद में 'तरुण भारत संघ' नाम से गैर-सरकारी संगठन (एनजीओ) बनाया। दरअसल यह संस्था 1978 में जयपुर यूनिवर्सिटी द्वारा बनाई गई थी, लेकिन निष्क्रिय रही। राजेन्द्र सिंह ने उसी को फिर से जिन्दा कर दिया।

जल-पुरुष राजेंद्र सिंह बताते हैं- 'पिछले साढ़े तीन दशकों के दौरान उन्होंने लोगों की मदद से ग्यारह हजार आठ सौ एनीकट्स और चेक डैम बनाए हैं। हमने सूखे पड़े ढाई लाख कुओं को पुनर्जीवित किया है। सन् 1947 में जब भारत ब्रिटिश शासन से आजाद हुआ था, उस वक्त सिर्फ लगभग तीन सौ गांवों में पीने के पानी का संकट था, लेकिन आज यह संख्या बढ़कर ढाई लाख हो गई है। सूखे के मामले 10 गुना बढ़ चुके हैं और बाढ़ की आशंका आठ गुना ज्यादा हो गई है। वजह ये है कि ज्यादातर जल संसाधन प्रदूषण, कब्जे, रेत खनन और पानी के दोहन से प्रभावित हैं। दुनिया के बाकी हिस्सों की तुलना में भारत के पास सिर्फ चार फीसदी ताजा पानी है, लेकिन आबादी विश्व की 16 फीसदी है। आगामी एक दशक बाद भारत में पानी की मांग दोगुनी हो जाएगी और करोड़ों लोग अभूतपूर्व जल संकट का सामना करेंगे। विश्व में सबसे ज्यादा भूजल दोहन हमारे देश में हो रहा है। अगर हालात ऐसे ही रहे तो भविष्य में भूजल लगभग पूरी तरह निचुड़ सकता है। इसका जानलेवा दुष्प्रभाव समस्त जीव-जंतुओं, वनस्पतियों पर पड़ना लाजिमी है।'

हाल ही में राजेंद्र सिंह ने ऑल वेदर रोड के नाम पर हिमालय क्षेत्रों में हो रहे अंधाधुंध कटान और मलबे के अवैज्ञानिक निस्तारण पर घोर आपत्ति जताते हुए दावा किया है कि यदि हालात नहीं सुधरे, तो उत्तराखंड में वर्ष 2013 से भी बड़ी आपदा आ सकती है। गंगा के नाम पर भले ही मंत्रालय बना दिया गया, पर हकीकत यह है कि पिछले साढ़े चार साल में गंगा को अविरल बनाने के नाम पर एक भी काम नहीं हुआ है। ऑल वेदर रोड के निर्माण के लिए जिस तरह पहाड़ों को काटा जा रहा है, वह गलत है। पर्वतीय प्रदेशों में पहाड़ काटकर मलबे को नीचे खाई में धकेला जा रहा है। इससे पानी का प्राकृतिक फ्लो बंद हो जाएगा। मार्ग अवरुद्ध होने के बाद पानी का जमावड़ा एक बड़े विनाश को जन्म देगा।

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पत्रकार/ लेखक/ साहित्यकार/ कवि/ विचारक/ स्वतंत्र पत्रकार हैं। हिन्दी पत्रकारिता में 35 सालों से सक्रीय हैं। हिन्दी के लीडिंग न्यूज़ पेपर 'अमर उजाला', 'दैनिक जागरण' और 'आज' में 35 वर्षों तक कार्यरत रहे हैं। अब तक हिन्दी की दस किताबें प्रकाशित हो चुकी हैं, जिनमें 6 मीडिया पर और 4 कविता संग्रह हैं।

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