जम्हूरियत के शामियाने तले नौकरशाह

सख्त चुनाव आयुक्त की भूमिका में सियासी जमातों पर लगाम लगाती नौकरशाही को देखना जहां एक ओर सुखद अहसास देता है तो सियासत के सर्कस में नौकरशाहों को जोकर के किरदार में देखना आम नागरिक को शर्मसार कर जाता है। इस गरीब मुल्क में नौकरशाह अत्यन्त समृद्ध जीवन शैली को जीते हैं। राजनीतिज्ञ आते-जाते हैं, पर सत्ता तो यही चलाते हैं। शायद इसलिए डॉ लोहिया ने इन्हें असली राजा और स्थायी राजा कहा था। यहां पढ़ें नौकरशाहो की वर्तमान स्थिति पर प्रकाश डालती एक रपट...

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नौकरशाही, जम्हूरियत के शामियाने तले एक किस्म की ऐसी बेताज बादशाहत है, जो लोकशाही में भी राजशाही के जलजलों का जलवा दिखाती है। नौकरशाहों को प्रशासनिक व्यवस्था की रीढ़ माना जाता है। यह नीति निर्माता भी हैं तो उसके भंजक भी हैं। जनता के दर्द को सरकार तक पहुंचाने वाले रहबर हैं तो लोक कल्याणकारी योजनाओं को आम जन तक पहुंचाने की राह में डाका डालने वाले रहजन भी हैं। ये कौम सरकार बनाने और उसको सफल कराने का माद्दा रखती है। लोकतन्त्र के समर में कृष्ण की भांति संहारक और पालक दोनों प्रकार की शक्तियां इनमें पायी जाती हैं।

फोटो साभार: xpertxone
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सख्त चुनाव आयुक्त की भूमिका में सियासी जमातों पर लगाम लगाती नौकरशाही को देखना जहां एक ओर सुखद अहसास देता है तो सियासत के सर्कस में नौकरशाहों को जोकर के किरदार में देखना आम नागरिक को शर्मसार कर जाता है। इस गरीब मुल्क में नौकरशाह अत्यन्त समृद्ध जीवन शैली को जीते हैं। राजनीतिज्ञ आते-जाते हैं, पर सत्ता तो यही चलाते हैं।

दीगर सवाल ये है, कि जनता के धन से वैभवशाली जीवन जीने वाले नौकरशाह क्या आम जनता के प्रति अपनी जिम्मेदारी को अन्जाम देने के मुतालिक संजीदा हैं? क्या ये व्यवस्था के लोकतान्त्रिक मूल्यों को प्राणवायु प्रदान करने वाले वट वृक्ष की भूमिका निभाने में सफल हो रहे हैं या दीमक की तरह उसे सफाचट करने के काम को अन्जाम दे रहे हैं? सवाल का जबाव हमारे गांव की पगडंडियों से लेकर पैबन्द लगे राजमार्गों, जिले में जनता दरबार की प्रतीक्षारत लंबी कतार से लेकर राजधानी स्थित विभागीय मुख्यालय में लम्बित फाइलों के ढेर में मिल जायेगा...

विडम्बना है कि देश के सबसे बड़े ब्यूरोक्रेट कैडर का गर्व रखने वाले सूबे उत्तर प्रदेश के 592 सदस्यीय काडर से प्रान्त का आम जनमानस निराश है। जिस नौकरशाही की कल्पना संवैधानिक व्यवस्था के स्टील फ्रेम के रूप में की गई थी वह स्टील फ्रेम उत्तर प्रदेश में जंग खाकर भुरभुरा हो चला है। सूबे के समस्त विभागों में व्याप्त अनियमितता का कारक व वाहक यही नौकरशाह हैं, जो एमडी और डायरेक्टर की हैसियत से भ्रष्टाचार और अनियमितता को संस्थागत स्वरूप प्रदान करते हैं। इन्हीं की बदौलत सूबे का स्वास्थ्य महकमा स्ट्रेचर पर पड़ा है तो परिवहन विभाग पब्लिक से प्राइवेट में तब्दील हो रहा है। कानून-व्यवस्था दूर किसी पेड़ पर नग्न, क्षत-विक्षत अवस्था में उल्टी लटकी 'दूरदर्शन' का केंद्र बन गयी है तो शिक्षा विभाग शैक्षणिक कार्यों से इतर स्लेट, चाक, वर्दी, मिड-डे मील आदि के कमीशन की बंदरबाट की पढ़ाई में डिग्रियां हासिल कर रहा है। पंचायत विभाग स्वशासन की परिकल्पना से विमुख हो कर स्वहित का केंद्र बन गया है। यूं ही विभागों का नाम लेते रहिये और कभी न खत्म होने वाले नौकरशाही के कारनामों को गिनते रहिये। सूबे के पूर्व मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने इसे सार्वजनिक मंच से लगभग आधा दर्जन बार लताड़ दी थी और कारण, नौकरशाही के प्रथम पायदान अर्थात जनपदीय स्तर पर धरातलीय अन्वेषण से ज्ञात हो जायेगा।

लोहिया समग्र आवास योजना, राजनीतिक पेंशन योजना, प्रतिभा व योग्यता सम्मान योजना, कृषक ऋण माफी योजना, वूमेन पावर योजना, श्रवण यात्रा योजना, अन्नपूर्णा अन्त्योदय, वृद्धावस्था पेंशन योजना, मत्स्य पालन विकास योजना ,आसरा आवास योजना, कृषक दुर्घटना बीमा योजना, कन्या विद्याधन योजना सहित अनेक लोक कल्याणकारी योजनाओं का जिले में नियोजित बन्टाधार चीख-चीख कर नौकरशाही के जनोन्मुखी होने के मुखौटों को तोड़ देता है।

विडम्बना का स्तर देखिये कि जिस मौसम की बेवफाई (कभी सूखा तो कभी अति वृष्टि और ओला वृष्टि) ने अन्नदाता को आत्महंता बनने को मजबूर कर दिया, उस आसमानी उलझन को भी जिले के कलेक्टरों ने अपनी पीढिय़ों की दरिद्रता को मिटाने का अवसर बना लिया है। किसानों को मिले मुआवजों में अनियमितता की खबरें आये दिन अखबारों में छपती ही रहती हैं, लेकिन कमीशन के नावाचारी प्रयोगों में मसरूफ शायद ही किसी जिलाधिकारी ने समाधान के लिये कोई काम किया हो। राजधानी से सटे जनपद उन्नाव के किसान कुदरत सिंह पिछली बार के ओलावृष्टि में हुये नुकसान के बरक्स सरकारी मुआवजे के लिये हुए मुआयने पर खीझते हुए कहते हैं कि, लेखपाल की शिकायत डीएम साहब से किया था, लगभग दो दर्जन किसानों ने मिल कर ज्ञापन भी दिया था लेकिन कुछ कार्रवाई नहीं हुई। हां लेखपाल जरूर बुरा मान गया और अब पास भी नहीं भटकने नहीं देता।

सूबे के कुछ इलाके जैसे बाराबंकी, गोण्डा, फैजाबाद, बलरामपुर, बहराइच आदि हर साल बाढ़ की चपेट में आते हैं। पुनर्वास के लिये अनेक करोड़ की राशि प्रदेश मुख्यालय से आवंटित होती है, अब इससे ज्यादा त्रासदी क्या होगी कि यह राशि भी जिले के नौकरशाह के लिये 'बोन्जा आफर' का मुकाम रखती है। बड़े आश्चर्य का विषय है कि भारत में मेधा की प्रतीक नौकरशाही भी जेण्डर असमानता के रोग से अछूती नहीं है। हैरत है कि उत्तर प्रदेश के 592 सदस्यीय जम्बो काडर में लगभग पचास की संख्या में महिला आईएएस हैं। वैसे उ.प्र के अनेक जनपदों में महिला जिला अधिकारियों ने अपने कुशल प्रशासन से खासी ख्याति अर्जित की है।

किंजल सिंह, बी.चंद्रकला, सौम्या अग्रवाल, रौशन जैकब, शुभ्रा सक्सेना, कामिनी रतन चौहान, नीलम अहिलावत, डॉ. काजल, कंचन वर्मा, अदिती सिंह आदि वे नाम हैं जिन्होने सूबे की नौकरशाही को अपने नूतन प्रयोगों की रश्मियों से आलोकित किया है। अब ये संख्या इतनी कम क्यों हैं, ये तो विमर्श का विषय है किंतु उससे बड़ा विषय ये है कि भारत जैसे देश में जहां महिलाओं की स्थिति और उनके अधिकारों की रक्षा हमेशा ही विवादास्पद विषय रहा है, क्या एक महिला नौकरशाह के लिए तन्त्र में रहना और अपनी जिम्मेदारियों को अन्जाम देना पुरुष अधिकारी जितना आसान है?

हाल के वक्त में महिला नौकरशाहों के द्वारा अपने वरिष्ठ पुरुष अधिकारियों के खिलाफ यौन शोषण की भी शिकायतों में काफी इजाफा देखा जा रहा है। अभी हाल ही में पूर्वांचल के एक बड़े जिले के डीएम द्वारा अपनी साथी महिला आईएएस अधिकारी से छेडख़ानी करने के मामले ने बड़ा तूल पकड़ा था। इनके खिलाफ बाकायदा महिला अधिकारी ने शिकायत भी दर्ज करायी थी। इतना ही नहीं भारत की शीर्ष प्रशासनिक सेवा की प्रशिक्षु अधिकारी रिजु बाफना ने मध्य प्रदेश के मानवाधिकार आयोग में कार्यरत एक अधिकारी के विरुद्ध यौन उत्पीड़न की शिकायत दर्ज करायी है। दरअसल नौकरशाह ही सरकार के कामकाज के असल कर्ताधर्ता हैं। सरकारी नीतियों को लागू करने वाले हैं। इस तरह से वे शासक दल और सरकार की छवि का प्रतिनिधित्व करते हैं इसलिए उनसे अपेक्षा रखी गई थी कि वे आम लोगों से ऊपर दिखायी दें आचरण में, काम में, मर्यादा में और व्यवहार में। वे अलग तो दिखे किन्तु दूसरे सन्दर्भों में। पूर्व मुख्यमंत्री कल्याण सिंह कहते हैं कि नौकरशाह तो एक जंगली घोड़े की तरह होता है, उसे काबू करने के लिए सवार की जांघों में ताकत होनी चाहिए। अगर सवार कमजोर हुआ, तो घोड़ा तो अपनी मर्जी से बिदकेगा ही। दुर्भाग्य से सवार हमेशा से कमजोर रहा तो घोड़ा बेतरतीब दौड़ रहा है।

घटना 1949 की है। उस समय देश के पहले गृहमंत्री सरदार बल्लभ भाई पटेल का स्वास्थ्य काफी गिर चुका था जिसके चलते अपने निजी सचिव विद्या शंकर पर उनकी निर्भरता काफी बढ़ गई थी। होता यह था कि विद्या शंकर फाइलें उन्हें पढ़कर सुना देते और सरदार पटेल उस पर मौखिक रूप से अपनी राय दे देते। विद्या शंकर स्वयं ही उन सुझावों को टिप्पणी के रूप में लिख देते थे। एक बार गृह सचिव एचवीआर आयंगर ने गृहमंत्री को कुछ संस्तुतियां भेजीं। विद्या शंकर ने गलती करते हुए पहले उन पर अपनी टिप्पणियां लिख दीं और फिर सरदार पटेल को इसकी जानकारी दे दी जिन्होंने इस पर हामी भी भर दी। ये टिप्पणियां गृह सचिव के सुझावों के विपरीत थीं। एक लिहाज से ये स्थापित प्रक्रियाओं के विपरीत भी था। फाइल वापस आयंगर के पास पहुंची। आयंगर साहब को जब ये पता चला कि गृहमंत्री के निजी सचिव ने पहले ही फाइल पर टिप्पणी लिख दी थी तो वह परेशान हो गये अंतत: उन्होंने सरदार पटेल से भेंट की और ये कहते हुए उन्हें अपना इस्तीफा सौंप दिया कि यह उन्हें कतई स्वीकार्य नहीं है कि एक निजी सचिव गृह सचिव के सुझावों पर टिप्पणी करे। अपने सुझावों के समर्थन में उन्होंने गृहमंत्री के सामने काफी ठोस और असरदार तर्क भी रखे। सरदार पटेल ने बिना किसी झिझक के अपनी पुरानी टिप्पणी रद्द करते हुए आयंगर के सुझावों पर अपनी संस्तुति दे दी। सियासत और नौकरशाही के आपसी रिश्तों का यह किस्सा बताता है कि देश के पहले गृहमन्त्री के तहत काम करने वाले सभी अधिकारियों को बेझिझक होकर अपनी राय व्यक्त करने की छूट थी, भले ही वह गृहमन्त्री की निजी राय से कितनी भी भिन्न हो लेकिन मौजूदा हालातों में स्थिति काफी हद तक इसके बिल्कुल उलट है।

नौकरशाही के बारे में अब यह धारणा बन गयी है कि या तो वे नेताओं की चरणवन्दना करते हैं या उन्हें करनी होगी या फिर निलम्बन या स्थानान्तरण के रूप में ईमानदारी की कीमत चुकानी पड़ेगी। दुर्गा शक्ति नागपाल का मामला हो या मुजफ्फरनगर दंगे के बाद छुट्टी पर चले गये एडीजी (कानून व्यवस्था) अरुण कुमार का या आईजी अमिताभ ठाकुर का सभी में यह संदेश छिपा है।

किन्तु अध्ययन बताता है कि अधिकारियों के पार्टी प्रेम के खुले प्रदर्शन में उनकी बेबसी कम बेहयाई अधिक रहती है। विधायिका के आंगन में कार्यपालिका के मुजरा करने की खबरें तो आजादी के बाद से असंख्य दफे आयी हैं किन्तु हर बार ऐसी खबर एक बहस को जन्म दे जाती है। और जब वह सत्ताधारी पार्टी के वर्कर के रूप में आचरण कर समूची संस्था की आबरू को ही बेलिबास करने लगे तो सवाल उठने लाजिमी हैं। विडम्बना यह है कि ऐसे वाकये देश के सबसे बड़े सूबे उ.प्र. की झोली में कुछ ज्यादा ही मात्रा में हैं। कौन भूल सकता है बस्ती के जिलाधिकारी रहे अनिल कुमार दमेले के करतल नाद को! यूपी की नौकरशाही में ऐसे नमूने बेशुमार हैं। कोई अफसर अपने आका के तलवे चाटता है, कोई अपने मातहत से अपने जूते के तस्मे बंधवाता है। कोई अपने आकाओं की फटकार पर सर झुकाये खड़ा रहता है तो कोई अपने आका के हर गलत-सलत काम के लिए किसी पालतू नौकर की तरह तत्पर रहता है। चापलूसी की हद क्या हो सकती है, इसका अंदाजा लगाना शायद उत्तर प्रदेश में मुमकिन नहीं है। हालांकि यूपी में अधिकारियों द्वारा नेताओं की चरण वंदना करना आम बात हो गयी है। अधिकारियों को नेताओं के जूते उठाते हुए भी देखा गया है। बहुजन समाज पार्टी (बीएसपी) सरकार के शासनकाल में पुलिस उपाधीक्षक पद्म सिंह ने तत्कालीन मुख्यमंत्री की जूती साफ कर काफी सुर्खियां बटोरी थीं। सवाल उठता है कि आखिर देश के विकास का खाका खींचने से लेकर उसे अमलीजामा पहनाने वाली नौकरशाही आज चरणदासी क्यों बन गई है? कुछ ऐसा ही सवाल नब्बे के दशक में सूबे के मुख्यमंत्री रहे मुलायम सिंह ने आईएएस अधिकारियों के सालाना सर्विस वीक में मुख्य अतिथि के तौर पर अपने उद्बोधन में पूछा था कि-आप लोग इतने शिक्षित और विद्वान हैं, आपमें से कुछ लोग तो नोबल पुरस्कार पाने की क्षमता रखते हैं। आप जीवन के हर क्षेत्र में सफलता हासिल कर सकते हैं। समाज आपकी इज्जत करता है तो फिर आप लोग मेरे पैर छूने क्यों चले आते हैं? आप अपने निजी काम करवाने के लिए मेरे पास क्यों चले आते हैं? जब आप कोई मांग करते हैं तब हम आपकी इच्छा पूरी भी कर देते हैं। इसके बदले में हम इसकी कीमत वसूलते हैं। इसकी कीमत हम हजार बार वसूलते हैं।' सवाल बड़ा ही बेबाक और सच के काफी निकट था और यही सूबे के स्टील फ्रेम नौकरशाही के भुरभुरेपन का कारण भी है। दरअसल निजी हित, राजनीतिक महत्वाकांक्षा, भ्रष्टाचार, रिटायरमेन्ट के बाद का जुगाड़, क्षेत्रीय पार्टियों का उदय, गठबंधन की राजनीति, नौकरशाहों की अपनी अयोग्यता आदि जैसे कारणों ने मिलकर ऐसी स्थिति पैदा कर दी है जहां नौकरशाह संविधान से ज्यादा अपनी पार्टीगत निष्ठा के चलते मशहूर हो गये हैं।

हालात ये बन चुके हैं कि उत्तर प्रदेश में सरकारों के परिवर्तन के साथ ही अधिकारियों की बनती-बिगड़ती हैसियत की भविष्यवाणी लगभग 99 प्रतिशत सटीकता के साथ की जा सकती है। कुल एक प्रतिशत ही नौकरशाह हैं जो झाड़-पोछ कर अपने 'काडर' के अलावा भी काम बना लेते हैं। अधिकारियों का पार्टीगत आधार पर इतना स्पष्ट बंटवारा शायद ही कहीं देखने को मिले। ऐसा कैसे होता है कि नई सरकार के वजूद में आने के पहले ही पंचम तक पहुंचने वाले अधिकारियों की सूची चर्चा में आ जाती है। ऐसे अधिकारियों की क्या खूबी और क्या खामी होती है कि वे किसी मुख्यमंत्री की नाक के बाल बनकर काबिल अफसर माने जाते हैं तो अगले मुख्यमंत्री के लिए नाकारा या फिर 'विरोधी खेमे' का मानकर राजस्व परिषद जैसी किसी महत्वहीन पोस्टिंग के लायक मान लिये जाते हैं। वरिष्ठ भाजपा नेता हृदय नारायण दीक्षित कहते हैं, 'प्रशासनिक व्यवस्था के अधिकारी अपनी असहमति का अधिकार खो बैठे हैं। पहले नेताओं और नौकरशाहों के बीच एक स्पष्ट सीमा रेखा खिंची हुई थी। नेता नीतियां बनाते थे। नौकरशाह उसमें सही-गलत का सुझाव देते थे फिर उसे लागू करते थे। आज उत्तर प्रदेश में वह सीमा रेखा मिट चुकी है।हालात 1989 के बाद ज्यादा बिगड़े हैं। इसी साल मुलायम सिंह यादव पहली बार उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री बने और यही वह समय भी था जब देश में मंडल आयोग की सिफारिशें लागू हुई थीं। 

मंडल से पहले अधिकारियों का बंटवारा ब्राह्मण और गैरब्राह्मण के आधार पर होता था। मंडल के बाद यह बंटवारा ओबीसी, एससी-एसटी और जनरल की शक्ल में हो गया। 1989 में मुलायम सिंह यादव की सरकार आने के बाद यह समस्या गहराने लगी। क्षेत्रीय और जातिगत अस्मिता की राजनीति करने वाले यादव ने अपने विश्वासपात्र अधिकारियों का गुट बनाना शुरू कर दिया, हम कह सकते हैं कि पार्टीगत विचारधारा पर बंटवारे की नींव यहीं से पड़ी।

1989 के बाद एक-दो अवसरों को छोड़ दें तो सपा और बसपा नियमित अंतराल पर उत्तर प्रदेश की सत्ता में आती-जाती रही हैं। इसी दरम्यान मंडल कमीशन की सिफारिशें लागू हो जाने के बाद नौकरशाही में पिछड़े तबकों के अधिकारियों की आमदरफ्त भी तेज हो गई थी। स्वाभाविक रूप से पिछड़े तबके के ज्यादातर अधिकारी पिछड़ा राजनीति करने वाले मुलायम सिंह यादव के करीब चले गये। इसी तरह दलित अधिकारियों की फौज मायावती के इर्द-गिर्द इकट्ठी होने लगी। इस दौरान एक और बदलाव हुआ, सवर्ण राजनीति के दिन लद गए तो सवर्ण अधिकारियों ने भी अपने लिए छांव तलाशना शुरू कर दिया और अपनी सुविधा के हिसाब से इन अधिकारियों ने भी सपा-बसपा का चुनाव कर लिया। मुलायम सिंह की तुलना में मायावती ने इस चलन को अलग कारण से कुछ ज्यादा ही तूल दिया। ब्यूरोक्रेसी में जाति की खाई को आप यूं महसूस कर सकते हैं कि जो नौकरशाह वर्ग एक समूह में दुर्गा शक्ति नागपाल के निलम्बन का विरोध करने मुख्यमंत्री के पास जाते हैं, वही अधिकारी पदोन्नति में आरक्षण जैसे मुद्दे पर एक-दूसरे के घनघोर विरोधी बन जाते हैं। जातिवाद का एक और चलन भी पिछली सरकार में उभार पर दिखाई दिया। दूसरे कैडरों के ऐसे तमाम अधिकारी हैं जिन्होंने सपा की सरकार बनने के बाद लखनऊ कूच कर दिया है। इनमें से ज्यादातर अधिकारी यादव शे या फिर वे जो सपा के करीबी रहे। अनूप यादव (महाराष्ट्र कैडर), यशस्वी यादव (महाराष्ट्र कैडर), धर्मेंद्र यादव (महाराष्ट्र कैडर) आदि।

जाहिर है कि ये अधिकारी सिर्फ सामाजिक सेवा या भलमनसाहत में उत्तर प्रदेश का रुख नहीं किये थे। इन्हें एक विश्वास है जिसके भरोसे इन्होंने लखनऊ का रुख किया है। कह सकते हैं कि विभिन्न कैडरों से अधिकारियों का आना-जाना लगा रहता है पर उत्तर प्रदेश में जो चलन दिखा वह कुछ और भी इशारे करता है। आखिर ये सारे अधिकारी यादव ही क्यों हैं या फिर सिर्फ यादव अधिकारियों को क्यों कैडर बदल कर यूपी लाया गया? इससे पहले इन अधिकारियों ने बसपा के कार्यकाल में उत्तर प्रदेश का रुख करने की इच्छा क्यों नहीं जताई? नौकरशाहों के पार्टियों के प्रति झुकाव को एक और स्थिति से समझा जा सकता है।

उत्तर प्रदेश में आईएएस अधिकारियों के कुल 592 पद हैं। इनमें से लगभग 200 पद रिक्त पड़े हैं। प्रदेश की सत्ता में काफी महत्वपूर्ण पद पर बैठे एक आईएएस अधिकारी इसे इस तरह से बताते हैं, 'अधिकारियों के टोटे का नतीजा यह है कि एक-एक अधिकारी के पास तीन-तीन, चार-चार विभागों की जिम्मेदारी आ जाती है। इस चक्कर में अधिकारी कई-कई नेताओं और मन्त्रियों के सम्पर्क में रहता है और जब भी उसे जरुरत पड़ती है वह येन-केन प्रकारेण अपना काम किसी न किसी नेता या मन्त्री के जरिए निकाल लेता है। दोनों के बीच आपस में बेहद गहरा तालमेल बन गया है।'

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लेखक / पत्रकार

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