आखिरी सांस तक हिंदुस्तान के होकर रहे निदा फाजली

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मुक़्तदा हसन निदा फ़ाज़ली उस मरहूम शायर का नाम है, जिसने अपना घर-बार अपनी आंखों के सामने ग्वालियर से उजड़ कर पाकिस्तान में जा बसते देखा, बेबाक बयानी के चलते हिंदुस्तान के अदीबों का भी बहिष्कार झेलते रहे, लेकिन आखिरी सांस तक इसी वतन का होकर रहे। वह दो साल पहले आज (08 फरवरी) ही के दिन दुनिया छोड़ चले थे। जाते-जाते पूरे देश की मिट्टी को अपने लफ्जों से महका गए। उन्होंने सच ही लिखा कि 'कभी किसी को मुकम्मल जहाँ नहीं मिलता', उन्हें भी कहां मिल सका!

निदा फाजली (फोटो साभार- रेख्ता)
निदा फाजली (फोटो साभार- रेख्ता)
 जाते समय वह निदा को भी साथ ले जाना चाहते थे, लेकिन उन्होंने यह कहते हुए इनकार कर दिया कि उन्हें अपने वतन से बेइंतहा प्यार है, वह इसे छोड़कर पाकिस्तान नहीं जाएंगे, और वह नहीं गए, हमेशा के लिए हिंदुस्तान के ही होकर रह गए।

हिन्दी और उर्दू के मशहूर शायर मरहूम मुक़्तदा हसन निदा फ़ाज़ली दो साल पहले 2016 में आज (8 फ़रवरी) ही के दिन दुनिया को अलविदा कह गए थे। एक दिन जब उनसे किसी ने सवाल किया था कि क्या वह बच्चों को अल्लाह से बड़ा समझते हैं तो उन्होंने एक बड़ी मासूम सी बात कही थी- 'मैं केवल इतना जानता हूँ कि मस्जिद इंसान के हाथ बनाते हैं, जबकि बच्चे को अल्लाह अपने हाथों से बनाता है। 'घर से मस्जिद है बड़ी दूर, चलो ये कर लें, किसी रोते हुए बच्चे को हँसाया जाए।' सिर्फ बच्चों से ही नहीं, उन्हें तो हर उस शख्स से प्यार था, जिसे इंसान कहते हैं। उनके व्यक्तिगत जीवन की सच्चाई तो ये रही है कि उनको प्‍यार ने ही शायर बना दिया।

जब वह कॉलेज में पढ़ते थे, उनके आगे की बेंच पर रोजाना एक लड़की बैठा करती थी। आहिस्ता-आहिस्ता उसके लिए उनके दिल में कुछ सुगबुगी होने लगी थी। वह उससे बेकरारी का लगाव महसूस करने लगे थे पर एक दिन नोटिस बोर्ड पर पढ़ने को मिला, “Miss Tondon met with an accident and has expired”। उस दिन निदा का दिल रो उठा था। उसकी यादों के लफ्जों ने उनके दिल को जकड़ सा लिया। वह अकेले में सिसकते रहे। उन दिनो शायरी ने आहिस्ते से उनकी कलम को छुआ, सहलाया। उस हादसे के कुछ वक्त बाद वह एक दिन जब अपने मोहल्ले के मंदिर की बगल से होते हुए कहीं जा रहे थे, उनके कानों में सूरदास के भजन पड़े- 'मधुबन तुम क्यौं रहत हरे? बिरह बियोग स्याम सुंदर के ठाढ़े क्यौं न जरे?'

यानी गोपियां मधुवन से पूछ रही हैं, हमारे प्यारे कृष्ण तो मथुरा नगरी छोड़कर द्वारकापुरी चले गए और तुम बेशर्मी से हरे-भरे बने हुए हो, तुम सूख क्यों नहीं गए।' इस तरह शायरी के लय-ताल की उनके दिल में पदचाप सुनाई दी, सहपाठी छात्रा के अत्यंत दुखद बिछोह पहले से मन को मथ ही रहा था, शब्द बाहर आने के लिए उमगने, उकसाने लगे और कलम चल पड़ी। उन्हीं दिनो उन्होंने महाकवियों कबीरदास, सूरदास, मीरा, रसखान के साथ ही बड़े शायरों को जमकर पढ़ा और लिखने की ओर तेजी से उन्मुख हो चले -

बेनाम-सा ये दर्द ठहर क्यों नहीं जाता।
जो बीत गया है वो गुज़र क्यों नहीं जाता।
सब कुछ तो है क्या ढूँढ़ती रहती हैं निगाहें,
क्या बात है मैं वक़्त पे घर क्यों नहीं जाता।
वो एक ही चेहरा तो नहीं सारे जहाँ में,
जो दूर है वो दिल से उतर क्यों नहीं जाता।
मैं अपनी ही उलझी हुई राहों का तमाशा,
जाते हैं जिधर सब, मैं उधर क्यों नहीं जाता।
वो ख़्वाब जो बरसों से न चेहरा, न बदन है,
वो ख़्वाब हवाओं में बिखर क्यों नहीं जाता।

12 अक्तूबर 1938 को जनमे निदा फ़ाज़ली बचपन के दिनो में अपने मशहूर शायर पिता मुर्तुज़ा हसन, माँ जमील फ़ातिमा और भाई के साथ दिल्ली में रहते थे। निदा फ़ाज़ली तो उनका शायरी का नाम है। निदा मायने स्वर, आवाज़ और फ़ाज़िला क़श्मीर के एक इलाके का नाम है, जहाँ से निदा के पुरखे आकर दिल्ली में बस गए थे, इसलिए उन्होंने अपने उपनाम में फ़ाज़ली जोड़ लिया था। बाद में यह परिवार ग्वालियर (म.प्र.) में जाकर बस गया। निदा की पढ़ाई-लिखाई वहीं के कॉलेज में हुई।

उन दिनो उनके पिता और बड़े भाई हिंदुस्तानी शायरी की दुनिया में खूब नाम कमा रहे थे। हिन्दू-मुस्लिम क़ौमी दंगों से तंग आ कर एक दिन वे अचानक पाकिस्तान चले गए। वहीं बस गए। जाते समय वह निदा को भी साथ ले जाना चाहते थे, लेकिन उन्होंने यह कहते हुए इनकार कर दिया कि उन्हें अपने वतन से बेइंतहा प्यार है, वह इसे छोड़कर पाकिस्तान नहीं जाएंगे, और वह नहीं गए, हमेशा के लिए हिंदुस्तान का ही होकर रह गए-

अपना गम लेके कहीं और न जाया जाए
घर में बिखरी हुई चीज़ों को सजाया जाए
जिन चिरागों को हवाओं का कोई खौफ़ नहीं
उन चिरागों को हवाओं से बचाया जाए
बाग़ में जाने के आदाब हुआ करते हैं
किसी तितली को न फूलों से उड़ाया जाए
ख़ुदकुशी करने की हिम्मत नहीं होती सब में
और कुछ दिन अभी औरों को सताया जाए
घर से मस्जिद है बहुत दूर चलो यूँ कर लें
किसी रोते हुए बच्चे को हँसाया जाए

और एक दिन पाकिस्तान में अपने अब्‍बा का इंतकाल हो जाने पर उन्होंने ये लाजवाब नज्म़ लिखी -

तुम्हारी कब्र पर मैं
फ़ातेहा पढ़ने नही आया,
मुझे मालूम था, तुम मर नही सकते
तुम्हारी मौत की सच्ची खबर
जिसने उड़ाई थी, वो झूठा था,
वो तुम कब थे?
कोई सूखा हुआ पत्ता, हवा मे गिर के टूटा था ।
मेरी आँखे
तुम्हारी मंज़रो मे कैद है अब तक
मैं जो भी देखता हूँ, सोचता हूँ
वो, वही है
जो तुम्हारी नेक-नामी और बद-नामी की दुनिया थी ।
कहीं कुछ भी नहीं बदला,
तुम्हारे हाथ मेरी उंगलियों में सांस लेते हैं,
मैं लिखने के लिये जब भी कागज कलम उठाता हूं,
तुम्हे बैठा हुआ मैं अपनी कुर्सी में पाता हूं |
बदन में मेरे जितना भी लहू है,
वो तुम्हारी लगजिशों नाकामियों के साथ बहता है,
मेरी आवाज में छुपकर तुम्हारा जेहन रहता है,
मेरी बीमारियों में तुम मेरी लाचारियों में तुम |
तुम्हारी कब्र पर जिसने तुम्हारा नाम लिखा है,
वो झूठा है, वो झूठा है, वो झूठा है,
तुम्हारी कब्र में मैं दफन तुम मुझमें जिन्दा हो,
कभी फुरसत मिले तो फ़ातेहा पढ़।

पिता और भाई के रहते तो हिंदुस्तानी शायरों, मुशायरे के संयोजकों ने उन्हें कोई तवज्जो नहीं दी, घर वालो के पाकिस्तान चले जाने के बाद जब उनको सन 1960 के दशक में रोजी-रोटी, घर-गृहस्थी की चिंताओं ने तोड़ना शुरू किया तो वह काम-धाम की फिक्र में अटकते-भटकते एक दिन मुंबई पहुंच गए। वहां धर्मयुग, ब्लिट्ज़ जैसी पत्र-पत्रिकाओं में लिखने लगे। उसी से रोजी-रोटी चल निकली। वह मशहूर होने लगे। तब तक 1968 में उनका उर्दू का पहला संग्रह भी छप गया। प्रसिद्ध फ़िल्म निदेशक कमाल अमरोही की उन पर नजर पड़ी। उन दिनों वह हेमा मालिनी, धर्मेन्द्र को लेकर फ़िल्म 'रज़िया सुल्तान' बना रहे थे। उसके गीत जावेद अख्तर के पिता जाँ निसार अख़्तर लिख रहे थे। अचानक उनका निधन हो गया।

गौरतलब है कि जाँ निसार अख़्तर भी ग्वालियर के ही रहने वाले थे। उनसे कमाल अमरोही को निदा के बारे में जानकारी मिल चुकी थी। कमाल अमरोही ने निदा से संपर्क किया। उन्हें फ़िल्म 'रज़िया सुल्तान' के वे दो गाने लिखने को कहा गया, जिन्हें लिखने से पहले ही जाँ निसार अख़्तर गुजर चुके थे। निदा ने वो दो गाने लिखे, 'तेरा हिज्र मेरा नसीब है, तेरा गम मेरी हयात है' और 'आई ज़ंजीर की झन्कार, ख़ुदा ख़ैर करे', जो आगे चलकर छा गए। उसके बाद निदा ने एक से एक मशहूर होते फिल्मी गाने लिखे - 'होश वालों को खबर क्या, बेखुदी क्या चीज है' (सरफ़रोश), 'कभी किसी को मुक़म्मल जहाँ नहीं मिलता' और 'तू इस तरह से मेरी ज़िंदग़ी में शामिल है' (आहिस्ता-आहिस्ता), 'चुप तुम रहो, चुप हम रहें' (इस रात की सुबह नहीं) आदि।

उन्होंने बाद में टीवी सीरियल 'सैलाब' का शीर्षक गीत भी लिखा। उधर, एक-एक कर उनके कई संग्रह भी प्रकाशित होते गए- लफ़्ज़ों के फूल, मोर नाच, आँख और ख़्वाब के दरमियाँ, खोया हुआ सा कुछ, आँखों भर आकाश, सफ़र में धूप तो होगी, दीवारों के बीच, दीवारों के बाहर, संस्मरणों में मुलाक़ातें, तमाशा मेरे आगे आदि। उन्होंने कई किताबों का संपादन भी किया - बशीर बद्र : नयी ग़ज़ल का एक नाम, जाँनिसार अख़्तर : एक जवान मौत, दाग़ देहलवी : ग़ज़ल का एक स्कूल, मुहम्मद अलवी : शब्दों का चित्रकार, जिगर मुरादाबादी : मुहब्बतों का शायर आदि। खोया हुआ सा कुछ पर उन्हें 1998 में साहित्य अकादमी पुरस्कार मिला। 2003 में फ़िल्म 'सुर' के गीत 'आ भी जा' के लिए श्रेष्ठतम गीतकार का पुरस्कार मिला।

इसके अलावा मध्यप्रदेश सरकार का मीर तकी मीर पुरस्कार, खुसरो पुरस्कार, महाराष्ट्र उर्दू अकादमी का श्रेष्ठतम कविता पुरस्कार, बिहार उर्दू अकादमी पुरस्कार, उत्तर प्रदेश उर्दू अकादमी का पुरस्कार, हिन्दी उर्दू संगम पुरस्कार, राजस्थान का मारवाड़ कला संगम पुरस्कार, पंजाब और लुधियाना के पुरस्कारों के साथ ही वर्ष 2013 में पद्मश्री सम्मान भी मिला। संस्मरण की किताब ‘मुलाकातें’ में उन्होंने हिंदुस्तान के कई बड़े लेखकों की कारस्तानियां खोलकर रख दीं, जिसे उन्हें एक बड़े वर्ग के बहिष्कार की पीड़ा झेलनी पड़ी -

हरेक बात पे चुप रहके क्यूं सुना जाए,

कभी तो हौसला करके कुछ कहा जाए।

उन्होंने जहां कुछ लेखकों के बारे में संस्मरण की किताब में बेबाकी दिखाई, वही देश के मशहूर कवि दुष्यंत कुमार के तेवरों पर वह फिदा रहते थे। उन्होंने लिखा कि 'कभी मिर्ज़ा ग़ालिब के प्रख्यात आलोचक अब्दुर्रहमान बिजनौरी ने कहा था- 'भारत में दो ही महत्वपूर्ण पुस्तकें हैं, वेद मुकद्दस (पावन) और दूसरा दीवाने ग़ालिब।' पता नहीं अब्दुर्रहमान बिजनौरी को वेदों की संख्या का ज्ञान था या नहीं लेकिन एक पुस्तक की चार ग्रंथों से तुलना तर्क संगत नहीं लगती। फिर भी यह वाक्य बिजनौर के एक क़लमकार की कलम से निकला और पूरे उर्दू-संसार में मशहूर हुआ। इस नगर के साथ दूसरा नाम जो याद आता है वह हिंदी ग़ज़लकार दुष्यंत कुमार का है।

उज्जैन नगरी के राजा दुष्यंत के सदियों बाद बिजनौर की धरती ने एक और दुष्यंत कुमार को जन्म दिया। इस बार वह राजा नहीं थे, त्यागी थे। दुष्यंत कुमार त्यागी। इस दुष्यंत कुमार त्यागी के पास न राजा का अधिकार था, न अंगूठी का उपहार और न ही पहली नज़र में होने वाला प्यार था। 20वीं सदी के दुष्यंत को कालीदास के युग की विरासत में से बहुत कुछ त्यागना पड़ा। इस नए जन्म में वह आम आदमी थे। आम आदमी का समाज उनका समाज था। आम आदमी की लड़ाई में शामिल होना उनका रिवाज़ था। आम आदमी की तरह उनकी मंजिल भी सड़क, पानी और अनाज था- 'इस नुमाइश में मिला वह चीथड़े पहने हुए, मैंने पूछा कौन, तो बोला कि हिंदुस्तान हूँ।'

यहाँ तक आते-आते सूख जाती है कई नदियाँ, हमें मालूम है पानी कहाँ ठहरा हुआ होगा। कहाँ तो तय था चिराग़ाँ हरेक घर के लिए कहाँ चिराग़ मयस्सर नहीं शहर के लिए। उनकी ग़ज़लों के संग्रह ‘साए में धूप’ उनके जीवन की आख़िरी पुस्तक है। दुष्यंत की नज़र उनके युग की नई पीढ़ी के ग़ुस्से और नाराज़गी से सजी बनी है। यह ग़ुस्सा और नाराज़गी उस अन्याय और राजनीति के कुकर्मो के ख़िलाफ़ नए तेवरों की आवाज़ थी, जो समाज में मध्यवर्गीय झूठेपन की जगह पिछड़े वर्ग की मेहनत और दया की नुमानंदगी करती है। दुष्यंत साहित्य में बहुत कुछ कर के और जीवन की बड़ी धूप-छाँव से गुज़र के ग़ज़ल विधा की ओर आए थे।' चाहे परिवार के पाकिस्तान जाने का वक्त रहा हो या हिंदुस्तान में रोजी रोटी के लिए ठोकरें खाने के दुर्दिन, उन्होंने अपनी साफगोई से कभी नजर नहीं चुराई -

अपनी मर्ज़ी से कहाँ अपने सफ़र के हम हैं
रुख हवाओं का जिधर का है, उधर के हम हैं।
पहले हर चीज़ थी अपनी मगर अब लगता है
अपने ही घर में, किसी दूसरे घर के हम हैं।
वक़्त के साथ है मिट्टी का सफ़र सदियों से
किसको मालूम, कहाँ के हैं, किधर के हम हैं।
जिस्म से रूह तलक अपने कई आलम हैं
कभी धरती के, कभी चाँद नगर के हम हैं।
चलते रहते हैं कि चलना है मुसाफ़िर का नसीब
सोचते रहते हैं, किस राहगुज़र के हम हैं।
गिनतियों में ही गिने जाते हैं हर दौर में हम
हर क़लमकार की बेनाम ख़बर के हम हैं।

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पत्रकार/ लेखक/ साहित्यकार/ कवि/ विचारक/ स्वतंत्र पत्रकार हैं। हिन्दी पत्रकारिता में 35 सालों से सक्रीय हैं। हिन्दी के लीडिंग न्यूज़ पेपर 'अमर उजाला', 'दैनिक जागरण' और 'आज' में 35 वर्षों तक कार्यरत रहे हैं। अब तक हिन्दी की दस किताबें प्रकाशित हो चुकी हैं, जिनमें 6 मीडिया पर और 4 कविता संग्रह हैं।

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