22 स्कूलों की 2 हजार लड़कियों की हाइजीन की जरूरतों को पूरा करने में लगी है एक दंपत्ति

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अक्सर लोगों की धारणा होती है कि जिनके पास धन-दौलत होती है वो ही लोग दूसरों की मदद कर सकते हैं, लेकिन इस धारणा को तोड़ा है गुजरात के सूरत में रहने वाले मीना मेहता और अतुल मेहता नाम के एक दंपत्ति ने। ये दंपत्ति पिछले साढ़े चार सालों से वो काम कर रहा है जिसे आप और हम सोच भी नहीं सकते। मीना मेहता और उनके पति सूरत के 22 सरकारी स्कूलों में 2 हजार लड़कियों को हर महीने एक ऐसी किट देते हैं जो उनकी हाइजीन की जरूरतों को पूरा करता है। इस किट में एक सेनेटरी नैपकीन, दो पैंटी, एक साबुन, एक टूथ ब्रश और 4 शैम्पू के सैशे होते हैं। ये किट उन्हीं लड़कियों को दी जाती है जो आर्थिक तौर पर कमजोर हैं। इस दंपत्ति की कोशिश से स्कूल में पढ़ने वाली लड़कियों की संख्या पर भी असर पड़ा है।

मीना मेहता के मुताबिक वो इस काम को महीने में कोई एक दिन करती हैं, क्योंकि उनका मानना है कि 

“अगर मैं महीने का कोई एक दिन तय कर दूंगीं तो ये लड़कियां उसी दिन स्कूल आयेंगी, इसलिए स्कूल में लड़कियों की उपस्थिती बढ़ाने के लिए मैं कभी भी स्कूल पहुंच कर इस काम को करती हूं। मेरे इस काम से लड़कियों के स्कूल छोड़ने की दर में भी कमी आई है।” 

मीना इसके अलावा एक मूक-बधिर स्कूल और एक ब्लाइंड स्कूल में भी इस किट को बांटती हैं। साथ ही हर महीने की 28 तारीख को शाम 6 से 7 के बीच वो सार्वजनिक पार्क में भी गरीब औरतों और लड़कियों को ये किट देती हैं।

मीना के मुताबिक, 

"ये लड़कियां स्लम से आती हैं पहले इनके पास ये सामान नहीं था और वो बहुत ही गंदगी से रहती थीं। जिस माहौल से ये लड़कियां आती थीं वहां पर रोजमर्रा की जरूरतों के बाद इन सब चीजों के लिए उनके पास पैसा ही नहीं रहता। इस किट के इस्तेमाल करने के बाद ना सिर्फ उनकी जिंदगी बदली है बल्कि वो पहले के मुकाबले ज्यादा साफ सुंदर रहने के अलावा हाइजीन का ख्याल रहने लगी हैं।"

मीना के मन में ऐसा करने का ख्याल तब आया जब साल 2004 में दक्षिण भारत में सुनामी आया था। उस वक्त इंफोसिस की चैयरपर्सन सुधा मूर्ति ने सुनामी वाले इलाकों मे 4 ट्रक सैनेटरी नैपकीन भिजवाए थे। इससे जुड़ा लेख उन्होंने एक अखबार में पढ़ा था। मीना मेहता को सुधा मूर्ति का ये काम बहुत पसंद आया था और तब उन्होंने सोच लिया था कि अगर वो कभी भी समाज के लिए कोई काम करेंगीं तो वो इसी काम को करेंगीं।

इस काम को जब मीना और उनके पति ने शुरू किया तो लोगों ने उनकी आलोचना करनी शुरू कर दी। कुछ लोगों ने तो यहां तक कहा कि ये गंदा काम है और तुम्हें अगर समाज सेवा करनी है तो तुम ऐसी लड़कियों को खाना और कपड़ा दो इससे तुम्हारा नाम भी होगा। ऐसी आलोचनाओं से बेपरवाह मीना और उनके पति की सोच ही अलग थी। इन लोगों का मानना था कि स्कूलों में लड़कियों को मिड-डे मिल के तहत खाना तो मिलता ही है। इसलिए किसी की परवाह किये बगैर उन्होंने इस काम को शुरू कर दिया। जिससे आज इन लड़कियों में बहुत ही आत्मविश्वास आया है और वो लड़कियां मीना से कहतीं हैं कि “दादी इन सबके इस्तेमाल से हमें बहुत आराम मिलता है और अब हम पीरियड्स के दिनों में भी आराम से स्कूल आते हैं। जबकि पहले ऐसा नहीं था”

मीना का कहना है कि कुछ लोग उनसे कहते हैं कि फ्री में सामान देकर आप लड़कियों को बिगाड़ रहीं हैं। जिसके जवाब में मीना का कहना हैं कि 11 से 14 साल की लड़की कहां कमाने जाएंगी। उनकी मां जब उनकी छोटी छोटी जरूरतें पूरी नहीं कर पातीं तो वो उनके लिए सैनेटरी पैड कहां से खरीदेगी। वो बताती हैं कि पहले ये लड़कियां पीरियड्स के दौरान गंदे कपड़ों का इस्तेमाल करतीं थी, इनसे उनके शरीर में अनेक बीमारियां फैलने का डर रहता है, लेकिन उनकी इस कोशिश से हालात बदले हैं और लड़कियां पहले के मुकाबले कम बीमार हो रही हैं। हालांकि सब लोग मीना की इस कोशिश का विरोध नहीं करते कुछ ऐसे भी लोग हैं जो इस काम में मदद करना चाहते हैं। इसके लिये मीना ऐसे लोगों को उन वेंडरों का पता दे देती हैं जिनसे वो ये सामान खरीदती हैं। इसके अलावा उन्होने कुछ दुकानों में मदद के लिये बॉक्स भी रखे हुए हैं जिनमें कोई भी व्यक्ति जितना चाहे पैसा दान कर सकता है।

ज्यादातर लोगों ने भले ही मीना के इस काम का विरोध किया हो, लेकिन उनके परिवार वाले कंधे से कंधा मिलाकर उनके साथ खड़े रहे। तभी तो मीना और उनके पति खुद ही ये किट तैयार करते हैं और जब कभी वो शहर से बाहर होते हैं तब उनके बेटे और बहू इस काम को संभालते हैं। मीना का कहना है कि ये काम बहुत साहस और दृढ़निश्चय वाला है। इस काम में नियमित्ता होनी चाहिए क्योंकि अगर हम तय जगह पर समय पर नहीं पहुंचते हैं तो इससे उन लोगों का विश्वास टूटता है। उनके मुताबिक इस काम के विस्तार में अभी काफी गुंजाइश है। क्योंकि देश में सिर्फ 12 प्रतिशत लड़कियां और महिलाएं ही सेनेटरी नैपकीन का इस्तेमाल करतीं हैं। इसलिए लोगों को पैसा दान करने की जगह वहीं पर इस काम को शुरू करना चाहिए जहां पर वो रहते हैं। ऐसी किट को बनाने में लागत सिर्फ 60 रुपये ही आती है।

अपने अनुभवों को साझा करते हुए मीना बताती हैं कि ये लड़कियां इतनी ईमानदार होती हैं कि अगर किसी के पास कोई सामान ज्यादा पहुंच जाता है तो वो उसे उसी समय वापस कर देतीं हैं। इतना ही नहीं कुछ लड़कियां जो स्कूल की पढ़ाई खत्म कर चलीं गयीं हैं और अब कमाने लगीं हैं वो आगे 2-3 लड़कियों को अपने पैसे से ऐसी किट उपलब्ध करा रहीं हैं। ये लड़कियां उनसे कहती हैं कि दादी इन सबके इस्तेमाल से हमें बहुत आराम मिलता है। मीना और उनके पति इस काम को अपने दोस्तों, रिश्तेदारो और खुद के पैसे से कर रहे हैं। इस काम की शुरूआत के लिए उनके पति ने उन्हें 25 हजार रुपये दिये थे। इस समय इस काम को करने में हर महीने 50 से 60 हजार रुपये का खर्च आता है।

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